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Jain Religion is very oldest Religion

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KUMARPAL BHAI V. SHAH

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15 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

15 जटाशंकर      -उपाध्यायमणिप्रभसागरजीम. सा.जटाशंकर अपने तीन अन्य मित्रों के साथ घूमने चला था। अंधेरी रात में छितरी चांदनी का मनोरम माहौल था। मंद बहारों की मस्ती भरे वातावरण में उन्होंने शाम को शराब पी थी। शराब की मदहोशी के आलम में दिमाग शून्य था। उडा जा रहा था। घूमते घूमते नदी के किनारे पहुँच गये। ठंडी हवा के झोंकों में सफर करने का उनका मानस तत्पर बना। नदी के किनारे नाव पडी थी। उसे देखा तो सोचा कि आज रात नाव में घूमने का आनंद उठा लिया जाय! जटाशंकर के इस प्रस्ताव का सबने समर्थन किया। चारों मित्र नाव पर सवार हो गये। बैठते ही पतवारें थाम ली। रात के ठंडक भरे माहौल में उन्होंने नाव खेना प्रारंभ किया। शराब का नशा था तो पता ही नहीं चला कि समय कितना बीता! रात भर वे नाव चलाते रहे। पतवारें खेते रहे। नशे के कारण हाथों में थकान का जरा भी अनुभव न था। पौ फटने का समय आया। प्रकाश धीरे धीरे छाने लगा। तो एक दोस्त बोला- अरे ! नाव चलाने में अपन इतने मशगूल हो गये कि पता ही नहीं चला, कितनी दूर आ गये ! सवेरा होने का अर्थ है कि रात भर अपन चलते रहे हैं। कम से कम 100 कोस की दूरी तो अवश्य तय कर ली होगी।अब वापस जाय…

14 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

14 जटाशंकर      -उपाध्यायमणिप्रभसागरजीम. सा.पेट में दर्द होने के कारण जटाशंकर अस्पताल पहुंचा। वैद्यराजजी ने अच्छी तरह निरीक्षण करने के उपरान्त दवाई की नौ पुडियाँ उसके हाथ में देते हुए कहा प्रतिदिन तीन पुडियाँ लेना और तीन दिन बाद वापस आना। तीन दिन पूरे होने के बाद वापस वैद्यराजजी के पास पहुँचा। दर्द के बारे में बताते हुए कहा पेट का दर्द तो बढ ही गया है। साथ ही गले में दर्द का अनुभव हो रहा है। वैद्यराज ने पूछा तुमने दवाई तो बराबर ली। जटाशंकर ने कहाँ श्रीमान् दवा आपके कहे अनुसार ली। पूरी ली। पर पुडिया का कागज बहुत ही चिकना था। गले के नीचे उतरता ही नहीं था। दम निकला जाता था मेरा। पर मैने नौ ही पुडिया उतार ली थी। आश्चर्य चकित होते हुए वैद्यराज जी बोले-कागज खाने को किसने कहा था? हुजूर। आपने ही तो रोज तीन पुडी खाने को कहा था। हाँ, उस पुडिया में धूल, राख, कचरा जैसा कुछ था, उसको फेंक देता था। पर पुडियाँ मैंने बराबर खाई सुनने के बाद वैद्यराज जी यह निर्णय न कर सके कि मुझे इस पर क्रोध करना चाहिये या हँसना चाहिये। मूल तो बात सही समझ की है। यथार्थ समझ के अभाव में बहुत बार हम जिसे छोडना है, उसे ग्रहण कर ल…

13 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

13 जटाशंकर      -उपाध्यायमणिप्रभसागरजी. सा. हडबड़ाकर जटाशंकर उठ बैठा। काफी देर तक आँखें मसलता रहा। हाथ मुँह धोकर कुर्सी पर बडे आराम से चिन्तन की मुद्रा में बैठ गया। यह सोच रहा था। अपने सपने के बारे में जो उसने अभी अभी देखा था। सपने में उसके घर हजार व्यक्तियों का भोजन का समारोह होने वाला था। पाक-कलाकार पकवान तैयार कर रहे थे। घेवर से कमरा भरा था। लड्डुओं से थाल सजे थे। गरम-गरम कचोरियाँ  और पूरियाँ तली जा रही थी। खाना प्रारंभ हो, उससे पहले ही उसकी आँख खुल गई थी। वह परेशान था कि इतनी मिठाईयों का मैं अकेले क्या करूँगा? थोडी देर बाद अचानक उसे एक विचार सूझा। क्यों न सारे गाँव को, पूरी न्यात को भोजन का आमंत्रण दे दूं? अपने निर्णय पर गौरव युक्त आनंद का अनुभव करता हुआ पूरे गाँव को न्योते गली गली घूमने लगा। लोग उसकी स्थिति जानते थे, अत: अचरज करने लगे लेकिन सोचा हो सकता है, कोई लाटरी लगी हो या गढा धन मिला होगा। भोजन के वक्त वहाँ पहुँचे पंचो और लोगों ने तब बहुत ही आश्चर्य का अनुभव किया जब जटाशंकर के घर भोजन निर्माण व्यवस्था की कोई तैयारी नहीं दिखी। आखिर जटाशंकर की तलाश की गई तो पता चला कि वह अपने कमरे…

