Sep 28, 2013

JAY JAY SHREE AADINATH JAY JAY SHREE PARSWANATH

JAY JAY SHREE AADINATH 

JAY JAY SHREE PARSWANATH


JAY JAY SHREE AADINATH 
JAY JAY SHREE PARSWANATH

Sep 24, 2013

जीवन तो युवावस्था का ही


-मणिप्रभसागर

जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आयोजित ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- हमें समझ ही नहीं आता और जिन्दगी पूरी हो जाती है। जिन्दगी का अर्थ समझ में आने से पहले ही हमारी अर्थी निकल जाती है।

Sep 20, 2013

Nice Story

अदभुत कथा-

लिखने वाले व्यक्ति को तहे दिल से
नमन.......
कहानी कुछ यूँ है--------

..................................................................................
इस साल मेरा सात वर्षीय बेटा दूसरी
कक्षा मैं प्रवेश पा गया ....
क्लास मैं हमेशा से अव्वल आता रहा है !

पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी
स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए
बाज़ार ले गया !

बेटे ने जूते लेने से ये कह कर मना कर
दिया की पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी
मरम्मत की जरुरत है वो अभी इस
साल काम दे सकते हैं!

अपने जूतों की बजाये उसने मुझे अपने
दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के
लिए नया चश्मा बनवाने को कहा !

मैंने सोचा बेटा अपने दादा से शायद
बहुत प्यार करता है इसलिए अपने
जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा
जरूरी समझ रहा है !

खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा
और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर
पहुंचा.....
दुकानदार ने बेटे के साइज़ की सफ़ेद
शर्ट निकाली ...
डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट
थी.....
फिर भी बेटे ने थोड़ी लम्बी शर्ट
दिखाने को कहा !!!!

मैंने बेटे से कहा :बेटा ये शर्ट तुम्हें
बिल्कुल सही है तो फिर और लम्बी
क्यों ?

बेटे ने कहा :पिता जी मुझे शर्ट निक्कर
के अंदर ही डालनी होती है इसलिए
थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं
पड़ेगा.......
लेकिन यही शर्ट मुझे अगली क्लास में
भी काम आ जाएगी ......
पिछली वाली शर्ट भी अभी नयी जैसी
ही पड़ी है लेकिन छोटी होने की वजह
से मैं उसे पहन नहीं पा रहा !

मैं खामोश रहा !!

घर आते वक़्त मैंने बेटे से पूछा :तुम्हे
ये सब बातें कौन सिखाता है बेटा ?

बेटे ने कहा: पिता जी मैं अक्सर देखता
था कि कभी माँ अपनी साडी छोड़कर
तो कभी आप अपने जूतों को छोडकर
हमेशा मेरी किताबों और कपड़ो पैर
पैसे खर्च कर दिया करते हैं !

गली- मोहल्ले में सब लोग कहते हैं के
आप बहुत ईमानदार आदमी हैं और
हमारे साथ वाले राजू के पापा को सब
लोग चोर, कुत्ता, बे-ईमान, रिश्वतखोर
और जाने क्या क्या कहते हैं, जबकि
आप दोनों एक ही ऑफिस में काम
करते हैं.....

जब सब लोग आपकी तारीफ करते हैं
तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है.....
मम्मी और दादा जी भी आपकी
तारीफ करते हैं !

पिता जी मैं चाहता हूँ कि मुझे कभी
जीवन में नए कपडे, नए जूते मिले या
न मिले
लेकिन कोई आपको चोर, बे-ईमान,
रिश्वतखोर या कुत्ता न कहे !!!!!

मैं आपकी ताक़त बनना चाहता हूँ
पिता जी, आपकी कमजोरी नहीं !

बेटे की बात सुनकर मैं निरुतर था!
आज मुझे पहली बार मुझे मेरी
ईमानदारी का इनाम मिला था !!

आज बहुत दिनों बाद आँखों में ख़ुशी,
गर्व और सम्मान के आंसू थे...

