Nov 19, 2016

Jinakantisagarsuri Gurudev
सदैव कृपा की अमीवर्षा करके 
हमें सन्मार्ग प्रदर्शित करें 
इसी अभिलाषा के साथ 
पुण्यतिथि पर अनंतानंत श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हैं। 

यशस्वी पाट परम्परा पर सुशोभित जन-जन की श्रद्धा के केन्द्र, शासन प्रभावक, संयम शिरोमणि गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरिजी महाराज

यशस्वी पाट परम्परा पर सुशोभित जन-जन की श्रद्धा के केन्द्र, शासन प्रभावक, संयम शिरोमणि गच्छाधिपति  आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरिजी महाराज
आपका जन्म रतनगढ़ निवासी श्री मुक्तिमलजी सिंघी की धर्मपत्नी श्रीमती सोहनदेवी की कोख से वि.सं. 1968 माघ वदी एकादशी को हुआ था। जन्म का नाम तेजकरण था। माता-पिता तेरापंथी संप्रदाय के होने से तत्कालीन तेरापंथी समुदाय के अष्टम आचार्य श्री कालुगणि के पास 9 वर्ष की बाल्यावस्था में पिता के साथ वि.सं. 1978 में तेजकरण ने दीक्षा ग्रहण की। दीक्षित होने के बाद तेरापंथी शास्त्रों का गहनतापूर्वक अध्ययन किया। जिससे मूर्तिपूजा, मुखविस्त्रका, दया, दान आदि के सम्बन्ध में तेरापंथ सम्प्रदाय की मान्यताएं अशास्त्रीय लगी। फलत: तेरापंथ संप्रदाय का त्याग कर वि.सं. 1989 ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी को अनूपशहर में गणाधीश्वर श्री हरिसागरजी महाराज के कर कमलों से भगवती दीक्षा अंगीकार करने पर मुनि श्री कांतिसागरजी नाम पाया। 
आप प्रखर वक्ता थे। आपकी वाणी में मिठास होने के साथ ही आपका कण्ठ सुरीला एवं ओजस्वी था। आपको आगम ज्ञान के अलावा संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी, मारवाड़ी भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। आप एक अच्छे कवि थे। आप प्रवचन के समय अपने मधुर कण्ठ से व्याख्यान को कविता का रूप देने में समर्थ थे। राजस्थानी भाषा में अंजना रास, मयणरेहा रास, पैंतीस बोल विवरण आदि रचनाएं लिखी। 
आपने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, हरियाणा, जम्मु कश्मीर, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु आदि क्षेत्रों में विचरण किया। 
आपको वि.सं. 2038 आषाढ़ सुदी षष्ठी, 13 जून 1982 को जयपुर खरतरगच्छ श्रीसंघ ने आचार्य पद से विभुषित किया। 
आपने अपने दीक्षा काल में अनेक स्थानों पर जैसे- जलगांव, कुलपाक, आहोर, सम्मेतशिखर, पावापुरी, उदयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, कल्याणपुर आदि तीर्थ स्थलों पर प्रतिष्ठाएं व अंजनशलाका करवायी। अनेक उपधान तप कराये। खरतरगच्छ की मजबूती एवं वृद्धि के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। 
आपकी निश्रा में बाड़मेर से शत्रुंजय तीर्थ तक 1000 यात्रियों का एक विशाल ऐतिहासिक पैदल यात्रा संघ निकला। आप परम यशस्वी, महान शासक प्रभावक, संयम शिरोमणि एवं आध्यात्मिक प्रज्ञा पुरुष थे। आपके 11 शिष्य है जिनमें प्रथम एवं प्रमुख शिष्य प.पू. आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा. है जो वर्तमान में खरतरगच्छ के गच्छाधिपति के रूप में विराजमान है। शेष 10 शिष्यों में प.पू. उपाध्याय श्री मनोज्ञसागरजी म., मुनि मुक्तिप्रभसागरजी म., महोपाध्याय ललितप्रभसागरजी म., मुनि श्री चन्द्रप्रभसागरजी म. आदि जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न है। 
आपका अंतिम प्रभावक चातुर्मास राजस्थान के सिवाणा नगर हुआ। विहार के दौरान वि.सं.2042 मिगसर वदि सप्तमी को मांडवला गांव में हृदय गति रुक जाने से स्वर्गवास हो गया। मांडवला में आपकी स्मृति स्वरूप आपके प्रिय व प्रथम शिष्य आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा. के अथक प्रयासों एवं उनकी प्रेरणा से विश्व प्रसिद्ध स्थापत्य ‘जहाज मंदिर’ का निर्माण कराया गया है, जो वर्तमान में विश्व विख्यात एक भव्य तीर्थ के रूप में सौभाग्यवान हो रहा है। 
31  वीं पुण्यतिथि पर सादर आदरांजलि  

