Aug 25, 2013

PALITANA NEWS



पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 25 अगस्त 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोध्ाित करते हुए कहा- जीवन इच्छाओं के आधार पर नहीं अपितु समझौते के आधार पर चलता है। जीवन में यदि शांति और आनंद चाहिये तो दूसरों की इच्छाओं पर अपनी इच्छाओं का बलिदान करना सीखो। जो व्यक्ति दूसरों को सुख देने के लिये अपना सुख त्याग करता है, निश्चित रूप से वही व्यक्ति पूरे परिवार के हृदय में बिराजमान होकर राज करता है।
आज पारिवारिक शांति के सूत्र प्रस्तुत करते हुए पूज्यश्री ने कहा- जीवन में यदि आनंद पाना है तो टिट फोर टेट का सिद्धान्त अपने मन से निकालना होगा। जैसे को तैसा नहीं अपितु जैसे को वैसा सिद्धान्त बनाना होगा। जैसे को तैसा का अर्थ हुआ कि जैसा वो कर रहा है, वैसा करना। जबकि जैसे को वैसा का अर्थ होता है, वह जो कर रहा है, वो भले करे पर मुझे वो करना है जो उसके और मुझे दोनों के अनुकूल हो। हमें आग का जवाब डीजल या पेट्रोल से नहीं अपितु पानी से देना चाहिये।
उन्होंने कहा- क्रोध आग है और अहंकार डीजल! क्रोध का जवाब क्रोध या अहंकार में भर कर नहीं, अपितु क्षमा और सरलता रूप पानी से देना होगा। तभी वातावरण में तनाव समाप्त होगा।
उन्होंने कहा- परिवार की शांति यह हमारा लक्ष्य होना चाहिये। इस लक्ष्य के अनुरूप हमारा व्यवहार होना चाहिये। परिणाम दो प्रकार के होते हैं। एक तो क्षणिक जो संसार की परिधि में आता है और दूसरा होता है-शाश्वत जो अध्यात्म के क्षेत्र में आता है । मात्रा सांसारिक परिणाम सोच कर कार्य नहीं किया जा सकता । जैसे कोई व्यक्ति यह विचार करता है कि आज मैं इस व्यक्ति को ठगूॅंगा तो मुझे अर्थ लाभ होगा । ठगना जो क्रिया है यह उसका मात्र सांसारिक परिणाम है परन्तु उसे यह भी विचार करना चाहिये कि इससे मेरी आत्मा कितनी कलुषित होगी  ? कर्मबंधन होगा तो  मुझे उसका परिणाम  तो भुगतना ही पडेगा ।  यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण है ।
उन्होंने कहा- हर व्यक्ति को अपने व्यवहार की समीक्षा करनी चाहिये । मैं जो भी करता हूॅं, बोलना, बैठना, चलना, करना आदि जो भी मेरी प्रवृत्ति है, उसका परिणाम मेरे लिये क्या होगा और साथ साथ इस बात का विचार करना भी जरूरी है कि मेरे व्यवहार का परिणाम मेरे परिवेश पर क्या होगा। उन्होंने कहा- व्यक्ति जंगली/ एकाकी प्राणी नहीं है, वह समाज में जीता है । समाज का अर्थ होता है । व्यक्ति जो भी करता है, निश्चित रूप से संपूर्ण समाज उससे प्रभावित होता है । उन क्षणों में यह विचार जरूरी है कि मैं सामाजिक परिणामों पर भी विवेक पूर्वक विचार करके अपने व्यवहार को संतुलित बनाउॅ ।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाॅ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म. सा. ने कहा- व्यक्ति को जो धन मिला, सत्ता मिली, संपत्ति मिली, ये केवल उसकी बुद्धि या मेहनत से ही नहीं मिली । हजारों व्यक्ति ऐसे हैं जो उससे भी ज्यादा मेहनत करते है, फिर भी कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाते । वे अभावों में जीने को मजबूर हैं । संसार में पदार्थ, सत्ता या संपत्ति की प्राप्ति में पुरूषार्थ के साथ साथ पुण्य काम करता है । पुण्य हो तो ही पाया जा सकता है । पुण्य के अभाव में पुरूषार्थ व्यर्थ जाता है । उन्होंने कहा- पुण्य से उपार्जित वैभव का उपयोग पुण्य प्राप्ति के लिये होना चाहिये । अपने लिये बिना जरूरत बीस जोडी वस्त्र खरीदकर रखने वाला व्यक्ति यह विचार नहीं करता कि मैं एक जोडी वस्त्र किसी जरूरतमन्द व्यक्ति को अर्पण कर दूं । अर्जन मनुष्य का स्वभाव है तो अर्पण उसका कर्तव्य होना चाहिये ।