Sep 17, 2013

Ajitshanti Stotra by Maniprabhsagarji ms



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kalash, dhwaja, jain flag, flag,

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Sep 16, 2013

Namiun Stotra by Maniprabhsagarji ms


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सबसे छोटा आराधक आव्हान योगेशजी सिरोया मुंबई

AVHAN YOGESH SIROYA

सबसे छोटा आराधक आव्हान योगेशजी सिरोया मुंबई 




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Sep 13, 2013

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन


ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है?
उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सकता।
उन्होंने कहा- संसार के साधनों को पाने और खोने में हमने अपनी कई जिन्दगियाँ गँवा दी। संसार से कभी भी किसी को भी न कभी सुख हुआ है, न होगा। संसार से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। कितना भी अधिक हो, कम ही लगता है।
उन्होंने कहा- परमात्मा से संसार की प्रार्थना करने वाला व्यक्ति धर्म से नासमझ है। जिसने धर्म को समझा है, वह व्यक्ति सुख पाने या दुख मिटाने की प्रार्थना नहीं करता। वह सुख दुख में समभाव में रहने का संकल्प चाहता है। वह यही प्रार्थना करेगा कि सुख कितना भी हो, प्रभो! मुझे वह शक्ति देना, जिससे मेरे मन में उस सुख के प्रति आसक्ति का भाव नहीं जगे! अहंकार का भाव मन में नहीं आने पाये। दुख को दूर करने की बजाय वह यह प्रार्थना करेगा कि प्रभो! दुख में भी आपका स्मरण सदा बना रहे और दुख में भी सुख का अनुभव करूँ, ऐसी शक्ति वह चाहता है।
उन्होंने कहा- मैं कहाँ से आया हूँ, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न है- मुझे कहाँ जाना है? आगे की चिंता करो और अभी से चिंता करो। अपने भविष्य का निर्माण हमें ही करना है। हमारे अपने ही हाथों में है हमारा भविष्य!
यह हमारा स्थायी ठिकाना नहीं है। यहाँ से तो हमें चलना ही पडेगा। पर कहाँ जाना है, इसका निर्णय हमारा आचरण करेगा। इसलिये अपने आचरण पर लगातार निगाह रखो।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- तीर्थ यात्रा का अर्थ होता है, हमें अपने जीवन में से क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, ईष्र्या आदि दुर्गुणों को देश निकाला देना। उसी व्यक्ति की तीर्थ यात्रा सफल मानी जाती है, जो यहाँ कुछ छोड कर जाता है और यहाँ से कुछ लेकर जाता है।
हमें यहाँ से लेकर जाना है, परमात्मा की भक्ति, परोपकार का भाव, सरलता और सहजता! छोड कर जाना है दुर्गुणों का भंडार!
आज जसोल से 180 श्रावक श्राविकाओं का संघ पूज्य गुरुदेवश्री के दर्शनार्थ उपस्थित हुआ। उनका चातुर्मास आयोजक श्री बाबुलालजी लूणिया एवं श्री रायचंदजी दायमा परिवार की ओर से भावभीना अभिनंदन किया गया। यह ज्ञातव्य है कि जसोल में अतिप्राचीन श्री शांतिनाथ जिन मंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा 19 जनवरी 2011 को पूज्यश्री की निश्रा में संपन्न हुई थी।
प्रेषक
दिलीप दायमा




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Palitana Chaturmaas

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है?
उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सकता।
उन्होंने कहा- संसार के साधनों को पाने और खोने में हमने अपनी कई जिन्दगियाँ गँवा दी। संसार से कभी भी किसी को भी न कभी सुख हुआ है, न होगा। संसार से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। कितना भी अधिक हो, कम ही लगता है।
उन्होंने कहा- परमात्मा से संसार की प्रार्थना करने वाला व्यक्ति धर्म से नासमझ है। जिसने धर्म को समझा है, वह व्यक्ति सुख पाने या दुख मिटाने की प्रार्थना नहीं करता। वह सुख दुख में समभाव में रहने का संकल्प चाहता है। वह यही प्रार्थना करेगा कि सुख कितना भी हो, प्रभो! मुझे वह शक्ति देना, जिससे मेरे मन में उस सुख के प्रति आसक्ति का भाव नहीं जगे! अहंकार का भाव मन में नहीं आने पाये। दुख को दूर करने की बजाय वह यह प्रार्थना करेगा कि प्रभो! दुख में भी आपका स्मरण सदा बना रहे और दुख में भी सुख का अनुभव करूँ, ऐसी शक्ति वह चाहता है।
उन्होंने कहा- मैं कहाँ से आया हूँ, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न है- मुझे कहाँ जाना है? आगे की चिंता करो और अभी से चिंता करो। अपने भविष्य का निर्माण हमें ही करना है। हमारे अपने ही हाथों में है हमारा भविष्य!
यह हमारा स्थायी ठिकाना नहीं है। यहाँ से तो हमें चलना ही पडेगा। पर कहाँ जाना है, इसका निर्णय हमारा आचरण करेगा। इसलिये अपने आचरण पर लगातार निगाह रखो।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- तीर्थ यात्रा का अर्थ होता है, हमें अपने जीवन में से क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, ईष्र्या आदि दुर्गुणों को देश निकाला देना। उसी व्यक्ति की तीर्थ यात्रा सफल मानी जाती है, जो यहाँ कुछ छोड कर जाता है और यहाँ से कुछ लेकर जाता है।
हमें यहाँ से लेकर जाना है, परमात्मा की भक्ति, परोपकार का भाव, सरलता और सहजता! छोड कर जाना है दुर्गुणों का भंडार!
आज जसोल से 180 श्रावक श्राविकाओं का संघ पूज्य गुरुदेवश्री के दर्शनार्थ उपस्थित हुआ। उनका चातुर्मास आयोजक श्री बाबुलालजी लूणिया एवं श्री रायचंदजी दायमा परिवार की ओर से भावभीना अभिनंदन किया गया। यह ज्ञातव्य है कि जसोल में अतिप्राचीन श्री शांतिनाथ जिन मंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा 19 जनवरी 2011 को पूज्यश्री की निश्रा में संपन्न हुई थी।

