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Showing posts from September, 2013

SHREE PARSWAMANI TIRTH

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JAY JAY SHREE AADINATH JAY JAY SHREE PARSWANATH

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JAY JAY SHREE AADINATH 

JAY JAY SHREE PARSWANATH

JAY JAY SHREE AADINATH 
JAY JAY SHREE PARSWANATH

जीवन तो युवावस्था का ही

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-मणिप्रभसागर
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आयोजित ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- हमें समझ ही नहीं आता और जिन्दगी पूरी हो जाती है। जिन्दगी का अर्थ समझ में आने से पहले ही हमारी अर्थी निकल जाती है।

Nice Story

अदभुत कथा-लिखने वाले व्यक्ति को तहे दिल से
नमन.......
कहानी कुछ यूँ है--------..................................................................................
इस साल मेरा सात वर्षीय बेटा दूसरी
कक्षा मैं प्रवेश पा गया ....
क्लास मैं हमेशा से अव्वल आता रहा है !पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी
स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए
बाज़ार ले गया !बेटे ने जूते लेने से ये कह कर मना कर
दिया की पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी
मरम्मत की जरुरत है वो अभी इस
साल काम दे सकते हैं!अपने जूतों की बजाये उसने मुझे अपने
दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के
लिए नया चश्मा बनवाने को कहा !मैंने सोचा बेटा अपने दादा से शायद
बहुत प्यार करता है इसलिए अपने
जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा
जरूरी समझ रहा है !खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा
और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर
पहुंचा.....
दुकानदार ने बेटे के साइज़ की सफ़ेद
शर्ट निकाली ...
डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट
थी.....
फिर भी बेटे ने थोड़ी लम्बी शर्ट
दिखाने को कहा !!!!मैंने बेटे से कहा :बेटा ये शर्ट तुम्हें
बिल्कुल सही है तो फिर और लम्बी
क्यों ? बेट…

Ajitshanti Stotra by Maniprabhsagarji ms

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kalash, dhwaja, jain flag, flag,

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Namiun Stotra by Maniprabhsagarji ms

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Namiun Stotra by Maniprabhsagarji ms

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सबसे छोटा आराधक आव्हान योगेशजी सिरोया मुंबई

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सबसे छोटा आराधक आव्हान योगेशजी सिरोया मुंबई 


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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है?
उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सकता।
उन…

Palitana Chaturmaas

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है?
उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सकता।
उन…

Palitana Chaturmaas

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन
ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है?
उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सकता।
उन्…

SAMVATSARI MAHAPARVA NEWS

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन
ता. 9 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वािधराज संवत्सरी महापर्व के अवसर पर श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा के मध्य आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- आज क्षमायाचना का महापर्व है। ऐसा कोई व्यक्ति मिलना दुर्लभ है, जिसने अपने जीवन में कभी न कभी कोई न कोई गलती नहीं की हो। मनुष्य मात्र, गलती का पात्र है। लेकिन संवत्सरी का ऐसा विशिष्ट अवसर है, जब हमें अपना मनोमालिन्य धो देना है। अपने द्वारा हुई गलतियों के लिये क्षमा मांगनी है। और दूसरों के द्वारा हुई गलतियों को क्षमा कर देना है। उन्होंने कहा- क्षमा मांगना बहुत आसान है, परन्तु क्षमा करना बहुत मुश्किल है। हमें हमारी गलतियों का स्मरण रहता है। इसलिये हम अपनी गलतियों के लिये बहुत आसानी से क्षमा मांग लेते हैं। परन्तु दूसरों की गलतियाँ हमारे हृदय में बिच्छु के डंक की भांति लगातार चुभती रहती है। उसके द्वारा क्षमा मांगने प…

PARYUSHAN PARVA 7th DAY

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन
ता. 8 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के सातवें दिन श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा के मध्य आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- जैन शासन में समर्पण और संवेदनशीलता का विशेष महत्व है। आज जैन इतिहास की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा- जैन परम्परा में सैंकडों आचार्य हुए हैं, जिन्होंने अहिंसा और कल्याण की बलिवेदी पर अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया। उन्होंने कहा- कष्टों को रोते हुए भोगने से वे बढते हैं और हंसते हंसते भोगने से उनकी परम्परा समाप्त हो जाती है। उन्होंने परमात्मा आदिनाथ, नेमिनाथ एवं पाश्र्वनाथ के जीवन चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा- इन तीर्थंकरों से राग व द्वेष की परम्परा के दुष्परिणाम समझने हैं और समझ कर राग व द्वेष का त्याग करना है। राग की परम्परा का परिणाम परमात्मा नेमिनाथ के भव हैं। और द्वेष की परम्परा का परिणाम पाश्र्वनाथ के …

