16 नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


इस जगत में कोई भी व्यक्ति अपमान करने योग्य नहीं है। सम्मान करने योग्य व्यक्ति भरे पड़े हैं। खराब से खराब काम करने वाला व्यक्ति भी निंदा योग्य नहीं है। सामान्य से सामान्य अच्छा कार्य करने वाला भी परम अभिनंदनीय है। क्योंकि खराब या अच्छा काम करने वाला कल क्या बनेगा, हमें पता नहीं है! हमें उससे मतलब भी नहीं है। पर हमारे द्वारा निंदा या सम्मान की की गई क्रिया हमें अच्छा या बुरा फल अवश्य दे देती है।
हमारी प्रतिक्रिया ‘कि्रया की अच्छाई या बुराई को कम या बाद में प्रकट करती है... हमारे अपने अच्छे या बुरे स्वभाव को पहले प्रकट करती है। अच्छी प्रतिक्रिया करने का हमें जन्मसिद्ध अधिकार है, बुरी प्रतिक्रिया करने का हमें कोई अधिकार नहीं है।
जीव की भवितव्यता का हमें कोई पता नहीं है। आज दिखाई देने वाला खराब व्यक्ति कब अच्छा हो सकता है। कब उसके पुण्य उदय में आयेंगे... कब भवितव्यता जोर मारेगी और जीवन बदल जायेगा। तब उसे उसके अतीत के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
और अतीत तो हर आत्मा का संसार से भरा हुआ ही होता है। जो भी सिद्ध बना है, उसका भी अतीत तो राग द्वेष से भरा हुआ ही था। ‘कल तो हर आत्मा का कषाय से भरा हुआ ही होता है।
इसलिये महत्वपूर्ण ‘कल नहीं है, महत्वपूर्ण ‘कल है।
बीता हुआ कल महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। आने वाला कल ही महत्वपूर्ण होता है।
वह क्या है.. यह महत्वपूर्ण नहीं है। वह क्या होगा, यह महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें भविष्य का राज छिपा है। इसमें उसके अस्तित्व के आयाम छिपे है।
इसलिये अतीत कितना ही खराब क्यों न हो, उसे दोष मत दो! उसका अपमान मत करो! उज्ज्वल भविष्य का सदैव बहुमान करना सीखो।
दुर्गुणों का अपमान करने के बजाय सद्गुणों का सम्मान करना सीखो। विकारों का पैदा होना, आश्चर्यजनक घटना नहीं है, क्योंकि ये तो हमारी चेतना के अनादिकाल के संस्कार है। हर भव में यही किया है। आश्चर्यजनक घटना तो यह है, जब ऐसे वातावरण में भी हमारे चित्त में पवित्रता और सद्गुणों का संचार होता है। सद्गुणों का सम्मान हमारे अन्तर को सद्गुणों से भर देगा।

कोई भी ना है बुरा, परिणति का परिमाण।
परिवर्तन में देर ना, भावी है अनजान।।

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