प्रेषक
दिलीप दायमा


Palitana Chaturmaas


पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है?
उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सकता।
उन्होंने कहा- संसार के साधनों को पाने और खोने में हमने अपनी कई जिन्दगियाँ गँवा दी। संसार से कभी भी किसी को भी न कभी सुख हुआ है, न होगा। संसार से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। कितना भी अधिक हो, कम ही लगता है।
उन्होंने कहा- परमात्मा से संसार की प्रार्थना करने वाला व्यक्ति धर्म से नासमझ है। जिसने धर्म को समझा है, वह व्यक्ति सुख पाने या दुख मिटाने की प्रार्थना नहीं करता। वह सुख दुख में समभाव में रहने का संकल्प चाहता है। वह यही प्रार्थना करेगा कि सुख कितना भी हो, प्रभो! मुझे वह शक्ति देना, जिससे मेरे मन में उस सुख के प्रति आसक्ति का भाव नहीं जगे! अहंकार का भाव मन में नहीं आने पाये। दुख को दूर करने की बजाय वह यह प्रार्थना करेगा कि प्रभो! दुख में भी आपका स्मरण सदा बना रहे और दुख में भी सुख का अनुभव करूँ, ऐसी शक्ति वह चाहता है।
उन्होंने कहा- मैं कहाँ से आया हूँ, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न है- मुझे कहाँ जाना है? आगे की चिंता करो और अभी से चिंता करो। अपने भविष्य का निर्माण हमें ही करना है। हमारे अपने ही हाथों में है हमारा भविष्य!
यह हमारा स्थायी ठिकाना नहीं है। यहाँ से तो हमें चलना ही पडेगा। पर कहाँ जाना है, इसका निर्णय हमारा आचरण करेगा। इसलिये अपने आचरण पर लगातार निगाह रखो।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- तीर्थ यात्रा का अर्थ होता है, हमें अपने जीवन में से क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, ईष्र्या आदि दुर्गुणों को देश निकाला देना। उसी व्यक्ति की तीर्थ यात्रा सफल मानी जाती है, जो यहाँ कुछ छोड कर जाता है और यहाँ से कुछ लेकर जाता है।
हमें यहाँ से लेकर जाना है, परमात्मा की भक्ति, परोपकार का भाव, सरलता और सहजता! छोड कर जाना है दुर्गुणों का भंडार!
आज जसोल से 180 श्रावक श्राविकाओं का संघ पूज्य गुरुदेवश्री के दर्शनार्थ उपस्थित हुआ। उनका चातुर्मास आयोजक श्री बाबुलालजी लूणिया एवं श्री रायचंदजी दायमा परिवार की ओर से भावभीना अभिनंदन किया गया। यह ज्ञातव्य है कि जसोल में अतिप्राचीन श्री शांतिनाथ जिन मंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा 19 जनवरी 2011 को पूज्यश्री की निश्रा में संपन्न हुई थी।