PARYUSHAN PARVA 6th DAY

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन
ता. 7 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के छठे दिन श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों व अतिथियों की विशाल ध्ार्मसभा के मध्य आज परमात्मा महावीर के जीवन का वृत्तांत सुनाते हुए कहा- परमात्मा महावीर के जीवन की सबसे बडी विशिष्टता है कि उनका आचार पक्ष व विचार पक्ष एक समान था। मात्र उपदेश देने वाले तो हजारों हैं, पर उनका अपना जीवन अपने ही उपदेशों के विपरीत होता है। ऐसे व्यक्ति पूज्य नहीं हुआ करते। पूज्य तो वे ही होते हैं, जिनकी कथनी करणी एक समान हो।
उन्होंने कहा- आज विश्व में आसुरी प्रवृत्तियों का बोलबाला है। भौतिकता के विकास ने मानवता का विनाश किया है। सुविधाओं ने शांति के बदले अशांति दी है। दूरसंचार और आवागमन के वाहन साधनों ने विश्व की भौगोलिक दूरी को जरूर कम किया है, पर मनुष्य के बीच हृदय की दूरी अवश्य बढ गई है। आर्थिक लोभवृत्ति ने भाई भाई को लडा दिया है। पारस्पर…

14 SWAPNA

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Jahajmandir,

PARYUSHAN PARVA 4th DAY

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पूज्यउपाध्यायश्रीकाप्रवचन
ता. 5 सितम्बर 2013, पालीताना जैनश्वे. खरतरगच्छसंघकेउपाध्यायप्रवरपूज्यगुरूदेवमरूधरमणिश्रीमणिप्रभसागरजीम.सा. नेबाबुलाललूणियाएवंरायचंददायमापरिवारकीओरसेआयोजितचातुर्मासपर्वकेअन्तर्गतपर्वाधिराजपर्युषणमहापर्वकेचतुर्थदिनश्रीजिनहरिविहारधर्मशालामेंआराधकोंवअतिथियोंकीविशालधर्मसभाकोसंबोिधतकरतेहुएकहा- जैनआगमोंमेंसर्वाधिकआदरणीयशास्त्रकल्पसूत्रहै।क्योकिइसमेंजीवनकीपद्धतिकाविश्लेषणहै।वर्तमानकीघटनाओंकोअतीतसेजोडकरदेखनेकीअद्भुतदृष्टिकल्पसूत्रकाचिंतनहमेंदेताहै। उन्होंनेकहा- हमवर्तमानमेेंघटरहीघटनाओंकोकेवलवर्तमानकेसंदर्भमेंहीदेखतेहैंऔीरइसीकारणजीवनमेंतनावऔरबैचेनीहै।भगवानमहावीरकेपूर्वभवोंकावर्णनकरतेहुएउन्होंनेकहा- वेपूर्वभवमेंहमारेजैसेहीसामान्यव्यक्तिथे।जबवेकिसानथे।उसजीवनमेंउन्होंनेसच्चेसाधुसंतोंकीनि:स्वार्थभावसेश्रद्धाभरकरजोसेवाकीथी, उसीकापरिणामथाकिउन्हेंसम्यक्दर्शनकीप्राप्तिहुई।मरीचिकेभवमें

PARYUSHAN PARVA 2nd DAY

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन
ता. 3 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के द्वितीय दिन श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों व अतिथियों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- पर्युषण महापर्व के दिनों में अपने आचरण की विशुद्धता का संकल्प लेना है । ध्ार्म का प्राण अहिंसा है । यह एक निषेध्ाात्मक कि्रया है । अहिंसा का आध्ाार करूणा है । या यों कहें कि करूणा अहिंसा का परिणाम है । जैन दर्शन की नींव अहिंसा है । अहिंसा की परिभाषा अनेक मनीषियों ने अपने-2 दृष्टिकोणों के आध्ाार पर की है ।
भगवान् महावीर ने अहिंसा को जीवन का रसायन कहकर उसकी गहरी और सूक्ष्म व्याख्या की है । किसी जीव को मारना तो हिंसा है ही, लेकिन किसी को शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट पहुँचाने को भी भगवान् महावीर ने हिंसा कहा है । यह अहिंसा का अत्यंत सूक्ष्म रूप है, जो मानवीय करूणा और दया से आप्लावित है । अहिंसा ध्ार्म की जननी है । उसे ध्ार्म…