Sep 20, 2014

कहानी... सारे तथ्यों और सबूतों कि जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!
हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?? यहाँ न... तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं! यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा! भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज कि रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे!
रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठा था।

Sep 15, 2014

जीवन में कई बार हम गिरते हैं, हारते हैं, हमारे लिए हुए निर्णय हमें मिटटी में मिला देते हैं. हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारी कोई कीमत नहीं है. लेकिन आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए , आपका मूल्य कम नहीं होता. आप स्पेशल हैं, इस बात को कभी मत भूलिए.

सबसे कीमती चीज
एक जाने-माने स्पीकर ने हाथ में पांच सौ का नोट लहराते हुए अपनी सेमीनार शुरू की. हाल में बैठे सैकड़ों लोगों से उसने पूछा ,” ये पांच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?” हाथ उठना शुरू हो गए.
फिर उसने कहा ,” मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूंगा पर  उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये .” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में चिमोड़ना शुरू कर दिया. और  फिर उसने पूछा,” कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए.

Sep 12, 2014

अवसर की पहचान... आपने कई बार दूसरो को ये कहते हुए सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि ‘हमे अवसर ही नही मिला’ लेकिन ये अपनी जिम्मेदारी से भागने और अपनी गलती को छुपाने का बस एक बहाना है ।

Don’t miss an opportunity.

एक बार एक ग्राहक चित्रो की दुकान पर गया । उसने वहाँ पर अजीब से चित्र देखे । पहले चित्र मे चेहरा पूरी तरह बालो से ढँका हुआ था और पैरोँ मे पंख थे ।एक दूसरे चित्र मे सिर पीछे से गंजा था।

ग्राहक ने पूछा – यह चित्र किसका है?

दुकानदार ने कहा – अवसर का ।

ग्राहक ने पूछा – इसका चेहरा बालो से ढका क्यो है?

दुकानदार ने कहा -क्योंकि अक्सर जब अवसर आता है तो मनुष्य उसे पहचानता नही है ।

ग्राहक ने पूछा – और इसके पैरो मे पंख क्यो है?

दुकानदार ने कहा – वह इसलिये कि यह तुरंत वापस भाग जाता है, यदि इसका उपयोग न हो तो यह तुरंत उड़ जाता है ।

ग्राहक ने पूछा – और यह दूसरे चित्र मे पीछे से गंजा सिर किसका है?

दुकानदार ने कहा – यह भी अवसर का है । यदि अवसर को सामने से ही बालो से पकड़ लेँगे तो वह आपका है ।अगर आपने उसे थोड़ी देरी से पकड़ने की कोशिश की तो पीछे का गंजा सिर हाथ आयेगा और वो फिसलकर निकल जायेगा । वह ग्राहक इन चित्रो का रहस्य जानकर हैरान था पर अब वह बात समझ चुका था ।

आपने कई बार दूसरो को ये कहते हुए सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि ‘हमे अवसर ही नही मिला’ लेकिन ये अपनी जिम्मेदारी से भागने और अपनी गलती को छुपाने का बस एक बहाना है । Real मे भगवा2न ने हमे ढेरो अवसरो के बीच जन्म दिया है । अवसर हमेशा हमारे सामने से आते जाते रहते है पर हम उसे पहचान नही पाते या पहचानने मे देर कर देते है । और कई बार हम सिर्फ इसलिये चूक जाते है क्योकि हम बड़े अवसर के ताक मे रहते हैं । पर अवसर बड़ा या छोटा नही होता है । हमे हर अवसर का भरपूर उपयोग करना चाहिये ।