प्रेषक
दिलीप दायमा


Sep 9, 2013

SAMVATSARI MAHAPARVA NEWS


पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 9 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वािधराज संवत्सरी महापर्व के अवसर पर श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा के मध्य आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- आज क्षमायाचना का महापर्व है। ऐसा कोई व्यक्ति मिलना दुर्लभ है, जिसने अपने जीवन में कभी न कभी कोई न कोई गलती नहीं की हो। मनुष्य मात्र, गलती का पात्र है। लेकिन संवत्सरी का ऐसा विशिष्ट अवसर है, जब हमें अपना मनोमालिन्य धो देना है। अपने द्वारा हुई गलतियों के लिये क्षमा मांगनी है। और दूसरों के द्वारा हुई गलतियों को क्षमा कर देना है।
उन्होंने कहा- क्षमा मांगना बहुत आसान है, परन्तु क्षमा करना बहुत मुश्किल है। हमें हमारी गलतियों का स्मरण रहता है। इसलिये हम अपनी गलतियों के लिये बहुत आसानी से क्षमा मांग लेते हैं। परन्तु दूसरों की गलतियाँ हमारे हृदय में बिच्छु के डंक की भांति लगातार चुभती रहती है। उसके द्वारा क्षमा मांगने पर भी हम उसे क्षमा नहीं कर पाते। क्योंकि तब हमारे हृदय में तर्क और शंका पैदा होती है कि इसने क्षमा मन से नहीं मांगी है, उपर उपर से मांगी है। या इसने क्षमा मांगी ही नहीं है, तो मैं क्यों दूं।
जब मैं अपनी गलती के लिये क्षमा मांगता हूँ, तब मैं तुरंत चाहता हूँ कि सामने वाला बिना तर्क किये मुझे क्षमा कर दे। पर जब कोई दूसरा अपनी गलती के लिये मुझसे क्षमा मांगता है, तब मैं तर्क करने लगता है। यह अहंकार का जाल है। आज संवत्सरी महापर्व का महाप्रतिक्रमण करने से पूर्व इस अहंकार के जाल को तोड देना है।
मूल बारसा सूत्र की विवेचना करते हुए पूज्यश्री ने कहा- परमात्मा महावीर की वाणी कहती है कि गुरु और शिष्य में यदि कोई विवाद हो जाये, तो शिष्य को चाहिये कि वह गुरु के पास जाये और परस्पर क्षमायाचना कर ले। यदि शिष्य अहंकारी होने के कारण नहीं जाता हो, ऐसी स्थिति में गुरु को चाहिये कि वह स्वयं चल कर शिष्य के पास जाये और क्षमायाचना कर ले। यह क्षमा की महिमा है।
उन्होंने कहा- संवत्सरी के दिन समस्त मंदिरमार्गी समाज में मूल बारसा सूत्र का वांचन होता है। भले हमें प्राकृत भाषा न आने के कारण इसका अर्थ समझ में नहीं आता हो, तब भी मूल सूत्र के श्रवण से हमारी चेतना शुद्ध हो जाती है।
उन्होंने वैज्ञानिक प्रयोग का अवतरण करते हुए कहा- किसी भी वस्तु के समक्ष जब स्वर, स्थान, प्रयत्न आदि की शुद्धता के साथ मंत्रोच्चारण किया जाता है, तो उस वस्तु का घनत्व बढ जाता है। और उसके आभामंडल में चमत्कारी परिवर्तन होना प्रारंभ हो जाता है। जब किसी जड द्रव्य में ऐसा चमत्कार घट सकता है तो हम तो चेतनायुक्त हैं। परम श्रद्धा और स्थिरता के साथ मूल सूत्र का श्रवण करने से हमारा आभामंडल परिष्कृत होता है, शुद्ध होता है।
प्रवचन पाण्डाल में लगभग तीन हजार लोगों की उपस्थिति में प्रात: 7 बजे मूल बारसा सूत्र का वांचन पूज्य उपाध्यायश्री के शिष्य पूज्य मुनि श्री मनितप्रभसागरजी महाराज द्वारा किया गया। संपूर्ण मौन एवं स्थिरता के साथ चले इस पाठ का पारायण साढे आठ बजे तक हुआ। जनसमुदाय ने धन्य धन्य जिन वाणी कह कर परमात्मा के इस सूत्र को बधाया।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- जीवन भूलों से भरा है । जाने- अनजाने गलतियाँ हो ही जाती है । कभी गलतफहमी होती है तो कभी किसी के भरमाये जाने पर भूल कर बैठते है । परन्तु जिसे अपनी भूल का भूल के रूप में अहसास हो जाय और ऐसा अनुभव होने पर जिसकी आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित हो जाय तो समझना चाहिये कि उसने बहुत बडा प्रायश्चित्त कर लिया ।
उन्होंने कहा- भूल को भूल के रूप में स्वीकार कर पाना ही बहुत कठिन है । भूल होने के बाद हर आदमी यह अनुभव कर ही लेता है कि मेरे द्वारा गलती हो गई पर स्वीकार करने में उसका अहंकार परेशानी पैदा करता है। आज संवत्सरी महापर्व के अवसर पर हमें सबसे पहले उनसे क्षमा मांगनी है, जिनके साथ किसी कारण वैर विरोध हुआ है।
मूल सूत्र के वांचन के पश्चात् आयोजक लूणिया परिवार की श्रीमती झमूदेवी भैरूचंदजी लूणिया के मासक्षमण का अभिनंदन किया गया। साध्वी श्री शुक्लप्रज्ञाश्रीजी, साध्वी श्री निष्ठांजनाश्रीजी, साध्वी श्री सत्वबोिधश्रीजी के सिद्धि तप की अनुमोदना की गई। उसके पश्चात् तपस्वियों का वरघोडा निकाला गया।