प्रेषक
दिलीप दायमा



Aug 24, 2013

PALITANA CHATURMAS




















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Aug 22, 2013

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन


ता. 22 अगस्त 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत रक्षा बंधन दिवस पर श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- सुख दु:ख दोनों पराधीन है। सुख प्राप्ति के लिये कोई व्यक्ति या कोई पदार्थ चाहिये, कोई सम्मान अथवा प्राप्ति की घटना चाहिये अथवा पूर्व घटित घटना की कल्पना हो, तभी व्यक्ति को सुख उपलब्ध होता है। और दु:ख प्राप्ति के लिये भी कोई व्यक्ति या घटना या घटना की स्मृति की कारण होती है।
 पालीताणा में उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी के सानिध्य में संघपति परिवार
उन्होंने कहा- जो पराधीन हो, ऐसा सुख या दु:ख भ्रम है। जो स्वाधीन हो, ऐसा सुख आनन्द है। यह अपने आप में स्वतंत्र अनुभूति है। वे प्रवचन में श्रीमद् देवचन्द्र रचित चौवीशी के तहत परमात्मा के दिव्य स्वरूप की व्याख्या कर रहे थे।
उन्होंने कहा- परमात्म पद का आनन्द अखण्ड है। इस जगत में कोई भी द्रव्य, कोई भी कि्रया ऐसी नहीं है, जो निरन्तर हो सके। जिससे निरन्तर आनन्द की अनुभूति हो सके। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा- जैसे किसी व्यक्ति को दुग्ध पान में आनन्द की अनुभूति होती है। पर पहली गिलास में जो आनन्द मिलेगा क्या वैसा ही आनन्द उसे दूसरी गिलास में मिल सकता है! गिलास की संख्या ज्यों ज्यों बढती जायेगी, उसका आनन्द घटता जायेगा।
उन्होंने कहा- संसार के पौद्गलिक पदार्थों में क्षणिक सुख देने की ही क्षमता है। और जो क्षणिक है, वह निश्चित ही भ्रम है, और कुछ नहीं। जबकि परमात्म पद का आनन्द अखंड है। वहाँ किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं है। क्योंकि उसमें किसी भी प्रकार के बाह्य पदार्थ या बाह्य व्यक्ति की अपेक्षा नहीं है। उसके लिये केवल आत्म भाव ही अपेक्षित है। आत्म भाव सदा सर्वदा साथ रहने वाला दिव्य अनुभव है। उन्होंने कहा- हमें सिद्धाचल का राज दरबार मिला है। हमें आत्म अनुसंधान के लिये प्रबल पुरूषार्थ करना है।
चातुर्मास प्रेरिका बहिन म. डाँ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- इस जन्म में हमें वीतराग परमात्मा की साधना करने का अनूठा अवसर मिला है, उसका हमें पूरा पूरा लाभ उठाना है। उन्होंने कहा- जीवन में सहज सरलता की साधना करना, वीतराग परमात्मा की सेवा करना है।
संघवी हंसराजजी रमेशजी मुथा की विनंती पर पूज्यश्री साधु साध्वी श्रावक श्राविका संघ सहित विनीता नगरी पधारे। वहाँ संबोधित करते हुए पूज्यश्री ने कहा- हम यहाँ ऋषभदेव परमात्मा से अपना प्रेम संबंध स्थापित करने के लिये आये हैं। यहाँ से विदा होते समय अपने साथ ऋषभदेव परमात्मा को हृदय में बसा कर ले जाना है। उन्होंने पूज्य आचार्यश्री गुणरत्नसूरिजी म.सा. संयम जीवन की एवं आयोजक संघवी मुथा परिवार के योगदान की अनुमोदना की। संघवी मुथा परिवार की ओर से आयोजक लूणिया एवं दायमा परिवार का बहुमान किया गया।
हरि विहार के अध्यक्ष संघवी श्री विजयराजजी डोसी ने बताया कि आज शेठ आणंदजी कल्याणजी पेढी के अध्यक्ष श्री संवेगभाई लालभाई का पदार्पण हुआ। लूणिया एवं दायमा परिवार की ओर से उनका भावभीना अभिनंदन किया। श्री संवेगभाई ने पूज्यश्री के साथ लगभग आधा घंटे तक विभिन्न विषयों पर विचार विमर्श किया। पूज्यश्री ने उन्हें जैन जीवन शैली की एक पुस्तक भेंट की।

प्रेषक
दिलीप दायमा


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Aug 20, 2013

Palitana VARGHODA

Palitana VARGHODA

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 20 अगस्त 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत तप अभिनंदन समारोह में श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोध्ाित करते हुए कहा- तपस्या करना कोई हंसी खेल नहीं है। अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना होता है। एक दिन का उपवास करना भी बहुत मुश्किल हो जाता है, वहाॅं साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म. सा. ने एवं श्रीमती मंजूदेवी किरणराजजी ललवानी ने मासक्षमण की तपस्या करके एक अनूठा आदर्श उपस्थित किया है।
उन्होंने कहा- परमात्मा महावीर ने ज्ञान व चारित्र की अपेक्षा तप को ज्यादा महत्व दिया। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा- जब श्रेणिक महाराजा ने परमात्मा महावीर से निवेदन किया कि सोलह हजार साधुओं में सर्वश्रेष्ठ साधु कौन है, जिसे वंदन करने से समस्त को वंदना करने जैसा लाभ प्राप्त हो जाता है। परमात्मा महावीर ने कहा- धन्ना अणगार! जो भले दो ही ज्ञान का स्वामी है, परन्तु तपस्या में इसका कोई सानी नहीं है। परमात्मा के साथ केवलज्ञानी, चार ज्ञान वाले, तीन ज्ञान वाले कई साधु थे। परन्तु दो ज्ञान वाले मुनि की प्रशंसा करके परमात्मा ने तपस्या की महिमा गाई।
उन्होंने कहा- हमने पूर्व भव में जिन कर्मों का बंध किया है, उसे क्षय करने का एक मात्र साधन तपस्या है। तपस्या से ही संचित कर्म नष्ट होते हैं व मुक्ति पद की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा- भूखा रहना तप नहीं है। किसी को भोजन प्राप्त नहीं हो रहा है, और वह भूखा रह जाता है। उसका नाम तप नहीं है। या कभी कभी क्रोध आदि के कारण व्यक्ति जानबूझकर भूखा रह जाता है। उसे तप नहीं कहा जाता है। तपस्या के अन्तर के भावों से प्रसन्नता के साथ तप करना ही तपस्या है।
उन्होंने कहा- साध्वी विभांजनाश्रीजी के स्वभाव की यह अनूठी विशेषता है कि उनमें कोई अपेक्षा नहीं है। साथ ही हर क्षण प्रसन्न रहना जिसका स्वभाव है। निश्चित ही इनकी तपस्या अनुमोदनीय है।
समारोह का संचालन करते हुए चातुर्मास पे्ररिका पूजनीया बहिन म. डाॅ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- मुझे अपनी इस तपस्वी शिष्या पर अत्यन्त गौरव है। जिसने छोटी उम्र में इतनी बडी तपस्या की है। तप तो कोई भी कर लेता है। पर प्रसन्नता के भावों के साथ तप करना अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने चातुर्मास आयोजक परिवार को धन्यवाद दिया कि उनके द्वारा आयोजित ऐसे चातुर्मास में इतनी तपस्या का लाभ उन्हें प्राप्त हो रहा है।
इस अवसर पर पूज्य कुशल मुनिजी, साध्वी दिव्यप्रभाश्रीजी, शशिप्रभाश्रीजी, विश्वज्योतिश्रीजी, डाॅ. नीलांजनाश्रीजी, प्रियसौम्यांजनाश्रीजी, नूतनप्रियाश्रीजी, अमीपूर्णाश्रीजी आदि ने भी तपस्वी का अभिनंदन किया।
आयोजक श्री बाबुलालजी लूणिया एवं श्री रायचंदजी दायमा परिवार की ओर से पूजनीया तपस्वी साध्वीजी म.सा. का गुरू पूजन किया गया एवं दादा गुरुदेव की प्रतिमा अर्पित की गई।
मासक्षमण के तपस्वी सौ. मंजूदेवी ललवानी का आयोजक परिवार की ओर से भावभीना अभिनंदन किया गया।
अभिनंदन समारोह से पूर्व तपस्या का वरघोडा निकाला गया। जो हरि विहार से प्रारंभ होकर तलेटी पहुॅंचा, जहाॅं पूजा अर्चना वंदना की गई। समारोह में सम्मिलित होने के लिये सूरत, अहमदाबाद, मुंबई, रायपुर, बाडमेर, सांचोर आदि क्षेत्रों से बडी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हुए।
हरि विहार के अध्यक्ष संघवी विजयराज डोसी ने बताया कि तपस्या के उपलक्ष्य में चल रहे पंचाह्निका महोत्सव के अन्तर्गत आज दादा गुरुदेव की पूजा पढाई जायेगी।