Sep 10, 2014

दादा जिनचन्द्रसूरि जिनशासन के उज्ज्वल नक्षत्र हैं -उपाध्याय मणिप्रभसागर

इचलकरंजी ता. 10 सितम्बर 2014श्री मणिधारी जिनचन्द्रसूरि जैन श्वेताम्बर संघ के तत्वावधान में पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागर ने श्री सुखसागर प्रवचन मंडप में चतुर्थ दादा गुरुदेव श्री जिनचन्द्रसूरि की 401वीं पुण्य तिथि के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा- जिन शासन के इतिहास में केवल चार दादा गुरुदेव हुए हैं। जिन्होंने अपने संयम, त्याग, तप और आराधना साधना के बल पर जिन शासन की महती प्रभावना की। उनमें प्रथम दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरि इतिहास के उज्ज्वल नक्षत्र हैं, जिन्होंने हजारों गोत्रों की स्थापना करके जिन शासन को पूर्ण रूप से समृद्ध बनाया। उनके महाचमत्कारी चरण अहमदाबाद में दादा साहेब ना पगला में बिराजमान है। उनके चरणों से ही वह पूरा क्षेत्र दादा साहेब ना पगला के नाम से सुप्रसिद्ध हैं। जहाँ हर सोमवार को हजारों श्रद्धालु दर्शन करके अपने जीवन को धन्य बनाते हैं।
उनकी पावन परम्परा में चौथे दादा गुरुदेव हुए। उनका समय सोलहवीं व सतरहवीं शताब्दी का संधिकाल था। मात्र नौ वर्ष की उम्र में दीक्षा ग्रहण करके मात्र सतरह वर्ष की उम्र में आचार्य बन कर संपूर्ण खरतरगच्छ के अधिपति बने। उनके जीवन का सबसे महान् कार्य था- संयम की सुरक्षा करना। उस समय यतियों का शिथिलाचारियों का बोलबाला बढ गया था। उन्होंने अपनी निश्रा के समस्त यतियों को साधु होने के लिये प्रेरित किया। और आदेश दिया कि यदि साधु नहीं बन सको तो गृहस्थ हो जाओ। मगर यति की श्रेणि नहीं रहेगी। वे दृढ कि्रयापात्र आचार्य थे। उन्होंने अपने ज्ञान व साधना के बल पर सम्राट् अकबर को प्रतिबोध देकर उसे अहिंसक बनाया। सम्राट् अकबर के जीवन पर उनका अनूठा प्रभाव था। इस बात का पूरा वर्णन आइने अकबरी में साहित्यकार अबुल फजल ने किया है। उन्होंने दादा गुरुदेव के जीवन की घटनाओं का वर्णन करते हुए कहा- दादा गुरुदेव ने जिनशासन की रक्षा के लिये अमावस्या को पूर्णिमा में बदल दी थी। तथा 12-12 कोस तक पूर्णिमा की तरह चंद्रमा का प्रकाश चारों ओर फैला था। इस अवसर पर मुनि मनितप्रभसागर ने सभा का संचालन करते हुए कहा- दादा गुरूदेव जिनचन्द्रसूरि ने पूरे भारत में भ्रमण करके जिनशासन की महिमा का विस्तार किया। उन्होंने ऐसी अनूठी साधना की थी कि चमत्कार अपने आप हो जाते थे। उन्होंने खरतरगच्छ के अर्थ का विस्तार करते हुए कहा- खरे शब्द का अर्थ है प्रखरता! जहाँ प्रखरता है, जहाँ खरी कि्रया और दृढ आचार का परिपालन है, वह खरतरगच्छ है। इसी परम्परा में चार दादा गुरुदेव हुए हैं। मुनि मेहुलप्रभसागर ने दादा गुरुदेव के जीवन के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा- इन्हीं दादा गुरुदेव ने श्री सिद्धाचल के दरबार में दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरि एवं जिनकुशलसूरि के चरण बिराजमान किये थे। इन्हीं दादा गुरुदेव की कृपा से 1700 पंच धातु की प्रतिमाओं की सुरक्षा हुई थी। वे प्रतिमाऐं आज भी बीकानेर के श्री चिंतामणि मंदिर के भोंयरे में बिराजमान है। इस अवसर पर संघ के सचिव रमेश लूंकड, पूर्व अध्यक्ष संपतराज संखलेचा, बाबुलाल मालू आदि ने भी गुरुदेव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। चेन्नई से पधारे थानमल जावाल वाले, कोप्पल से आये विमल संखलेचा आदि का संघ की ओर से बहुमान किया गया।

प्रेषकरमेश लूंकडमहामंत्री

Sep 9, 2014

क्रियोद्धारक श्री जिनचन्द्रसूरि गुरुदेव का मिताक्षरी परिचय... प्रस्तुति- आर्य मेहुलप्रभसागरजी म.