आयोजक बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा ने बताया कि चातुर्मास को सफल बनाने में संघवी विजयराज डोसी, संघवी तेजराज गुलेच्छा, केवलचंद बोहरा, पंकज बोहरा, बाबुलाल मरडिया, घेवरचंद तातेड, समरथमल बुरड, भैरूचंद लूणिया, नरपत लूणिया, दिलीप दायमा आदि कार्यकर्ताओं का पूरा पुरूषार्थ रहा।


प्रेषक
दिलीप दायमा


Sep 8, 2013

PARYUSHAN PARVA 7th DAY

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 8 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के सातवें दिन श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा के मध्य आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- जैन शासन में समर्पण और संवेदनशीलता का विशेष महत्व है। आज जैन इतिहास की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा- जैन परम्परा में सैंकडों आचार्य हुए हैं, जिन्होंने अहिंसा और कल्याण की बलिवेदी पर अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया।
उन्होंने कहा- कष्टों को रोते हुए भोगने से वे बढते हैं और हंसते हंसते भोगने से उनकी परम्परा समाप्त हो जाती है।
उन्होंने परमात्मा आदिनाथ, नेमिनाथ एवं पाश्र्वनाथ के जीवन चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा- इन तीर्थंकरों से राग व द्वेष की परम्परा के दुष्परिणाम समझने हैं और समझ कर राग व द्वेष का त्याग करना है। राग की परम्परा का परिणाम परमात्मा नेमिनाथ के भव हैं। और द्वेष की परम्परा का परिणाम पाश्र्वनाथ के भव हैं। किसी भी प्राणी को छोटी-सी अन्तराय देने पर उसका क्या दुष्परिणाम आता है, इसका बोध हमें परमात्मा आदिनाथ के जीवन से प्राप्त होता है। उन्होंने अपने पूर्व भव में एक बैल के मुंह पर छींका बांधा था, परिणाम स्वरूप उन्हें 400 दिनों तक आहार पानी उपलब्ध नहीं हुआ।
पूज्यश्री ने गौतमस्वामी, सुधर्मास्वामी आदि पट्ट परम्परा की विशद व्याख्या करते हुए आचार्य भगवंतों के योगदान की चर्चा की।
उन्होंने जैन धर्म के विभिन्न मतों की चर्चा करते हुए कहा- श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराऐं एक ही भगवान महावीर की संतान हैं। साधना का क्रम इन परम्पराओं द्वारा ध्वनित हुआ है। ये दोनों परम्पराऐं पूर्व में क्रमश: स्थविरकल्प एवं जिनकल्प के नाम से जानी जाती है। दोनों में से किसी एक को प्राचीन कहना और दूसरी को अर्वाचीन कहना अनुचित होगा। ये दोनों ही साधना पद्धतियां  भगवान महावीर की देन है।
उन्होंने कहा- समय का प्रभाव हर परम्परा पर पडता है। बाद में अवश्य परम्पराओं में परिवर्तन आता गया। आज दोनों परम्पराऐं एक दूसरे से अलग हो गई है। जबकि मूल सिद्धान्तों में कहीं अंतर नहीं है।
उन्होंने जैन समाज की विभिन्न परम्पराओं के प्रारंभ का इतिहास सुनाते हुए कहा- खरतरगच्छ परम्परा का प्रारंभ आचार्य जिनेश्वरसूरि से वि. सं. 1075 में हुआ। जबकि अंचल गच्छ का प्रारंभ वि. सं. 1169 में आचार्य आर्यरक्षितसूरि से हुआ। तपागच्छ का प्रारंभ वि. सं. 1285 में आचार्य जगच्चंद्रसूरि से हुआ। पायछंद गच्छ का प्रारंभ 1575 में हुआ। स्थानक मत का प्रारंभ लोंका शाह से सोलहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में वि. 1531 से व तेरापंथ संप्रदाय का उद्भव आचार्य भीखणजी से वि 1816 में हुआ। जबकि तीन थुई का प्रारंभ आचार्य राजेन्द्रसूरि से लगभग 100 वर्ष पूर्व हुआ।
इस प्रकार श्वेताम्बर समाज अनेक गच्छों व संप्रदायों में बंटा।  इसी प्रकार दिगम्बर समाज भी बीसपंथ, तेरापंथ, तारणपंथ, यापनीय संघ, मूल संघ, काष्ठा संघ आदि अनेक मत मतान्तरों में विभाजित हुआ।
उन्होंने कहा- वर्तमान में समाज के अग्रगण्यों को चाहिये कि उपरी कि्रयाओं के मतभेदों में न उलझ कर मूल मान्यताओं के एक स्वरूप पर ध्यान देकर जैन धर्म के सर्वांगीण विकास का प्रयास करें।