युगप्रभावक आचार्य भगवंत श्री जिनकांतिसागरसूरीश्वरजी म.सा. की 31वीं पुण्यतिथि पर

Jinkantisuri
सुधातल के निर्मल भूषण, समुच्चय करुणामृत के सागर, समाधि के परम साधक, श्रुतधर परम पूज्य गुरुदेव युगप्रभावक आचार्य भगवंत श्री जिनकांतिसागरसूरीश्वरजी म.सा. विश्व क्षितिज पर एक सौ चार साल पूर्व प्रकाशित हुए। जो मानवीय चेतना को शाश्वतता की ओर ले गये, आपकी दिव्य वाणी और वैराग्यमयी शक्ति ने जगत की सीमाओं को लांघकर जन मानस में ज्ञान की अलख जगाई। 
आपका कोई भी अन्तर्मन से ध्यान करते हैं तो उन्हें सन्मार्ग प्रदर्शित करते हैं। साधना की गहनता प्रखर तप, ज्ञान की तेजस्विता और करूणा के निर्झर से आप्लावित थे। ऐसे महामहिम पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री आज भी जन-जन के मानस पटल पर श्रद्धा स्थान के रूप में अधिष्ठित है। आपकी दिव्य आभा, आपकी ज्ञान किरणें, आपके अनहद उपकार की रश्मियां इतिहास के पृष्ठों पर अमर रहेगी।
महामानव के समस्त गुण आप में अवस्थित थे। आप स्पष्टवक्ता, प्रांजल साहित्यकार, अडिग पराक्रमी सर्वधर्म समन्वय के महान पुरस्कर्ता थे। आपके व्यक्तित्व की ऐसी अनूठी महिमा थी।
आपने भारत की राजधानी दिल्ली, बद्रीनाथ, हरिद्वार, कन्याकुमारी मद्रास, बंबई, नागपुर आदि महानगर-शहर-गांव में पदविहार करके जन जन को अपने ज्ञानामृत का पान कराया। परस्पर प्रेम भ्रातृत्व भावना का संचार किया।
सदैव कृपा की अमीवर्षा करके हमें सन्मार्ग प्रदर्शित करें इसी अभिलाषा के साथ पुण्यतिथि पर अनंतानंत श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हैं। 
-जहाज मंदिर परिवार

Nov 17, 2016

बीकानेर में श्री क्षमाकल्याणजी महोत्सव मनाया जायेगा

Pujy Kshamakalyan ji ms
पू. क्षमाकल्याणजी म. का द्विशताब्दी महोत्सव
        खरतरगच्छ परम्परा में पूज्य उपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी म.सा. का नाम अत्यन्त आदर व श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वर्तमान में खरतरगच्छीय साधु साध्वीजी भगवंत जो वासचूर्ण का उपयोग करते हैं, उसे संपूर्ण विधि विधान के साथ उन्होंने ही अभिमंत्रित किया था। तब से दीक्षा, बडी दीक्षा आदि प्रत्येक विधि विधान में पूज्यश्री का नाम लेकर वासक्षेप डाली जाती है।
    परम पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य देव श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. की सेवा में बीकानेर जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ श्री संघ का प्रतिनिधि मंडल, अध्यक्ष श्री पन्नालालजी खजांची के नेतृत्व में दुर्ग पहुँचा। उन्होंने पूज्यश्री से बीकानेर पधार कर महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी म.सा. का द्विताब्दी महोत्सव में निश्रा एवं मार्गदर्शन प्रदान करने की विनंती की।
आगामी 28 दिसम्बर 2016 को दो सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर बीकानेर संघ ने पूज्य गच्छाधिपति की आज्ञा से द्विताब्दी महोत्सव मनाने का निर्णय किया है। बीकानेर श्री संघ की विनंती स्वीकार कर पूज्य आचार्यश्री ने साध्वी श्री कल्पलताश्रीजी म. आदि ठाणा को निश्रा प्रदान करने का आदे प्रदान किया।
पूज्य साध्वीजी म. शंखेश्वर से कार्तिक पूर्णिमा को विहार कर बीकानेर पधारेंगे। उनकी पावन निश्रा में पूज्य क्षमाकल्याणजी म. का द्विताब्दी महोत्सव आयोजित किया जायेगा।
बीकानेर संघ ने रेल दादावाडी के 400 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में विराट महोत्सव मनाने की विनंती भी पूज्यश्री से की। और निवेदन किया कि यह महोत्सव आपश्री की निश्रा में ही आयोजित करना है। इसके लिये चार-छ: महिना देर हो तो भी स्वीकार्य है। पर आपश्री को बीकानेर पधारना ही है।
पूज्यश्री ने देश-काल भाव देख कर आगामी चातुर्मास के बाद बीकानेर में महोत्सव आयोजित करने की स्वीकृति प्रदान की। जिसे श्रवण कर बीकानेर श्री संघ में परम आनंद छा गया।
प्रेषक
पन्नालाल खजांची,
अध्यक्ष