प्रेषक
दिलीप दायमा

Aug 19, 2013

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 19 अगस्त 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- जब तक व्यक्ति परमात्म पद को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक हर व्यक्ति अपूर्ण है। आंतरिक दृष्टि से पूर्ण होेने पर भ्ज्ञी क्रोध, मान आदि पडदे के कारण उसे अपनी पूर्णता का परिचय नहीं है। वह पूर्ण है, पर कर्मों से ढंका है।
आसक्ति आदि के कारण वह अपूर्ण है। पर अपनी अपूर्णता को ही पूर्ण मानकर अहंकार करता है। अहंकार ही व्यक्ति को कभी पूर्ण नहीं होने देता।
उन्होंने कहा- जो बीमार है, वह यदि चिकित्सक के सामने अपनी स्वस्थता की व्याख्या करेगा तो वह कैसे अपना इलाज करवा पायेगा। वह कभी भी स्वस्थ नहीं हो पायेगा।  उसे यदि स्वस्थ होना है तो अपनी बीमारी का वर्णन करना पडेगा।
उन्होंने कहा- मैं अपूर्ण हूँ, ऐसा बोध उसे यथार्थता देता है और ऐसा बोध होते ही पूर्ण होने की प्रकि्रया का प्रारंभ हो जाता है। धर्म उसे पूर्ण बनाता है। धर्म का अर्थ है- अपनी यथार्थता का बोध! यहाँ पूर्णता से तात्पर्य शारीरिक विकास नहीं, बल्कि गुणों का विकास और दुर्गुणों का विनाश है। दुर्गुणों की उपस्थिति ही व्यक्ति को अपूर्ण बनाती है और आत्म वैभव का अपूर्व खजाना पास होने पर भी दरिद्रता के विचारों में डूबा रहता है।
उन्होंने कहा- आज व्यक्ति सामान्य वस्तुओं की प्राप्ति करके इतना अहंकारी बन गया है कि उसी में अपनी पूर्णता का अहसास करता है। यह एक तरह से सूखी घास को हरे रंग के चश्मे से देखकर उसमें हरी घारस देखने का प्रयत्न करने जैसा है। इससे सूखी घास हरी नहीं हो सकती। आज व्यक्ति अपनी अपूर्णता को दूर करने के बजाय ईष्र्या और द्वेषवश दूसरे में भी अपूर्णता थोपना चाहता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा- एक अंधा और एक लंगडा, दोनों एक दूसरे के मित्र और सहयोगी थे। एक रास्ता दिखाता और दूसरा चलता। इस प्रकार अपनी अपूर्णता को एक दूसरे से पूरा करते थे। वे दूसरे की पूर्णता की विशिष्टता स्वीकार करने के बजाय अपनी अपनी विशेषता को ही महत्व देते थ्ज्ञे। अंधा दूसरे की आंख को महत्व देने के बजाय अपनी चाल को महत्व देता था। और लंगडा दूसरे की चाल को महत्व देने के बजाय अपनी आंख को महत्व देता था। दोनों में एक दिन लडाई हुई। आरोप लगाये, मारपीट हुई। एक सिद्ध पुरूष उधर से गुजरा। उसने अंधे से कहा- बोलो, मैं तुम्हें क्या वरदान दूं। गुस्से में उसने कहा- मुझे कुछ नहीं चाहिये, इस लंगडे को अंधा कर दो। लंगडे ने सिद्ध पुरूष से कहा- इस अंधे को लंगडा कर दो।
सिद्ध पुरूष की कृपा से वे अपनी अपूर्णता पूर्ण कर सकते थे। पर चूंकि उनकी निगाहें दूसरे पर थी। इस कारण कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाये। यह उदाहरण ईष्र्या और द्वेष का प्रतीक है।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- हर व्यक्ति को अपने व्यवहार की समीक्षा करनी चाहिये । मैं जो भी करता हूँ, बोलना, बैठना, चलना, करना आदि जो भी मेरी प्रवृत्ति है, उसका परिणाम मेरे लिये क्या होगा और साथ साथ इस बात का विचार करना भी जरूरी है कि मेरे व्यवहार का परिणाम मेरे परिवेश पर क्या होगा। उन्होंने कहा- व्यक्ति जंगली@ एकाकी प्राणी नहीं है, वह समाज में जीता है । समाज का अर्थ होता है । व्यक्ति जो भी करता है, निश्चित रूप से संपूर्ण समाज उससे प्रभावित होता है । उन क्षणों में यह विचार जरूरी है कि मैं सामाजिक परिणामों पर भी विवेक पूर्वक विचार करके अपने व्यवहार को संतुलित बनाउँ।
हरि विहार के अध्यक्ष संघवी विजयराज डोसी ने बताया कि चल रहे पंच दिवसीय महोत्सव के अन्तर्गत आज श्री सिद्धचक्र महापूजन का आयोजन किया गया। इसे पढाने के लिये परम विद्वान् श्रावक वर्य श्री विमलभाई शाह अहमदाबाद से पधारे। समारोह में उपस्थित होने के लिये सूरत, गांधीधाम, अहमदाबाद आदि शहरों से बडी संख्या में श्रद्धालु आये हैं।
पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. की 25वीं वर्धमान तप की ओलीजी की पूर्णाहुति पर वरघोडे का आयोजन किया गया।
आयोजक बाबुलाल लूणिया ने बताया कि पूजनीया साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म.सा. एवं श्रीमती मंजूदेवी ललवानी के मासक्षमण की महान् तपस्या के निमित्त कल सुबह भव्य वरघोडे का आयोजन किया जायेगा। बाद में तपस्वियों का अभिनंदन समारोह आयोजित होगा।