उन्होंने कहा- कुऐं का उपरी हिस्सा भले अलग अलग हो, पर भीतर बहने वाला पानी तो एक ही है। ठीक इसी प्रकार संप्रदायों की उपरी मान्यनाऐं भले ही अलग अलग हो, पर परमात्मा महावीर की मूल वाणी तो एक ही है।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- सत्य एक है, उसे कहने के तरीके अलग अलग हो सकते हैं। उसी प्रकार जितने भी धर्म और संप्रदाय हैं, वे सभी अहिंसा और सत्य का ही पाठ पढाते हैं। हमें धर्म के नाम को नहीं बल्कि उनके सिद्धान्तों को मूल्य देना है। जहाँ सिद्धान्तों को मूल्य दिया जाता है, वहाँ परस्पर तमाम विवाद समाप्त होते हैं। वहाँ कभी भी लडाई नहीं हो सकती।
 आयोजक बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा ने बताया कि पूज्यश्री के विशिष्ट प्रवचन श्रवण करने के लिये बाहर से भीड उमड रही है। पूज्यश्री के प्रवचनों की चर्चा पूरे पालीताणा में फैली हुई है। कल प्रात: साढे छह बजे बारसा सूत्र का वांचन किया जायेगा। तथा बाद में तपस्वियों के वरघोडे का आयोजन होगा।



प्रेषक-
-दिलीप दायमा


Sep 7, 2013

PARYUSHAN PARVA 6th DAY


पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन


ता. 7 सितम्बर 2013, पालीताना

जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के छठे दिन श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों व अतिथियों की विशाल ध्ार्मसभा के मध्य आज परमात्मा महावीर के जीवन का वृत्तांत सुनाते हुए कहा- परमात्मा महावीर के जीवन की सबसे बडी विशिष्टता है कि उनका आचार पक्ष व विचार पक्ष एक समान था। मात्र उपदेश देने वाले तो हजारों हैं, पर उनका अपना जीवन अपने ही उपदेशों के विपरीत होता है। ऐसे व्यक्ति पूज्य नहीं हुआ करते। पूज्य तो वे ही होते हैं, जिनकी कथनी करणी एक समान हो।
उन्होंने कहा- आज विश्व में आसुरी प्रवृत्तियों का बोलबाला है। भौतिकता के विकास ने मानवता का विनाश किया है। सुविधाओं ने शांति के बदले अशांति दी है। दूरसंचार और आवागमन के वाहन साधनों ने विश्व की भौगोलिक दूरी को जरूर कम किया है, पर मनुष्य के बीच हृदय की दूरी अवश्य बढ गई है। आर्थिक लोभवृत्ति ने भाई भाई को लडा दिया है। पारस्परिक वैमनस्य चरम सीमा पर पहुंचा है। स्वार्थ की तराजू में मानवीय संबंध तोले जा रहे हैं। विलासिता की अंधी दौड में आदमी नग्नता का प्रदर्शन कर रहा है।
ऐसे समय में परमात्मा महावीर के अजर अमर और समय निरपेक्ष सिद्धान्त ही हमारी रक्षा कर सकते हैं। आज अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह इन तीन सिद्धान्तों को अपनाने की अपेक्षा है। ये तीन सिद्धान्तों के आधार पर पूरे विश्व में शांति और आनन्द का वातावरण छा सकता है।
उन्होंने परमात्मा महावीर के साढे बारह वर्षों में साधना काल की विवेचना करते हुए कहा- परमात्मा महावीर ने क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष इन भावों को तिलांजलि देकर मौन साधना का प्रारंभ किया। क्रोध की स्थितियों में भी वे पूर्ण करूणा के भावों से भर जाते थे। उनके जीवन की व्याख्या सुनते हुए जब उन्हें मिले कष्टों का विशद विवेचन सुनते हैं तो हमारी आंखों में अश्रु धारा बहने लगती है। संगम देव और कटपूतना के द्वारा दिये गये उपसर्गों को जब सुनते हैं तो हमारे रोंगटे खडे हो जाते हैं। परन्तु परमात्मा महावीर तो करूणा की साक्षात् मूर्ति थे। चण्डकौशिक को उपदेश देने के लिये स्वयं चल कर उसकी बाबी तक पहुँचे थे।
उन्होंने परमात्मा महावीर और गौतम स्वामी के संबंधों की व्याख्या करते हुए कहा- गुरू गौतम स्वामी के हृदय में परमात्मा महावीर के प्रति अपार प्रेम था। यही कारण था कि वे स्वयं चार ज्ञान के स्वामी होने पर भी हर सवाल परमात्मा से पूछते थे। ताकि सारी जनता को परमात्मा से उत्तर प्राप्त हो।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- हम सभी परमात्मा महावीर के अनुयायी हैं। हमें संकल्प लेना है कि हम परमात्मा जैसे भले नहीं बन पाये परन्तु परमात्मा के अनुयायीय तो अवश्य बनेंगे।
आयोजक बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा ने बताया कि आज मासक्षमण, सिद्धि तप, 21 उपवास, अट्ठाई आदि तपस्वियों का भावभीना अभिनंदन किया गया।

