Dec 25, 2014

Nice STORY ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे. ऐसा शख्स जिसने सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो... बधाई हो, तुम इस जॉब के पूरे हक़दार हो...

पढ़ाई पूरी करने के बाद टॉपर छात्र बड़ी कंपनी में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा....
छात्र ने पहला इंटरव्यू पास कर लिया...
फाइनल इंटरव्यू डायरेक्टर को लेना था...
डायरेक्टर को ही तय करना था नौकरी पर रखा जाए या नहीं...
डायरेक्टर ने छात्र के सीवी से देख लिया कि पढ़ाई के साथ छात्र एक्स्ट्रा-करिकलर्स में भी हमेशा अव्वल रहा...
डायरेक्टर- क्या तुम्हे पढ़ाई के दौरान कभी स्कॉलरशिप मिली ?
छात्र- जी नहीं...
डायरेक्टर- इसका मतलब स्कूल की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे !
छात्र- हाँ श्रीमान !
डायरेक्टर- तुम्हारे पिता काम क्या करते है ?
छात्र- जी वो लोगों के कपड़े धोते है।
ये सुनकर डायरेक्टर ने कहा... ज़रा अपने हाथ
दिखाना...
छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे...
डायरेक्टर- क्या तुमने कभी पिता के कपड़े धोने में मदद की है...
छात्र- जी नहीं, मेरे पिता हमेशा यही चाहते रहे है कि मैं स्टडी करूं और ज़्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ूं। हां एक बात और, मेरे पिता मुझसे कहीं ज़्यादा स्पीड से कपड़े धोते है...
डायरेक्टर- क्या मैं तुमसे एक काम कह सकता हूं...
छात्र- जी, आदेश कीजिए !
डायरेक्टर- आज घर वापस जाने के बाद अपने पिता के हाथ धोना...फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना...
छात्र ये सुनकर प्रसन्न हो गया... उसे लगा कि जॉब मिलना पक्का है, तभी डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है...।
छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी पिता को ये बात बताई और अपने हाथ दिखाने को कहा...
पिता को थोड़ी हैरानी हुई...लेकिन फिर भी उसने बेटे की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए...।
छात्र ने पिता के हाथ धीरे-धीरे धोना शुरू किया... साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे... पिता के हाथ रेगमार की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे...यहां तक कि कटे के निशानों पर जब भी पानी डलता, चुभन का अहसास पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था...
छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये वही हाथ है जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे...
पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडमिक करियर की एक-एक कामयाबी का...।
पिता के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने पिता के उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले...
पिता रोकते ही रह गये, लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया...
उस रात बाप बेटा ने काफ़ी देर तक बात की...
अगली सुबह छात्र फिर जॉब के लिए डायरेक्टर के ऑफिस में था...।
डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं...
डायरेक्टर- हूं । तो फिर कैसा रहा कल घर पर... क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे....
छात्र ने बोलना शुरू किया।
नंबर एक...
मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है...मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था...
नंबर दो...
पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है...
नंबर तीन...
मैंने रिश्ते की अहमियत पहली बार इतनी शिद्धत के साथ महसूस की...

डायरेक्टर- यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं...मैं उसे जॉब देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे,
ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे. ऐसा शख्स जिसने सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न
बना रखा हो...
बधाई  हो, तुम इस जॉब के पूरे हक़दार हो...NICE
Moral
आप अपने बच्चों को बड़ा मकान दें, बढ़िया खाना दें, बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें... लेकिन साथ ही खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें... शिक्षा के साथ संस्कार भी बच्चों को दे। वाकिंग के साथ मंदिर जाना भी सिखाएं।
ऐसा इसलिए नहीं कि आप नोकर पर पैसा खर्च नहीं कर सकते, बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही प्यार करते हैं...आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं... सबसे अहम हैं आप के बच्चे किसी काम को करने की कोशिश की कद्र करना सीखें...
एक दूसरे का हाथ बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर लाएं...
यही है सबसे बड़ी सीख....

Dec 15, 2014

Photos बेल्लारी (कर्नाटका) में ता. 15 दिसंबर को मुमुक्षु सुश्री शिल्पा बालड़ की भागवती दीक्षा पांच दिन के महोत्सव के साथ संपन्न हुयी।दीक्षा प्रदाता - पूज्य उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.।नूतन नाम - साध्वी श्री प्रियशैलांजना श्रीजी म.