प्रेषक
दिलीप दायमा


Aug 18, 2013

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

 पूज्य उपाध्यायश्री
    का  प्रवचन

ता. 18 अगस्त 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोध्ाित करते हुए कहा- जीवन में शान्ति और आनन्द पाने के लिये सहिष्णुता गुण का उपयोग जीवन में अत्यन्त जरूरी है। जिस घर के बडे बुजुर्ग सहनशील होते हैं, निश्चित ही वह घर स्वर्ग जैसा हो जाता है।
उन्होंने कहा- जीवन इच्छाओं के आधार पर नहीं जीया जाता। क्योंकि इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। उसकी कोई एक दिशा भी नहीं होती। घर में जहाॅं 7-8 सदस्य रहते हों, वहाॅं यदि सभी अपनी अपनी इच्छाओं के अनुसार जीवन जीना शुरू कर दे, तो दो मिनट में ही महाभारत शुरू हो जायेगी। क्योंकि हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र इच्छा व आकांक्षा रहती है। इस कारण इच्छाओं में टकराव होता है। और वही टकराव अशान्ति का कारण हो जाता है।
वे परिवार में शान्ति कैसे हो, विषय पर प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा- बुजुर्ग वही है, जो दूसरों की उचित आकांक्षाओं को पूरी करने के लिये अपनी इच्छाओं का त्याग करता है। उन्होंने कहा- जीवन इच्छाओं के आधार पर नहीं, अपितु मर्यादाओं के आधार पर जीना होता है। जहाॅं मर्यादा युक्त जीवन है, वहाॅं किसी भी प्रकार की कोई अशान्ति नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा- मर्यादा शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण है। वह हमें कत्र्तव्य का भी बोध देता है और जिम्मेदारियों का भी। यदि आप पिता है, तो आपको अपनी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिये। और अपनी जिम्मेदारियों का स्मरण करके अपने व्यवहार का निर्धारण करना चाहिये।
उन्होंने कहा-मुश्किल यह है कि लोग दूसरों के कत्र्तव्यों का तो निरन्तर स्मरण करते हैं कि उसे ऐसा करना चाहिये! उसे वैसा करना चाहिये। परन्तु स्वयं को क्या करना चाहिये, इस विषय में विचार भी नहीं करता। मर्यादा का उल्लंघन करना सबसे बडा पाप है। वह चाहे साधु जीवन में हो, चाहे गृहस्थ जीवन में। हर क्षेत्र की अपनी मर्यादा है। मर्यादा की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन करना, विकृतियों और अशान्ति को आमंत्रण देना है।
चातुर्मास की प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाॅ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- हमारी जेब से 200-500 रूपये इधर उधर हो जाये, तो दो तीन दिनों तक चैन नहीं आता, रोटी नहीं भाती! परन्तु पूरी जिन्दगी हम जो बरबाद कर रहे हैं, उस विषय में हमारे मन में पीडा के भाव क्यों नहीं पैदा होते। रूपये तो जाने के बाद दुबारा पाये जा सकेंगे पर जिन्दगी यदि खो दी तो दुबारा कैसे पायेंगे!
उन्होंने कहा- हम अपने जीवन का 80 प्रतिशत हिस्सा व्यर्थ की चर्चाओं, गप्पों और बेकार कामों में बिताते हैं। जिनके साथ हमारा कोई संबंध नहीं है, जिस विषय में चर्चा करने से कोई लाभ होने वाला नहीं है, न हमारी चर्चा से स्थिति में परिवर्तन हो सकता है, उन बातों में हम अपना अनमोल समय, उर्जा, और बौद्धिक धन नष्ट करते हैं। और व्यर्थ में कर्म बंधन करते हैं।
संघवी विजयराज डोसी ने बताया कि चातुर्मास को मंगलमय बनाने के व आत्म कल्याण के लक्ष्य से चातुर्मास की प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाॅ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने वर्धमान तप की ओली की महान् तपस्या पूर्ण की। उन्होंने 25वीं ओली संपन्न की। कल ता. 19 को उनका पारणा होगा।
आयोजक बाबुलाल लूणिया ने बताया कि पूजनीया साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म.सा. के मासक्षमण के निमित्त जो पंचाह्निका महोत्सव चल रहा है, उसके अन्तर्गत आज अर्हद् महापूजन का तीसरा भाग पढाया गया। कल सिद्धचक्र महापूजन का भव्य आयोजन होगा। ता. 20 अगस्त को प्रातः 8.30 बजे भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया जायेगा। ता. 21 को मासक्षमण का पारणा होगा। इस अवसर पर सूरत, मुंबई, बाडमेर, पूना, अहमदाबाद आदि क्षेत्रों से बडी संख्या में श्रद्धालु पहुॅंच रहे हैं।
प्रेषक
दिलीप दायमा