प्रेषक
दिलीप दायमा



Sep 5, 2013

14 SWAPNA

Jahajmandir, 

PARYUSHAN PARVA 4th DAY

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 5 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी .सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के चतुर्थ दिन श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों अतिथियों की विशाल धर्मसभा को संबोिधत करते हुए कहा- जैन आगमों में सर्वाधिक आदरणीय शास्त्र कल्पसूत्र है। क्योकि इसमें जीवन की पद्धति का विश्लेषण है। वर्तमान की घटनाओं को अतीत से जोडकर देखने की अद्भुत दृष्टि कल्पसूत्र का चिंतन हमें देता है।
उन्होंने कहा- हम वर्तमान मेें घट रही घटनाओं को केवल वर्तमान के संदर्भ में ही देखते हैं औीर इसी कारण जीवन में तनाव और बैचेनी है। भगवान महावीर के पूर्व भवों का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा- वे पूर्व भव में हमारे जैसे ही सामान्य व्यक्ति थे। जब वे किसान थे। उस जीवन में उन्होंने सच्चे साधु संतों की नि:स्वार्थ भाव से श्रद्धा भर कर जो सेवा की थी, उसी का परिणाम था कि उन्हें सम्यक् दर्शन की प्राप्ति हुई। मरीचि के भव में अपने कुल और उज्ज्वल भविष्य का अहंकार किया जिससे उन्हें दुर्गति में भी जाना पडा। और संसार का विस्तार हुआ। परमात्मा के इस पूर्वभव की घटना से हमें शिक्षा लेनी चाहिये कि व्यक्ति का सत्ता, संपत्ति, ज्ञान, रूप कुछ भी मिले, उसे पुण्य प्रकृति का परिणाम समझ कर स्वीकार तो करे परन्तु उसका अहंकार कभी करे। सत्ता संपत्ति को ऋजुता के साथ भोगे, पर घमण्ड करे।
उन्होंने कहा- कार्य करते समय व्यक्ति उसके परिणामों के बारे में विचार नहीं करता। लेकिन उसके दुष्परिणाम जब नजर आते हैं, तब व्यक्ति रोकर भी उनसे पीछा नहीं छुडा सकता।
भगवान् महावीर के जीवन चरित्र में हम सभी पढते हैं कि उनके कानों में कीलें ठोंके गये थे। क्यों ठोके गये, इस प्रश्न का समाधान कल्पसूत्र में लिखित उनके पूर्व भव देते हैं। वे सतरहवें भव में वासुदेव थे। तब आवेश में आकर एक बार उन्होंने अपने शय्यापालक के कानों में में गर्म शीशा डलवा दिया था। इस आवेश का दुष्परिणाम उनको अपने कानों में खीले ठुकवाकर भोगना पडा।
उन्होंने कहा- हर व्यक्ति को चाहिये कि वह अपने वर्तमान के विषय में जागरूक रहें, क्योंकि यही उसका भविष्य होने वाला है।
कल्पसूत्र की वांचना प्रारंभ करते हुए उन्होंने नवकार महामंत्र की व्याख्या की और णमुत्थुण स्तोत्र के द्वारा परमात्मा के दिव्य और अलौकिक स्वरूप का विवेचन किया।
आयोजक बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा ने बताया कि कल प्रतिपदा को परमात्मा का जन्म वांचन होगा। यहाँ सिद्धि तप मासक्षमण की तपस्या चल रही है। आयोजक लूणिया परिवार के श्रीमती झमूदेवी भैरूचंदजी लूणिया के मासक्षमण की तपस्या चल रही है। आज उनके 26 वें उपवास की तपस्या है।