12 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

12 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म सा.
दो चींटियाँ आपसे में बाते करती हुई चली जा रही थी। अन्य चींटियों से थोड़ी बडी भी थी और ताक़तवर भी। किसी ने उनका नाम जटाशंकर और घटाशंकर रखा था। अपनी ताकत का अहंकार भी मानस में था। सामने से एक हाथी चला आ रहा था। हाथी के विशाल आकार को देखा तो चीटिंयां अपने मन में अपनी लघुता के कारण हीन भाव का अनुभव करने लगी।

उस हीन भाव से प्रेरित अंहकार भाव में डूबकर एक चींटी हाथी से कहने लगी- खा खा कर बड़े मोटे हुए जा रहे हो। कुछ ताकत भी है या नहीं, या यों ही वादी से भरें हो। हमसे लडोगे?

हाथी कुछ बोला नहीं। दूसरी चींटी ने उसे मौन देख पहली चींटी से कहने लगी।

छोड़ो बेचारे को! देखो कैसा घबरा रहा है। अरे वो बिचारा अकेला है, अपन दो है। छोड़ो। लडाई बराबर वालो में की जाती है। यह अकेला बिचारा अभी भाग जायेगा।

यह अपने मुँह मिट्ठू बनने का उदाहरण हैं। बहुत बार हम अपने थोथे अहं का प्रदर्शन उसके लिये करते हैं जो हकीकत में हमारे पास नहीं होता।