जन्म नाम- सुलतान कुमार
गौत्रा- रीहड़ गौत्र
माता- सौ. श्रिया देवी
पिता- श्रेष्ठि श्रीवन्तजी शाह ओसवाल
जन्म स्थान- खेतसर जोधपुर के पास, राज.
जन्म तिथि- वि.सं. 1595, चैत्रा वदि 12
दीक्षा- वि.सं. 1604, भोपालगढ़-बडलु, राज., दादावाडी स्थल पर
दीक्षित नाम- सुमतिधीर मुनि
गुरू नाम- खरतरगच्छ नायक श्री जिनमाणिक्यसूरिजी म.
आचार्य पद- वि.सं. 1612, भादवा सुदि 9
बीकानेर चातुर्मास- रांगडी चौक स्थित बडे उपाश्रय में
सूरिमन्त्र प्रदाता- आचार्य श्री जिनगुणप्रभसूरिजी म.
क्रियाद्धार- वि.सं. 1614, चैत्र वदि 7, बीकानेर
छम्मासी तपाराधना- वि.सं. 1615, महेवा नगर में
पौषधविधि प्रकरण टीका रचना- पाटण में वि.सं. 1616
पाटण में जयपताका- वि.स. 1617 कार्तिक सुदि 7 को अनेक आचार्य की उपस्थिति में
खंभात प्रतिष्ठा- वि.स. 1618
बीकानेर प्रतिष्ठा- वि.सं. 1622, वैशाख सुदि 3
पट्टधर शिष्य दीक्षा- वि.सं. 1623, मिगसर वदि 5
पट्टधर शिष्य- मानसिंह, दीक्षित नाम- मुनि महिमराज, आचार्य नाम- श्री जिनसिंह सूरि

पूज्य आचार्य प्रवर चतुर्थ दादा गुरूदेव महान कि्रयोद्धारक श्री जिनचन्द्रसूरीश्वरजी म. को पावन पुण्यतिथि पर वंदनावली... आपकी कृपा हम पर बरसती रहे...

bilada, dada gurudev

पूज्य आचार्य प्रवर चतुर्थ दादा गुरूदेव महान कि्रयोद्धारक श्री जिनचन्द्रसूरीश्वरजी म. को पावन पुण्यतिथि पर वंदनावली... आपकी कृपा हम पर बरसती रहे...

bilada, dada gurudev, 

Sep 5, 2014

स्वयं विचार कीजिये :- क्या है सबसे बेहतर !!!

इतना कुछ होते हुए भी
शब्दकोश में असंख्य शब्द होते हुए भी...
मौन होना सब से बेहतर है।

दुनिया में हजारों रंग होते हुए भी...
सफेद रंग सब से बेहतर है।

खाने के लिए दुनिया भर की चीजें होते हुए भी...
उपवास शरीर के लिए सबसे बेहतर है।

पर्यटन के लिए रमणीक स्थल होते हुए भी..
पेड़ के नीचे ध्यान लगाना सबसे बेहतर है।

देखने के लिए इतना कुछ होते हुए भी...
बंद आँखों से भीतर देखना सबसे बेहतर है।

सलाह देने वाले लोगों के होते हुए भी...
अपनी आत्मा की आवाज सुनना सबसे बेहतर है।

जीवन में हजारों प्रलोभन होते हुए भी...
सिद्धांतों पर जीना सबसे बेहतरहै।

इंसान के अंदर जो समा जायें वो
             " स्वाभिमान "
                    और
जो इंसान के बहार छलक जायें वो
             " अभिमान "

Sep 2, 2014

मुंबई में महाचमत्कारी दादा गुरुदेव महापूजन का आयोजन



DADA GURUDEV
धर्म नगरी मुंबई में श्री जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ मुंबई के तत्वावधान में श्री मणिधारी युवा परिषद्, मुंबई द्वारा पू. साध्वी सुलोचना श्री जी म.सा की शिष्या पू. साध्वी डाँ. श्री प्रियश्रद्धांजनाश्रीजी म. आदि ठाणा की
पावन निश्रा में महाचमत्कारी दादा गुरुदेव महापूजन का भव्य आयोजन 17अगस्त 2014 को मोरारबाग वाडी में किया गया। 
इस अवसर पर पूज्य उपाध्याय प्रवर श्री मणिप्रभसागर जी म. के शिष्या पूज्य मुनि श्री मेहुलप्रभसागरजी म. द्वारा संकलित "दादा गुरुदेव की पूजा" पुस्तिका का विमोचन सुश्री मंजूजी लोढा, श्री जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के संस्थापक अध्यक्ष श्री प्रकाशजी कानुगो एवं अध्यक्ष श्री मांगीलालजी शाह द्वारा किया गया।