43. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

जटाशंकर नौकरी की तलाश में घूम रहा था। वह समझ रहा था कि यदि मुझे शीघ्र ही नौकरी नहीं मिली तो घर का चूल्हा जलना बंद हो जायेगा।
चलते चलते वह एक सर्कस वाले के पास पहुँचा। सर्कस के मैनेजर ने कहा- मैं तुम्हें एक काम दे सकता हूँ। रूपये तुम्हें पूरे मिलेंगे।
जटाशंकर ने कहा- हुजूर! आप जो भी काम सौंपेंगे, मैं करने के लिये तैयार हूँ। बताइये मुझे क्या काम करना होगा?
मैनेजर ने कहा- एक शेर की हमारे पास कमी हो गई है। तुम्हें शेर की खाल पहन कर शेर का अभिनय करना है। बस! थोड़ी देर का काम है। थोडा चीखना है! दहाड लगानी है! आधे घंटे का काम है। पिंजरे में घूमना है। दर्शकों का मनोरंजन हो जायेगा। और तुम्हें पैसे मिल जायेंगे। महीने भर तो यह काम करो, फिर बाद में देखेंगे।
जटाशंकर थोड़ा हैरान हुआ कि शेर का काम मुझे करना पडेगा! पर सोचा कि पैसे तो मिल ही रहे हैं न! फिर क्या चिंता!
दूसरे दिन से समय पर उसने पिंजरे में बैठकर शेर की खाल पहन ली। दर्शकों का जोरदार मनोरंजन किया। नकली शेर तो ज्यादा ही दहाडता है। उसने जो दहाड लगाई, जो उछला, कूदा, लोग आनंदित हो गये।
मैनेजर ने प्रसन्न होकर उसे पुरस्कृत भी किया।
यह क्रम लगातार चलता ही रहा।
एक दिन वह दर्शकों के बीच जालियों से बने पिंजरे में दहाड लगा रहा था कि तभी उस पिंजरे में दूसरे शेर ने प्रवेश किया। असल में उस दिन दो शेरों के प्रदर्शन का कार्यक्रम था।
दूसरा शेर दांत निकाल कर, आँखें तरेर कर जोरदार दहाड रहा था।
दूसरे असली शेर को देखकर नकली शेर मिस्टर जटाशंकर डर गया। उसने विचार किया- लोग मुझे असली शेर समझ सकते हैं पर यह असली शेर तो मुझे सूंघते ही समझ जायेगा कि मैं शेर नहीं बल्कि आदमी हूँ।
उसकी तो मारे डर के घिग्घी बंध गई। उसने तो तुरंत आव देखा न ताव, छलांग लगाई और शेर की खाल उतार कर चारों ओर लगी जालियों पर तेजी से चढ़ गया। लोग चक्कर में पडे कि यह शेर आदमी कैसे हो गया!
जटाशंकर तो जाली पर चढकर जोर जोर से ‘बचाओ बचाओ चीखने लगा।
इतने में दूसरे शेर ने शेर की खाल थोडी सी उतारते हुए कहा- भैया! डर मत! मैं शेर नहीं हूँ।
लोग यह तमाशा देखकर दोहरे हो गये कि यहाँ तो दोनों ही शेर नकली है।
असली असली ही होता है... और नकली नकली! नकली ज्यादा टिकाउ नहीं हो सकता। उसकी तो पोल खुल ही जाती है। हमें अपना जीवन असलियत के आधार पर जीना है। नकली जीवन मात्र कर्मबंधन का ही कारण है।

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