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Aug 17, 2013

Palitana nice Chaturmas

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 17 अगस्त 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत प्रश्नोत्तरी प्रवचन फरमाते हुए श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- जैन किसी जाति का नाम नहीं है, अपितु जैन एक धर्म है, एक जीवन शैली है। जाति से सभी हिन्दु है। हिन्दु और जैन कोई अलग नहीं। हिन्दु किसी धर्म का नाम नहीं है और जैन किसी जाति का नाम नहीं है। जैन शब्द का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा- जो भी व्यक्ति वीतराग परमात्मा का अनुयायी है, उनके सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतारता है, जो भी व्यक्ति अहिंसा आदि व्रतों का स्वीकार करता है, वह जैन है, भले ही वह जाति से क्षत्रिय, हो या ब्राह्मण, वैश्य हो या शूद्र! परमात्मा महावीर स्वयं क्षत्रिय थे। जबकि उनके ग्यारह गणधर ब्राह्मण थे। धन्ना और शालिभद्र जैसे मुनि वैश्य जाति से आये थे तो हरिकेशी, चित्तसंभूत मुनि शूद्र जाति से आये थे। परमात्मा महावीर जातिवाद को स्वीकार नहीं करते। महावीर प्रभु फरमाते हैं- कर्म से ही व्यक्ति क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य व शूद्र होता है, जाति से नहीं।
उन्होंने कहा- जैन धर्म अपने आप में स्वतंत्र धर्म है। इस कारण जैन अनुयायियों को अल्पसंख्यक की मान्यता अवश्य प्राप्त होनी चाहिये। अल्पसंख्यक की मांग पर जोर देते हुए कहा- अपने धर्म और अपनी संस्कृति की रक्षा करने के लिये अल्पसंख्यक की मान्यता चाहिये।
उन्होंने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में कहा- भाग्य पुरूषार्थ के अधीन है। भाग्य का निर्माण पुरूषार्थ करता है। कोई भी दूसरा व्यक्ति हमारे भाग्य का निर्माण नहीं करता। ईश्वर भी हमारे भाग्य का निर्माता नहीं है। यदि ईश्वर भाग्य का निर्माता है तो फिर उसने किसी को अमीर और किसी को गरीब क्यों बनाया! सच्चाई यह है कि व्यक्ति अपने कर्मों से अमीर और गरीब बनता है। अतीत के आधार पर ही उसका वर्तमान निर्धारित होता है। और वर्तमान ही भविष्य का निर्माता बनता है।
उन्होंने गुरुपद की महिमा का वर्णन करते हुए कहा- तीर्थंकर भी सम्यग्दर्शन किसी न किसी गुरु के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं। बिना गुरु मुक्ति नहीं है।
इस अवसर पर पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- अपने जीवन को संवारना चाहते हैं तो स्वभाव को बदलना सीखो। किसी समय अपनी बात को मनवाओ तो किसी समय दूसरों की बात रखने के लिये अपनी बात का त्याग करना भी सीखो। ऐसी सहिष्णुता ही जीवन में स्वर्ग का निर्माण करती है।
उन्होंने कहा- मोक्ष प्राप्त करने का पुरूषार्थ हमें इसी जीवन में करना है। अपने चित्त में स्वर्ग का निर्माण करने वाला ही मोक्ष का अधिकारी बनता है। जो व्यक्ति सदैव समभावों में रहता है, परम आनन्द में रहता है, वह अपने चित्त में स्वर्ग का निर्माण करता है। समता का अर्थ होता है- प्रतिकूलता में भी आनंद का अनुभव करना! एक मुस्कुराते हुए व्यक्ति के पास कोई व्यक्ति क्रोध कर ही नहीं पायेगा। उसे क्या क्रोध में ला पायेगा, उसकी मुस्कुराहट से उसका अपना क्रोध मिट जायेगा।
स्वर्ग और नरक तो मरने के बाद मिलेंगे परन्तु हम वर्तमान जीवन में भी उनका साक्षात्कार करते हैं। जो व्यक्ति राग, द्वेष, ईष्र्या, लालच आदि भावों में जीता है, वह नरक में जीता है। वह न केवल स्वयं नरक में जीता है, बल्कि अपने आसपास के परिवेश में भी अपनी भाषा, व्यवहार के द्वारा नरक के काँटे चारों ओर बिखेरता है। ऐसे भावों में जीने वाला व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी नहीं होता।
पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. की शिष्या पूजनीया साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म.सा. के मासक्षमण तप की महान् तपस्या के उपलक्ष्य में पंचाह्निका महोत्सव का आयोजन चल रहा है। उसके अन्तर्गत आज दूसरे दिन श्री अर्हद् महापूजन पढाया गया। इसके अन्तर्गत सात पीठिकाओं का पूजन किया गया।
आयोजक रायचंद दायमा ने बताया कि श्रीमती मंजूदेवी बसन्तकुमारजी ललवानी के मासक्षमण की महान् तपस्या चल रही है। सकल संघ ने उनकी तपस्या की अनुमोदना की।
हरि विहार के अध्यक्ष संघवी विजयराज डोसी ने बताया कि पंचाह्निका महोत्सव के अन्तर्गत कल 18 अगस्त को श्री अर्हद् महापूजन का तीसरा पूजन पढाया जायेगा। ता. 19 को श्री सिद्धचक्र महापूजन और 20 अगस्त को प्रात: 8.30 को वरघोडे का आयोजन होगा और दादा गुरुदेव की पूजा पढाई जायेगी। तपस्वी अभिनंदन समारोह का आयोजन प्रात: 10 बजे होगा।

प्रेषक- दिलीप  दायमा

Aug 13, 2013

पालीताणा


पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. आदि ठाणा 8 आदि विशाल साधु साध्वी मंडल के परम सानिध्य में पूजनीया बहिन म. डा. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. की पावन प्रेरणा से पालीताणा में 1200 आराधकों का विशाल चातुर्मास आयोजित हो रहा है। इसका लाभ अहमदाबाद धोरीमन्ना निवासी श्री भूरचंदजी लक्ष्मणदासजी लूणिया परिवार एवं अहमदाबाद कोठाला निवासी श्री जसराजजी प्रेमराजजी दायमा परिवार ने लिया है। चातुर्मास में तपस्या का अनूठा ठाट लगा है।
पूजनीया बहिन म. डा. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. की शिष्या पूजनीया साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म.सा. के मासक्षमण की महान् तपस्या चल रही है। उनके मासक्षमण की तपस्या का पारणा 21 अगस्त 2013 को संपन्न होगा। इस तपस्या के निमित्त ता. 16 से 20 अगस्त तक पंचाह्निका महोत्सव का आयोजन किया गया है। ता. 16 से 18 तक तीन दिवसीय श्री अर्हद् महापूजन का भव्यातिभव्य आयोजन किया जायेगा। ता. 19 को सिद्धचक्र महापूजन एवं ता. 20 को दादा गुरुदेव की पूजा पढाई जायेगी।
ता. 20 अगस्त को वरघोडे के भव्य आयोजन के साथ तपस्वी साध्वीजी महाराज का अभिनंदन किया जायेगा।
इसके साथ ही कई मासक्षमण, सिद्धि तप, शत्रुंजय तप, विहरमान तप आदि विविध तपस्याओं की झडी लगी हुई है।