Nov 15, 2016

Palitana जिन हरि विहार पालीताना की वर्षगांठ आयोजित

पालीताणा स्थित श्री जिन हरि विहार धर्मशाला के श्री आदिनाथ मयूर मंदिर का 14वां वार्षिक ध्वजारोहण का कार्यक्रम दिनांक 12 नवम्बर 2016 को अत्यन्त आनन्द व उल्लास के साथ संपन्न हुआ। कायमी ध्वजा के लाभार्थी श्रीमती पुष्पाजी अशोकजी जैन परिवार द्वारा जिन मंदिर पर ध्वजा चढाई गई। सतरह भेदी पूजा पढाई गई।
यह समारोह खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवन्त श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य पूज्य मुनिराज श्री मयंकप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मेहुलप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री मौनप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री मोक्षप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री मननप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री कल्पज्ञसागरजी म. आदि ठाणा एवं पूजनीया खान्दे शिरोमणि महत्तरा पद विभुषिता श्री दिव्यप्रभाश्रीजी म.सा, साध्वी प्रियरदर्शनाश्रीजी म., साध्वी हेमरत्नाश्रीजी म., साध्वी मृगावतीश्रीजी म., साध्वी प्रियश्रद्धांजनाश्रीजी म. आदि साध्वी मंडल की पावन निश्रा में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर मंत्री श्री बाबुलालजी लूणिया, कोषाध्यक्ष श्री पुखराजजी तातेड़, सदस्य श्री विजयजी गुलेच्छा, रतनचंद बोथरा आदि कई ट्रस्टी उपस्थित थे। इस मंदिर की प्रतिष्ठा वि. सं. 2059 कार्तिक सुदि 13 को संपन्न हुई थी। 

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Nov 5, 2016

ज्ञान पंचमी के दिन श्रुत की पूजा कर लेना, ज्ञान मंदिरों के पट खोलकर पुस्तकों के प्रदर्शन कर लेना और फिर वर्ष भर के लिए उन्हें ताले में बंद कर देना ज्ञानभक्ति नहीं है। इस दिन श्रुत के अभ्यास, प्रचार और प्रसार का संकल्प करना चाहिए।

Gyan Panchami
ज्ञान पंचमी
ज्ञान पंचमी कार्तिक शुक्ला पंचमी अर्थात दीपावली के पाँचवे दिन मनाई जाती है।
 इस दिन विधिवत आराधना करने से और ज्ञान की भक्ति करने से 
कोढ़ जैसे भीषण रोग भी नष्ट हो जाते हैं।
इस दिन 51 लोगस्स का कायोत्सर्ग, 51 स्वस्तिक, 51 खामासना और 
" नमो नाणस्स " पद का जाप किया जाता है। 