बेल्लारी (कर्नाटका) में ता. 15 दिसंबर को मुमुक्षु सुश्री शिल्पा बालड़ की भागवती दीक्षा पांच दिन के महोत्सव के साथ संपन्न हुयी।
दीक्षा प्रदाता - पूज्य उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.।
सानिध्य पूज्या साध्वी श्री पियस्मिताश्रीजी म.साध्वी श्री प्रियलता श्रीजी म.साध्वी श्री प्रियवंदना श्रीजी म.साध्वी श्री प्रियश्रद्धांजना श्रीजी म. आदि।
नूतन नाम - साध्वी श्री प्रियशैलांजना श्रीजी म.
महोत्सव आयोजक शा मीठालालजी बालड़ परिवार
गढ़सिवाना निवासी।बेल्लारी।

Dec 12, 2014

बेल्लारी कर्नाटका में मुमुक्षु सुश्री शिल्पा बॉलर की भागवती दीक्षा निमित्त आयोजन के चित्र

चलो मालपुरा।दादा गुरुदेव श्री जिनकुशलसूरीजी के चरणों में 31 दिसंबर की रात भव्य संध्या सुप्रसिद्ध गायिका अनुराधाजी पोडवाल के निर्देशन में

चलो मालपुरा।
दादा गुरुदेव श्री जिनकुशलसूरीजी के चरणों में 31 दिसंबर की रात भव्य संध्या सुप्रसिद्ध गायिका अनुराधाजी पोडवाल के निर्देशन में

पालथी मारकर बैठने का यह फायदा जान लीजिए।।। विज्ञान ने भी माना पालथी मारकर बैठने के हैं चमत्कारिक लाभ।।।

कुर्सी पर पालथी मारकर बैठना या पंजों के बल जमीन पर बैठना आधुनिक दृष्टि से भले ही हीनता का प्रतीक माना जाए पर अध्यात्मविदों के अनुसार व्यक्ति की माली हालत कैसी भी हो, उसे पालथी मार कर ही बैठना चाहिए।

यह सुविधा या स्थिति हर वक्त नहीं मिलती, पर पालथी मारकर बैठने से व्यक्ति का स्वास्थ्य, दिमाग और आत्मविश्वास मजबूत होता है।

महर्षि वेद विद्या प्रतिष्ठान के स्वामी चिदविलासानंद के मुताबिक पालथी मारकर बैठने से व्यक्ति का स्वरूप मंदिर की तरह बन जाता है और आकाश से उतरने वाली सूक्ष्म ऊर्जा सहस्त्रार चक्र के सहारे पूरे शरीर में घूम जाती है।

जबकि पैर अगर धरती पर हों तो शरीर की स्थिति तड़ितचालक जैसी हो जाती है और विद्युत ऊर्जा शरीर की यात्रा करती हुई जमीन में उतर जाती है। इस बात को वैज्ञानिक तौर पर भी करीब करीब सही पाया गया है।

पालथी मारकर भोजन करने का लाभ

कैलीफोर्निया के बर्कले इंस्टिट्यूट में हुए शोध प्रयोगों के अनुसार पालथी मारकर बैठे व्यक्ति पर आकाश से गिरी बिजली का उतना असर नहीं होता, जितना जमीन पर पैरों के तले लगाकर बैठे या खड़े व्यक्ति पर होता है।

यह बात अभी और भी अध्ययन अनुसंधान का विषय बनी हुई है। लेकिन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान के मुताबिक पालथी मारकर किया गया भोजन कुर्सी मेज पर या खड़े होकर किए गए भोजन की तुलना में जल्दी पचता है। और जरूरत से ज्यादा खाया भी नहीं जा सकता।

जमीन पर बैठ कर किए गए योग और ध्यान का अभ्यास जल्दी कारगर होते हैं। महर्षि रमण की जीवनी पर पाल रिचार्ड ने लिखा है कि भारत में योगियों को ज्यादा सफलता मिलती है, इसकी एक वजह सुखासन से बैठना या मंदिर जैसी आकृति बनाकर साधना में उतरना भी एक बड़ा कारण है।

इस तरह बैठकर योग ध्यान करने से सत्तर प्रतिशत मन की एकाग्रता ज्यादा सधती है। इस सबकी क्या वजह है, इस पर खोज चल रही है।

Sent from JAHAJ MANDIR

Dec 6, 2014

दि. 6-12-14 को हुबली नगर दादावाड़ी नूतन दीक्षित साध्वी के नाम और फ़ोटो

आज हुबली नगर दादावाड़ी नूतन दीक्षित साध्वी के नाम
  प्रेमा जीरावला 1 
प पू साध्वी विरलप्रभाश्रीजी

सुमित्रा  जीरावला 2
प पू साध्वी विपुलप्रभाश्रीजी

  ममता बागरेचा 3
प पू साध्वी विरतिप्रभाश्रीजी

शिल्पा ओस्तवाल4
प पू साध्वी विबुद्धप्रभाश्रीजी

प्रिंसी कवाड 5
प पूसाध्वी विशुध्दप्रभाश्री जी  म

दर्शना गुलेच्छा6
प पू साध्वी विश्रुतप्रभाश्रीजी