Aug 12, 2013

-पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन



-पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

पालीताना

जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने परमात्मा नेमिनाथ प्रभु के जन्म कल्याणक के पावन अवसर पर आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला के अन्तर्गत चल रहे चातुर्मास के विशाल आराध्ाकों की ध्ार्मसभा को संबोध्ाित करते हुए कहा- चैबीस तीर्थंकरों का आन्तरिक जीवन एक जैसा है। बाह्य जीवन भले अलग अलग हों। उनके माता पिता के नाम, जन्मभूमि, जन्म तिथि यह सब अलग होंगे। परन्तु उनके अन्तर में बहता हुआ ज्ञान का झरणा एक है। उसमें कोई भेद नहीं है। सभी तीर्थंकर तीन ज्ञान के साथ ही जन्म लेते हैं। सभी तीर्थंकर दीक्षा लेते ही है। सभी तीर्थंकरों को दीक्षा लेते ही चैथा ज्ञान हो जाता है। सभी तीर्थंकरों को घाती कर्म के बाद केवल ज्ञान प्राप्त होता है। सभी तीर्थंकर मोक्ष पधारते हैं।
उन्होंने कहा- चैबीस तीर्थंकरों का जीवन अपने आप में आदरणीय और अनुकरणीय है। पुरूषार्थ का परिणाम देखना हो तो हमें परमात्मा महावीर स्वामी का जीवन पढना चाहिये। कितने कर्मों का बंधन किया किन्तु उन्हें तोडने के लिये कितनी अनूठी साधना की।
द्वेष की परम्परा का इतिहास जानना हो तो हमें पाश्र्वनाथ प्रभु का जीवन पढना चाहिये। कमठ और मरूभूति के मध्य जो वैर और शत्रुता की परम्परा चली और उस शत्रुता के कारण कमठ ने अपनी दुर्गति कर ली।
कर्म बंधन के परिणाम को समझना हो तो परमात्मा आदिनाथ का जीवन पढना चाहिये। उससे बोध होता है कि एक छोटा सा कर्म बंधन कितनी बडी सजा देता है। उन्होंने पूर्व भव में एक बैल के मुख पर छींका बांधा था कुछ पलों के लिये। परिणाम स्वरूप उनको चार सौ दिन तक आहार पानी कुछ नहीं मिला। उपवास करने पडे।
यदि राग की विशुद्ध परिणति देखनी हो तो हमें परमात्मा नेमिनाथ प्रभु के जीवन का अवलोकन करना चाहिये। वे भगवान् श्री कृष्ण के भ्राता थे। कहा जाता है कि जब वे शादी के लिये बारात के लिये जा रहे थे। उन सभी के लिये मांसाहार का भोजन बनाने के लिये पशुओं को बाडे में बांधा गया था। जिसे नेमिनाथ प्रभु ने छुडाये थे।
उन्होंने कहा- नेमिनाथ प्रभु ने पशुओं को बंधन से मुक्त किया, यह बात बराबर है। परन्तु उन पशुओं को मांसाहार के लिये नहीं बांधा गया था। नेमिनाथ प्रभु स्वयं अहिंसा के अवतार थे। उनके समधी भी अहिंसा के ही पुजारी थे। मांसाहार करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। परन्तु वे पशु शाम के समय अपने अपने घर जा रहे थे। रास्ता वही राजमार्ग वाला था। इधर बारात का समय हो गया था। इसलिये मुहूत्र्त टल न जाय इसलिये राजकर्मचारियों ने पशुओं को तब तक एक अस्थायी बाडे में डाल दिया, जब तक बारात राज महल में नहीं पहुॅच जाती।
पर बाडे के कारण पशु भयभीत हो गये। उनके आत्र्तनाद को प्रभु नेमिनाथ ने सुना, और कहा कि पशुओं को थोडी देर के लिये भी बंधन में डालना हिंसा है। और उन्हें बंधन मुक्त कर दिया।
इस अवसर पर पूजनीया बहिन म. डाॅ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- जगत की सभी वस्तुओं का आदान प्रदान किया जा सकता है । पर आत्म-ज्ञान तो स्वयं की साधना ही परिणाम है । उसे कोई दे नहीं सकता ! कोई ले नहीं सकता । उसे तो खुद तप कर ही प्राप्त करना होता है । जगत में जितने भी मंत्र तंत्र यंत्र चलते हैं वे सभी मात्र संसार के साधनों की प्राप्ति का कारण हो सकते हैं परन्तु आत्म तत्व की प्राप्ति के लिये कोई मंत्र उपयोगी नहीं हो सकता । उसके लिये तो ये सारे मंत्र मात्र षड्यंत्र का हिस्सा है । आत्म तत्व की प्राप्ति के लिये स्वयं के आचरण की शुद्धि अनिवार्य है।
मुंबई से भाजपा विधायक श्री मंगलप्रभातजी लोढा ने पूज्यश्री के आशीर्वाद ग्रहण किया। उन्होंने पूज्यश्री के साथ तत्वचर्चा की। इचलकरंजी से संघ उपस्थित हुआ। पूज्यश्री से चातुर्मास करने की विनंती की।
बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से महाआरती का आयोजन किया गया। जिसमें 1500 लोगों ने भाग लिया। सभी ने दीपक लेकर सामूहिक रूप से परमात्मा की आरती की।

प्रेषक-दिलीप दायमा
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Aug 10, 2013