ज्ञान पंचमी को लाभ पंचमी भी कहा जाता है।
ज्ञान पंचमी सन्देश देती है की ज्ञान के प्रति दुर्भाव रखने से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है।
अतएव हमें ज्ञान की महिमा को हृदयंगम करके उसकी आराधना करनी चाहिए।
यथाशक्ति  ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए और दूसरों के पठन पाठन में योग देना चाहिए।
यह योग कई प्रकार से दिया जा सकता है।निर्धन विद्यार्थियों को श्रुत ग्रन्थ देना, आर्थिक सहयोग देना, धार्मिक ग्रंथों का सर्वसाधारण में वितरण करना, 
पाठशालाएं चलाना, चलाने वालों को सहयोग देना, 
स्वयं प्राप्त ज्ञान का दूसरों को लाभ देना आदि।
ये सब ज्ञानावर्णीय कर्म के क्षयोपशम के कारण है।
विचारणीय है की जब लौकिक ज्ञान प्राप्ति में बाधा पहुंचाने वाली गुणमंजरी को गूंगी बनना पड़ा तो धार्मिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान में बाधा डालने वाले का कितना प्रगाढ़ कर्मबंध होगा  ?
इसीलिए भगवान महावीर ने कहा - " हे मानव ! तू अज्ञान के चक्र से बाहर निकल और ज्ञान की आराधना में लग।ज्ञान ही तेरा असली स्वरुप है। उसे भूलकर क्यों पर-रूप में झूल रहा है ? 
जो अपने स्वरुप को नहीं जानता उसका बाहरी ज्ञान निरर्थक है ।"
ज्ञान पंचमी के दिन श्रुत की पूजा कर लेना, ज्ञान मंदिरों के पट खोलकर पुस्तकों के प्रदर्शन कर लेना और फिर वर्ष भर के लिए उन्हें ताले में बंद कर देना ज्ञानभक्ति नहीं है।
इस दिन श्रुत के अभ्यास, प्रचार और प्रसार का संकल्प करना चाहिए।
आज ज्ञान के प्रति जो आदर वृति मंद पड़ी हुई है, उसे जाग्रत करना चाहिए और द्रव्य से ज्ञान दान करना चाहिए।
ऐसा करने से इहलोक परलोक में आत्मा को अपूर्व ज्योति प्राप्त होगी और शासन और समाज का अभ्युदय होगा।

Nov 1, 2016

durg me Suri Mantra Sadhna दुर्ग में सूरिमंत्र की प्रथम पीठिका की साधना सम्पन्न

durg me Suri Mantra Sadhna
दुर्ग नगर में पूज्य गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. के सूरिमंत्र की प्रथम पीठिका की इक्कीस दिवसीय साधना दिनांक 03 अक्टूबर से शुरू हुई और उसका निर्विघ्न सानन्द समापन समारोह 23 अक्टूबर को हुआ। इस साधना के अन्तर्गत पूज्यश्री सम्पूर्ण तौर पर मौन के साथ सूरिमंत्र के जप और तप में लीन रहे। 23 अक्टूबर को सुबह 5.20 बजे आयोजित हवन-पूजन के कार्यक्रम में श्रावकों ने पूजा परिधान पहनकर भाग लिया। प्रात: 9.30 बजे आचार्यश्री के सम्मान में गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकाला गया। जुलूस में हजारों की संख्या में श्रावक-श्राविकाओं और बाहर से आए श्रद्धालुओं ने भाग लिया। आचार्यश्री ने सुबह 10 बजे प्रवचन स्थल सुखसागर प्रवचन-वाटिका में प्रवेश किया।
आचार्यश्री ने अपने उद्बोधन में उनकी मंत्र साधना की सफलता के लिए श्रावक-श्राविकाओं द्वारा किए गए नवकार मंत्र जाप के लिए प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी सूरिमंत्र प्रथम पीठिका मौन-साधना आनन्ददायी रही। यह ज्ञातव्य है कि संपूर्ण भारत में स्थान स्थान पर पूज्यश्री की साधना के निर्विघ्न लक्ष्य के लिये नवकार महामंत्र की आराधना, जाप, आयंबिल आदि का आयोजन किया गया। संपूर्ण एकान्त में मौन रहकर की गई इस मंत्र साधना को आचार्यश्री ने आचार्यपद प्राप्ति के बाद के अपने उत्तरदायित्व का पूर्तिकारक बताया।

Durg se Sangh दुर्ग से छह री पालित उवसग्गहर पार्श्वनाथ तीर्थ तक पैदल संघ

Durg se Sangh
    दुर्ग नगर से पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. पूज्य मुनि श्री मनितप्रभसागरजी म., पूज्य मुनि श्री समयप्रभसागरजी म., पूज्य मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म., पूज्य मुनि श्री श्रेयांसप्रभसागरजी म. ठाणा 6 एवं पूजनीया माताजी म. श्री रतनमालाश्रीजी म. पूजनीया बहिन म. डाँ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री प्रज्ञांजनाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री नीतिप्रज्ञाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री निष्ठांजनाश्रीजी म. ठाणा 5 की पावन निश्रा में श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ एवं चातुर्मास समिति दुर्ग के तत्वावधान में दुर्ग नगर से उवसग्गहर पार्श्वनाथ तीर्थ होते हुए कैवल्यधाम तीर्थ के लिये पंच दिवसीय छह री पालित पद यात्रा संघ का आयोजन किया गया है। इस संघ का आयोजन श्री भूरमलजी पतासी देवी बरडिया परिवार की ओर से होने जा रहा है।