38. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

काला, घना काजल से भी गहरा अंधेरा है! दांये हाथ को बांये हाथ का पता नहीं चल पा रहा है, इतना अंधेरा है। और मुश्किल यह है कि यह द्रव्य अंधेरा नहीं है। द्रव्य के अंधेरे को मिटाने के लिये एक दीया काफी है। एक दीपक की रोशनी हमारे कक्ष में उजाला भर सकती है।
यह अंतर का अंधेरा है। आँखों में रोशनी होने पर भी अंधेरा है। सूरज के प्रकाश में भी अंधेरा है। किधर चलें, कहाँ चलें, किधर जायें, क्या करें..... आदि आदि प्रश्न तो बहुतेरे हैं, पर समाधान नहीं है। अंतर के अंधेरे से जूझना भी कोई आसान काम नहीं है। जितना जितना उस बारे में सोचता हूँ, उतना ही ज्यादा मैं उसमें उलझता जाता हूँ।
बैठा रहता हूँ माथे पर चिंता की लकीरें लिये! पडा रहता हूँ शून्य चेहरे के साथ! उदास होकर बैठ जाता हूँ हाथ पर हाथ धर कर! रोता रहता हूँ अपने को, अपनी तकदीर को!
लेकिन मेरे भैया! यों हाथ पर हाथ धरके बैठने से क्या होगा? रोने से रोशनी तो नहीं मिलेगी न!
इसलिये उठो! जागो! पुरूषार्थ करो!
रोओ मत! थोडा हँसो! अपने भाग्य पर हँसो! और अपनी हँसी से यह दिखाओ कि मैं तुमसे हार मानने वाला नहीं है। अपनी हँसी से पुरूषार्थ का भी स्वागत करो।
अपने बिगडे भाग्य पर रोने के बजाय पुरूषार्थ में प्रचंडता लाओ! और पुरूषार्थ के बल पर भाग्य को अंगूठा दिखाने का प्रयास करो। पुरूषार्थ से भाग्य की दिशा बदल दो। तुम्हारे जीवन में हजारों सूर्यों की रोशनी उतर आयेगी।
तुम जड नहीं हो, जो पडे रहो।
तुम चैतन्य हो, जो अनंत शक्ति का स्रोत है। बस! उस शक्ति का परिचय करना है, उसे प्रकट करने का साहस करना है।
बांसुरी भी पडे पडे नहीं बजा करती! वीणा के तार भी अपने आप नहीं झनझनाते! मृदंग में से माधुर्य-रसगंगा भी थाप खाकर ही बहने लगती है।
तुममें शक्ति है, उसे अभिव्यक्ति देनी है। बीज को जलवायु देनी है ताकि वह विराट् वृक्ष का रूप पा सके।

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