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 10 जुलाई 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला के अन्तर्गत चल रहे चातुर्मास के विशाल आराध्ाकों की ध्ार्मसभा को संबोध्ाित करते हुए कहा- मैं कौन हूॅं, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूॅं? कहाॅं से आया हूॅ? किस दिशा से आया हूॅ? और कहाॅं जाना है?
उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूॅं और कल भी रहूॅंगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सकता।
उन्होंने कहा- संसार के साधनों को पाने और खोने में हमने अपनी कई जिन्दगियाॅं गॅवा दी। संसार से कभी भी किसी को भी न कभी सुख हुआ है, न होगा। संसार से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। कितना भी अधिक हो, कम ही लगता है।
उन्होंने कहा- परमात्मा से संसार की प्रार्थना करने वाला व्यक्ति धर्म से नासमझ है। जिसने धर्म को समझा है, वह व्यक्ति सुख पाने या दुख मिटाने की प्रार्थना नहीं करता। वह सुख दुख में समभाव में रहने का संकल्प चाहता है। वह यही प्रार्थना करेगा कि सुख कितना भी हो, प्रभो! मुझे वह शक्ति देना, जिससे मेरे मन में उस सुख के प्रति आसक्ति का भाव नहीं जगे! अहंकार का भाव मन में नहीं आने पाये। दुख को दूर करने की बजाय वह यह प्रार्थना करेगा कि प्रभो! दुख में भी आपका स्मरण सदा बना रहे और दुख में भी सुख का अनुभव करूॅं, ऐसी शक्ति वह चाहता है।
उन्होंने कहा- मैं कहाॅं से आया हूॅं, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न है- मुझे कहाॅं जाना है? आगे की चिंता करो और अभी से चिंता करो। अपने भविष्य का निर्माण हमें ही करना है। हमारे अपने ही हाथों में है हमारा भविष्य!
यह हमारा स्थायी ठिकाना नहीं है। यहाॅं से तो हमें चलना ही पडेगा। पर कहाॅं जाना है, इसका निर्णय हमारा आचरण करेगा। इसलिये अपने आचरण पर लगातार निगाह रखो।
चातुर्मास की प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाॅ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- जीवन में यदि किसी का मूल्य आंकना है तो अपना मूल्य आंको। स्वयं के मूल्य से बढ कर इस दुनिया में और किसी पदार्थ का मूल्य नहीं है। जो स्वयं को पा लेता है, वह सबको पा लेता है। फिर कुछ भी पाना उसके लिये शेष नहीं रहता।
जो व्यक्ति सवयं को खोकर जगत का सारा ऐश्वर्य और वैभव पा ले, तब भी वह अपूर्ण और अधूरा है। परंतु जिसके पास कुछ भी नहीं है। परंतु आत्म धुन एवं आत्म ज्ञान है, निश्चित ही वह सबसे बडा अमीर और समृद्ध है।
चातुर्मास आयोजक रायचंद दायमा ने पूज्य गुरुदेव श्री की स्तुति की। आयोजक बाबुलाल लूणिया से बाहर से पधारे अतिथियों का स्वागत किया। बाडमेर, भिवंडी, मालेगाॅंव, सूरत, कोटा, जयपुर, दिल्ली आदि अनेक स्थानों से यात्रियों का आगमन हुआ, जिनका आयोजक परिवार द्वारा बहुमान किया गया।

प्रेषक
दिलीप दायमा

Aug 9, 2013

पूज्य उपाध्याय गुरुदेवजी श्री का प्रवचन



  पूज्य उ  पाध्याय गुरुदेवजी श्री का प्रवचन
 
  जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय  प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला के अन्तर्गत चल रहे चातुर्मास के विशाल आराध्ाकों की ध्र्मसभा को संबोधित करते हुए कहा- परमात्मा के पास हमें याचक बन कर नहीं, अपितु प्रेमी बन कर जाना होता है। जो याचक बन कर जाता है, वह कुछ प्राप्त करता है और जो प्रेमी बन कर जाता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास आयोजन के अन्तर्गत उन्होंने कहा- हम सभी बीमार है। हमारी बीमारी कोई एक दिन की नहीं है, अपितु जन्मों जन्मों की है। जन्मों जन्मों से हमारी यात्रा का प्रवाह जारी है। यही सबसे बडी बीमारी है। इस जगत में चार प्रकार के व्यक्ति है। एक वे जो बीमार तो हैं, पर अपनी बीमारी का बोध्ा नहीं है। दूसरे वे जिन्हें अपनी बीमारी के बारे सिर्फ पता है। उसके आगे कुछ नहीं। तीसरे वे जिनके मन में अपनी बीमारी को दूर करने का भाव है। चैथे वे जो अपनी बीमारी को दूर करने के लिये पुरूषार्थ कर रहे हैं।
हमें अपने बारे में निर्णय करना है कि हम किस श्रेणी के हैं। यह बीमारी कर्मों की है... मिथ्यात्व की है। इस जगत में करोडों लोग ऐसे हैं, जिन्हें अपनी बीमारी का बोध्ा ही नहीं है। वे व्यक्ति ही अपनी बीमारी से मुक्त हो पाते हैं जो उसे दूर करने का पुरूषार्थ करते हैं।
उन्होंने भक्तामर स्तोत्र का उदाहरण देते हुए कहा- पुरूषार्थ का क्षण अद्वितीय होता है। उसमें इतनी शक्ति है कि वह जन्मों जन्मों के पाप पल भर में समाप्त कर देता है। अंध्ोरा कितना भी गहरा क्यों न हो, उसे दूर करने के लिये सूर्य की एक किरण पर्याप्त है। उसी प्रकार जो व्यक्ति हृदय से परमात्मा की भक्ति करता है, उसकी एक क्षण की भक्ति पापों के विशाल ढेर को नष्ट कर देती है।
उन्होंने कहा- श्रीमद् देवचन्द्रजी महाराज प्रथम आदिनाथ प्रभु के स्तवन में यही बात फरमाते हैं, जो हृदय से परमात्मा से प्रेम करता है, वह सदा सदा भक्त नहीं बना रहता बल्कि वह भगवान बन जाता है। वह परमात्मा के समकक्ष हो जाता है।
पूज्य मुनि श्री मोक्षप्रभसागरजी म. सा. ने पूज्य गुरुदेव उपाध्यायश्री का परिचय विस्तार से दिया। उन्होंने कहा- पूज्य गुरुदेवश्री परम सरल स्वभावी एवं आराध्ाक मुनि है। वे समता के सागर है।
पूजनीया बहिन म. डाॅ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने दोपहर में प्रवचन फरमाते हुए कहा- दो ध्ााराऐं हैं, एक प्रभुता की और दूसरी पशुता की। मानव जीवन एक ऐसा केन्द्र है, जहाॅं से अपनी प्रवृत्तियों द्वारा वह दोनों ही दिशाओं में मुड सकता है। वह प्रभुता की दिशा में भी कदम बढा सकता है और वह चाहे तो पशुता की ओर भी अग्रसर हो सकता है।
उन्होंने कहा- हममें अनन्त क्षमताऐं विद्यमान है। चैतन्य अनंत शक्ति का स्वामी है। पदार्थवादी दृष्टिकोण विकसित करके हमने अपने चैतन्य की उपेक्षा कर दी है। अगर हम चैतन्य पर ध्यान केन्द्रित करें तो प्रभुता की ओर गतिशील हो सकते हैं। अगर हम अपनी वृत्तियाॅं मलीन या अशुद्ध कर दें तो हमारे भीतर के स्राव भी अशुद्ध हो जायेंगे। तब हम पशुता की ओर बढ जायेंगे।
उन्होंने कहा- प्रभु का आलंबन हमें जगाता है। हमारे जीवन की क्रियाओं और आचरणों को बदलता है। पदार्थ का आलंबन पशु बनाता है और प्रभु का आलंबन हमें प्रभु बनाता है।
आज पूजनीया साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म.सा. के 19 वें उपवास की शाता सकल श्री संघ ने पूछी। चातुर्मास आयोजक बाबुलाल लूणिया ने बताया कि ता. 16 सितम्बर से जो उपध्ाान तप का प्रारंभ हो रहा है, उसमें अध्ािक से अध्ािक आराध्ाकों को भाग लेकर तपस्या करनी है।
आयोजक रायचंद दायमा ने भक्ति गीत व गुरूगुण गीत गाया। मालेगांव से पध्ाारे श्री जिनकुशलसूरि दादावाडी बाडमेर संघ का अभिनंदन किया गया।

