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Showing posts from April, 2017

Navpad Oli परमात्मा ने जो कहा है, गणधर भगवन्तो ने रचना की है वही सच्चा और निःशंक ज्ञान है।

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आज नवपदजी ओली का 7वां दिन
ज्ञान पद की आराधना का दिन
संसार में जो भी दुःख है, वो सब हमारे अज्ञान के कारण है ।
ज्ञान के अभाव में हम देव गुरु और धर्म की पहचान नही कर पा रहे है।
उसी कारण हमारा चार गति में भटकना जारी है ।
ज्ञान के अभाव में जो ग्रहण करना चाहिए उसे हम छोड़ देते है, तुच्छ चीजों को पकड़ के रखते है, सही और गलत का निर्णय भी हम अज्ञान के कारण नही कर पा रहे है ।
संसार छोड़ने के लिए है ।
संयम पालन के लिये है ।

Navpad oli श्री नवपद शाश्वत ओली आराधना... छठा दिवस : सम्यग् दर्शन गुण की आराधना..

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श्री  नवपद  शाश्वत  ओली  आराधना...
छठा दिवस : सम्यग् दर्शन गुण की आराधना..
सम्यग् दर्शन पद की आराधना के लिए उसके बारे में जानना आवश्यक है।
महान् दर्शन पद की आराधना का दिन
पिछले 5 दिन तक हमने देव और गुरु तत्त्व की आराधना की, समझी ।
आज से धर्म तत्त्व की आराधना।
धर्म को प्राप्त करके ही धर्मी बना जा सकता है।
धर्म तत्त्व में पहला है सम्यग् दर्शन।
सम्यग् दर्शन के बिना सभी प्रकार का ज्ञान मिथ्या ज्ञान कहलाता है।
किसी भी प्रकार की क्रिया मिथ्या कहलाती है।
इसलिए सबसे जरुरी और मुख्य तत्त्व है सम्यग् दर्शन।

Navpad Oli 5th day साधू जीवन, जगत के लिए आश्चर्य रूप है।

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साधू पद की आराधना का दिन आज नवपद ओलीजी का पांचवा दिन साधको की साधना में सदा सहायता करने वाले, अप्रमत्त गुण के धारक, लोक में रहे हुए सभी साधू भगवंतों को हमारी भाव पूर्वक वन्दना । साधू पद का वर्णन साधना करे वो साधू, मौन रखे वो मुनि स्वयं के मन पर नियंत्रण रखे वह साधू कोई भी वचन व्यर्थ का उच्चरित न हो, ऐसा ध्यान रखने वाले। कोई प्रवृत्ति विरुद्ध न हो जाये इसकी जागरूकता रखने वाले। साधू जीवन, जगत के लिए आश्चर्य रूप है।
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Navpad Oli नवपद ओलीजी का आज चौथा उपाध्याय पद की आराधना का दिन

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नवपद ओलीजी का आज चौथा दिन।
उपाध्याय पद की आराधना का दिन।
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तपस्वियों के शाता हो ऐसी दादा गुरुदेव से प्रार्थना।।
उपाध्याय यानि शिष्यों के पठन पाठन की जिम्मेदारी, विनय की प्रतिमूर्ति, निश्रावर्ति सभी साधुओ को संयम मार्ग में स्थिर करने का महान कार्य।।
आचार्य शासन को चलाता है तो उपाध्याय संघ को।।
जिस वाणी को तीर्थंकरो ने कहा है उस वाणी को उपाध्याय पदधारी हमे सुनाते है।।
योग्य आत्मा को वात्सल्य, समझ, स्नेह देकर उसे धर्म में रत करना - यह उनकी जिम्मेदारी है।

Navpad Oliji 3rd day Achary pad आज नवपद ओलीजी का तीसरा दिन

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आज नवपद ओलीजी का तीसरा दिन।
आचार्य पद की आराधना का दिन।
9 पदों में किसी भी व्यक्ति विशेष को वंदना नही की गयी है।
जो जो आत्मा उन उन महान गुणों तक पहुँचे है उन सभी गुणीजनों को एक साथ वंदना की गयी है।
@ आचार्य पद को नमन 
शासन की स्थापना अरिहंत परमात्मा करते हे
सिद्ध परमात्मा को नमन कर के..
अरिहंत परमात्मा की अनुपस्थिति मेँ आचार्य भगवंत जिन शासन का प्रतिनिधित्व करते हे।।
साधु साध्वी श्रावक श्राविका आदि चतुर्विध संघ का निर्वहन करते हे।
सिद्ध प्रभु ने हमको निगोद से बाहर निकाला।
अरिहंत प्रभु ने हमको धर्म का उपदेश दिया।
वीर प्रभु के निर्वाण से आज तक 2500 साल हुए हैं। और परमात्मा का शासन 18500 वर्ष तक चलेगा । इतने लंबे समय तक शासन को आचार्य भगवंत चलाएंगे।

navpad oli ओलीजी आराधना...उन पवित्र आत्माओं को सिद्ध कहा जाता है। जिन आत्माओ ने खुद के ऊपर लगे हुए सभी कर्मों का क्षय कर दिया हो। जो संसार के बंधन से मुक्त हो गए है। जो कभी जन्म नही लेंगे। जिनकी कभी मृत्यु नही होगी, जिनका कोई शरीर, मन नही है।

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आज नवपद ओलीजी का दूसरा दिन
सिद्ध पद की आराधना का दिन
9 पदों में किसी भी व्यक्ति विशेष को वंदना नही की गयी है।
जो जो आत्मा उन उन महान गुणों तक पहुँचे है उन सभी गुणीजनों को एक साथ वंदना की गयी है।
नमो सिद्धाणं।।।
सिद्ध प्रभु का परिचय
जिन आत्माओ ने खुद के ऊपर लगे हुए सभी कर्मों का क्षय कर दिया हो। जो संसार के बंधन से मुक्त हो गए है। जो कभी जन्म नही लेंगे।
जिनकी कभी मृत्यु नही होगी, जिनका कोई शरीर, मन नही है।
उन पवित्र आत्माओं को सिद्ध कहा जाता है।

Navpad Oli Detail नवपद ओली आराधना... अगर अरिहंत नही होते तो करुणा का इतना प्रचार नही होता।।। धर्म का ज्ञान नही होता।।। शासन की स्थापना नही होती।।।

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जैन जगत में नवपद की महिमा अपरंपार है ! नवपद : 1.अरिहंत 2. सिद्ध 3. आचार्य 4. उपाध्याय 5. साधु  6.दर्शन  7. ज्ञान 8. चारित्र 9. तप !! यह आराधना वर्ष में दो बार आयंबिल तप के द्वारा की जाती है !
1. चैत्र सुदी 7 से 15 ( पूनम )
2. आसोज सुदी 7 से 15 तक !
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नवपद ओली आराधना का प्रारंभ आसोज माह से किया जाता है, एवं कुल 9 ओली अर्थात् चाढ़े चार वर्ष तक कुल 81 आयंबिल के साथ यह तप पूर्ण होता है !
नवपद आराधना में आज प्रथम पद में अरिहंत पद की आराधना की जाती है
अरि यानि शत्रु
हंत यानि नाश करने वाले...

शत्रुओ का नाश करने वाले अरिहंत कहलाते है...
अरिहन्त अपने कर्म रूपी शत्रु का नाश करते है...
अगर अरिहंत नही होते तो करुणा का इतना प्रचार नही होता।।। धर्म का ज्ञान नही होता।।।
शासन की स्थापना नही होती।।।