प्रेषक
दिलीप दायमा

Sep 3, 2013

PARYUSHAN PARVA 2nd DAY

JAHAJMANDIR

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

ता. 3 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के द्वितीय दिन श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों व अतिथियों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- पर्युषण महापर्व के दिनों में अपने आचरण की विशुद्धता का संकल्प लेना है । ध्ार्म का प्राण अहिंसा है । यह एक निषेध्ाात्मक कि्रया है । अहिंसा का आध्ाार करूणा है । या यों कहें कि करूणा अहिंसा का परिणाम है । जैन दर्शन की नींव अहिंसा है । अहिंसा की परिभाषा अनेक मनीषियों ने अपने-2 दृष्टिकोणों के आध्ाार पर की है ।
JAHAJMANDIR

भगवान् महावीर ने अहिंसा को जीवन का रसायन कहकर उसकी गहरी और सूक्ष्म व्याख्या की है । किसी जीव को मारना तो हिंसा है ही, लेकिन किसी को शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट पहुँचाने को भी भगवान् महावीर ने हिंसा कहा है । यह अहिंसा का अत्यंत सूक्ष्म रूप है, जो मानवीय करूणा और दया से आप्लावित है । अहिंसा ध्ार्म की जननी है । उसे ध्ार्म नहीं कहा जा सकता जिसे निमित्त बनाकर हिंसक गतिवििध्ायाँ चलती है । भारत ध्ार्मप्राण देश है । लेकिन बदलते स्वार्थ भरे संदर्भों और स्वार्थी मानसिकता ने हृदय के करूणा-स्रोत को शुष्क कर दिया लगता है । तन मानव का और मन कसाई का हो गया प्रतीत होता है । जिस भारतभूमि पर भगवान् महावीर ने अहिंसा का उद्घोष किया, भगवान् बुद्ध ने करूणा का झरणा प्रवाहित किया, भगवान् राम ने मानवीय मर्यादाओं का बोध्ा देते हुए मानवीय गुणों को महत्ता दी, भगवान् कृष्ण ने ध्ार्म की रक्षा के लिये जीवन भर पुरूषार्थ किया व कर्मयोग का पाठ पढाया, उसी भारत वर्ष की छाती पर स्थान-2 आज कसाईखानों के ध्ाब्बे चस्पा किये जा रहे हैं । स्वाद लोलुपता और विदेशी मुद्रा के लालच ने सत्ता को मदान्ध्ा कर दिया है ।
JAHAJMANDIR
आज के दूषित वातावरण में हम अपनी भारतीयता खो चुके हैं । पाश्चात्य अनुकरण की अंध्ाी दौड में हमने अपना गौरव गिरवी रख दिया है । जहाँ आजादी के समय भारत में 300 रजि. कत्लखाने थे वहाँ आज 32 हजार से अिध्ाक कत्लखाने हैं । कई यांत्रिक कत्लखाने खोल दिये गये हैं । रोज नये कत्लखाने खोलने के प्रस्ताव किये जा रहे हैं । विदेशी मुद्रा के आकर्षण में भारतीयता कराह रही है । जिस देश का जन्म ही अहिंसा की प्राण वायु के साथ हुआ है । वहाँ इस प्रकार का हिंसक तांडव नृत्य हमारी कौन-सी मानसिकता को स्पष्ट कर रहा है ।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म. सा. ने कहा- आज हमारे भारतीय चित्त पर हिंसा, स्वार्थ और अविश्वास का मैल जम गया है । पर्युषण महापर्व उस कचरे को हटाने के लिये झाडू रूप है । इसका निष्ठा से प्रयोग करना है । करूणा और अहिंसा के कि्रयान्वयन में अहिंसा के सात्विक और दृढप्रयोग से जीवन को करूणामय बनाना है ।
आज आयोजक परिवार लूणिया एवं दायमा परिवार की ओर से चातुर्मास आराधकों का भव्यातिभव्य संगीत लहरियों के साथ अभिनंदन किया गया।

प्रेषक
दिलीप दायमा


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