प्रेषक
दिलीप दायमा

Aug 1, 2013

Palitana Tirth Darshan


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Palitana is the greatest and biggest pilgrimage center and sacred place of Jains. The Shwetambar Jain community believes that the hill of Palitana (Siddhachal) is eternal. Rshabhadev (Adinath), the first Jain Tirthankara, came here several times and preached. Billions of monks and nuns have attained Nirvana (Salvation) from this hill from times immemorial.
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It is also believed that hundred millions monks leaded by Dravida andVarikhilla attained here Nirvana on the auspicious day of Kartika Purnima(Full moon day in the month of Kartika according to Indian lunar calendar) and fifty millions leaded by Nami and Vinami on Chaitri Purnima (Full moon day in the month of Chaitra according to Indian lunar calendar).
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Palitana is a city in Bhavnagar district, Gujarat, India. It is located 50 km southwest of Bhavnagar city .
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The Palitana temples are considered the most sacred pilgrimage place (tirtha) by the Jain community, and is the world's largest Temple Complex. There are more than 3000 temples located on the Shatrunjaya hills, exquisitely carved in marble. The main temple on top of the hill, is dedicated to 1st tirthankar lord Adinath (Rishabdeva).
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On the top the Shatrunjai Hill is a cluster of Jain temples, built by generations of Jains over a period of 900 years, from the 11th century onwards. The temples are managed by the Anandji Kalyanji Trust of the Kasturbai Lalbhai group.
From the foot of the hill to the top there are 3,800 and odd stone steps cut to facilitate climbing.The steps were hewn out of the rock in the 13th century CE during the time of Jain minister Vastupal.
The temples are exquisitely carved in marble, veritable prayers in stone. To an observer, these appear to be ivory miniatures when seen from a distance. Created by master craftsmen, the most important temple is that of the first teerthankara, Shri Adishwar. It has ornate architectural motifs, though in its overall plan it is simpler than the Choumukh.
Other notable temples are those of Kumarpal, Vimalshah and Sampriti Raja. Kumarpal Solanki, a great Jain patron, probably built the earliest temple. The temple has a fabulous collection of jewels, and these can be seen with special permission.
The temples date from 11th to the 20th century
On one special day (Fagun Sud 13), which usually falls in February/March of every year (According to Hindu Calender, it is 13th Day of Sud Cycle in the month of Falgun) there is a huge crowd of thousands of people visiting its place as it is said that on this particular day, millions of Jain followers attained salvation from this Hill. Also the pilgrim on that day is almost 3 times as compared to any other day which is also called as "6 Gaon" which is approximately 15-18 Kilometers of walk and climbing of Hilly terrain.
Every devout Jain aspires to climb to the top of the mountain at least once in his lifetime, because of its sanctity. The journey is arduous. The walk up the stone stairway hewn into the mountain face takes about an hour and a half. For those unable or unaccustomed to the strain, sling-chairs are available at a bargain.The code for the climbers is stringent, in keeping with the rigours of the Jain faith. Food must neither be eaten nor carried on the way.They can, however, drink water and water posts are provided all along the route
Moti Shah Toonk (Temple) at the top of Siddhachal hills   
The descent must begin before it is evening, for no soul can remain atop the sacred mountain during the night. Such is the mystique of Palitana, the summit of Shatrunjaya. While atop one can also visit a Muslim shrine of Angar Pir. The childless women seek the Pir's blessings to be blessed with children. They offer miniature cradles to the Pir and the shrine is strewn with such cradles.
Facts about Palitana :
Shetrunjay Temples: Steps: 3364
Height: 2000 ft; 7.5 miles
Pratima (Idols): 27007 Jinmandir: 3507
A recently concluded count reveals that there are a total of more than 27,000 idols of jain god on this mountain alone
No one is allowed to sleep overnight including the priest, because the temple city has been built as an abode for the Gods
There are 900 temples big and small on the two summits. The sculptures that adorn the marble temples present a feast to the eyes. You need not be a Jain to admire the spectacle. Generations of Jain all over the country have contributed their mite to make Shatrunjay Hill what it is today.
Samavasharana temple in Palitana valley   
It is said all the Jain Tirthankars, excepting Neminath, had attained nirvan on Shatrunjay Hill. This fact adds to the veneration the devout have for the place. The place is therefore called Siddhakshetra where one attains moksh.The mountain is associated with Rishabhdev, the first Tirthankar who is also known as Adinath.
Carving in lime in Neminath Temple, Shatrunjay Hills, Palitana   
The main temple at the top contains his idol in padmasan. He belonged to the Ikshvaku Dynasty of Ayodhya. So Rama was his ancestor. Adinath visited the Shatrunjay Hill 93 times.
Every shrine has idols of Tirthankars adorned with jeweled eyes.
Jain sacred symbol Hrimkara with 24 Tirthankaras   
Jain sacred symbol Omkara with Pancha Parameshthi
Tirthankar Sumatinath, Mulanayaka, Sancha Sumatinath Temple, Talheti, Palitana.   
Sri Adinath Rshabh Deva, Mulanayak, Agam mandir, Palitana Talheti   
May Lord Rishabhadeva in Palitana make our lives as blissful as this temple. My humble pranams to all the sacred Gods and Goddesses at this holy abode of the first Tirthankar who is also know

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