11 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

11 जटाशंकर      -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. जटाशंकर का बेटा बीमार था। बुखार बहुत तेज था। कमजोरी अत्यधिक थी। बोलने में भी पीड़ा का अनुभव था। छोटा सा गांव था। एक वैद्यराजजी वहां रहते थे। उन्हें बुलवाया गया। वैद्यराजजी ने घटाशंकर का हाथ नाड़ी देखने के लक्ष्य से अपने हाथ में लिया। जल्दबाजी कहें या अनुभवहीनता। कलाई में जहाँ नाड़ी थी, वहाँ न देखकर दूसरे हिस्से में नाड़ी टटोलने लगे। काफी प्रयास करने पर भी उन्हें नाड़ी नहीं मिली।
वैद्यराजजी के चेहरे के भावों का उतार-चढ़ाव जारी था। उनके उतरे चेहरे को देखकर जटाशंकर की ध्ाड़कन  तेज हो गई। उसे किसी अनिष्ट की आंशका हो रही थी।
काँपती जबान और धडकती छाती से उसने पूछा वैद्यराजजी। क्या बात है? आप कुछ बोल नहीं रहे हैं? सब ठीक तो है न? मेरा बेटा ठीक हो जायेगा न?
वैद्यराजजी ने उदास स्वरों में कहा भाई। इसकी नाडी नहीं चल रही है। इसका अर्थ है कि अब यह जीवित नहीं है क्योंकि जीवित होता तो नाड़ी चलती।
अपने बेटे की मृत्यु का संवाद सुनकर जटाशंकर जोर जोर से रोने लगा।
घटाशंकर ने अपनी सारी शक्ति एकत्र की ओर जोर से बोला पिताजी! मैं जिन्दा हूँ। मरा नहीं।
सुनकर जटाश…
10 जटाशंकर-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. परीक्षा देने के बाद जटाशंकर अपने मन में बडा राजी हो रहा था। पिछले दो वर्षो से लगातार अनुत्तीर्ण होकर उसी कक्षा में चल रहा जटाशंकर आश्वस्त था कि इस वर्ष न केवल उत्तीर्ण बनूंगा बल्कि प्रथम श्रेणी में आकर कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करूंगा। असल में इस बार उसने जोरदार नकल की थी। परीक्षा में उसके आगे बैठे घटाशंकर की काँपी ज्यों की त्यों कॉपी पर उतार दी थी। वह जानता था कि घटाशंकरहमेशा प्रथम आता है, तो जब मैंने उसकी पूरी काँपी उतारी है, तो मुझे कम अंक मिल ही नहीं सकते। नकल करने में शरीर की लम्बाई, आंखों की तेज दृष्टि अध्यापक निरीक्षक के आलस्य ने उसका पूरा सहयोग किया था। आंखों में मुस्कान, हृदय में आत्मविश्वास भरी अधीरता लिये वह परीक्षा फल की प्रतीक्षा करने लगा। उस दिन उसने नये वस्त्र धारण किये थे। कालेज में पहुँचकर सब सहपाठियों के बीच मुस्करा रहा था। उसकी रहस्य भरी मुस्कुराहट देख सभी छात्र सोच रहे थे कि इसे तो अनुत्तीर्ण ही होना है। लगातार फेल होने पर भी अपनी कार्यप्रणाली में परिवर्तन नहीं किया है। खेलना, कूदना, बातें, गप्पे, यही इसकी ज़िंदगी है। फिर य…
9 जटाशंकर
-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. सुबह ही सुबह जटाशंकर के मन में इच्छा जगी कि ज़िंदगी मैं तैरना ज़रूर सीखना चाहिये। कभी विपदा में उपयोगी होगा। वह प्रशिक्षक के पास पहुँचा। वार्तालाप कर सौदा तय कर लिया। प्रशिक्षक उसे स्विमिंग पुल पर ले गया। स्वयं पानी में उतरा और जटाशंकर को भी भीतर पानी में आने का आदेश दिया। जटाशंकर पहली पहली बार पानी में उतर रहा था। डरते डरते वह घुटनों तक पानी में उतर गया। प्रशिक्षक ने कहा ओर आगे आओ। छाती तक पानी में जाते जाते तो वह कांप उठा। साँस ऊपर नीचे होने लगी। दम घुटने लगा। प्रशिक्षक उसे तैरने का पहला गुरसिखाये, उससे पहले ही जटाशंकर ने त्वरित निर्णय लेते हुए पानी से बाहर छलांग लगा दी। किनारे खडे जटाशंकर से प्रशिक्षक ने कहा अरे, अन्दर आओ। मैं तुम्हें तैरना सिखा रहा हूं और तुम बाहर भाग रहे हो। जटाशंकर ने कहा महाशय! मुझे पानी में बहुत डर लग रहा है। डूबने का खतरा दिल दिमाग पर छाया हैं इसलिये मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जब तक मैं तैरना नहीं सीख लूंगा, तब तक मैं पानी में कदम नहीं रखमंगा। पानी में उतरे बिना तैरना सीखा नहीं जा सकता। साधना में डुबकी बिना साध्य को पाया नहीं…
8 जटाशंकर-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. जटाशंकर अपने दोस्त के यहाँ मेहमान था। भोजन का समय होने पर थाली परोसी गई। अन्य सामग्री के साथ एक कटोरी में खीर भी रखी गई। परोस कर मित्र वापस रसोई में गया ही था कि जटाशंकर ने खीर की कटोरी को पास की नाली में उडेल दिया। यह देख दोस्त ने सोचा शायद खीर में कुछ कचरा पड़ गया होगा। दुबारा उस कटोरी को भर दिया। मगर जटाशंकर ने दूसरी बार भी खीर को नाली में फेंक दिया। दोस्त बडा हैरान हुआ। उसे गुस्सा भी आया कि इतनी महंगी, बढिया और स्वादिष्ट खीर को यह यों फेंक रहा है। लेकिन मेहमान होने के नाते उसने कुछ नहीं कहा। वह क्रोध को भीतर ही पी गया और तीसरी बार उसने कटोरी को खीर से भर दिया। पर जब तीसरी बार भी जटाशंकर ने खीर को नाली में बहा दिया तो मेजबान ने गुस्से से पूछा-‘भाई, तुम बार बार खीर को नाली में क्यों फेंक रहे हो?’ जटाशंकर ने कहा-फेंकू नहीं तो क्या करूं? खीर में चींटी है। कैसे पीउं? दोस्त ने पल भर उसे देखा और चीख कर कहा अरे मूर्ख! चींटी खीर में नहीं तुम्हारे चश्में पर चल रही है, जो तुम्हें खीर में नजर आती है। जटाशंकर ने चश्मा उतार कर उस पर चल रही चींटी को देखा तो झेंप…
7 जटाशंकर-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. घर में जटाशंकर जोर जोर से रो रहा था। चीखता भी जा रहा था। हाय मेरी नई की नई छतरी कोई ले गया?लोक इकट्ठे होने लगे। पड़ोसी पहुँच गये। दोस्तों को खबर मिली की जटाशंकर रो रहा है तो वे भी सांत्वना देने आ पहुँचे। उनके पूछने पर जटाशंकर ने कहा-मैं ट्रेन से आ रहा था। मेरे पास नया छाता था। दो-तीन व्यक्ति रेल में मेरे पास बैठे मुझसे बतिया रहे थे। बातों ही बातों में मुझे पता ही नहीं चला और उन्होंने छाता बदल लिया। अपना पुराना फटा पुराना छाता छोड़ दिया और नया छाता ले गये। हाय मेरा नया छाता?अपनी छतरी की यादें ताज़ा हो उठी। क्या मेरा नया छाता था?एक बार भी तो काम में नहीं लिया था। दोस्तों में सांत्वना देते हुए कहा चिंता मत करो। जो चला गया वो वापस तो नहीं आयेगा। वातावरण कुछ हल्का होने पर एक मित्र ने विचार कर पूछा। एक बताओ,जटाशंकर। क्या? यह तो बता कि तूने वह छाता कब ख़रीदा था,कहां से,किस दुकान से ख़रीदा था,कितने रूपये का था? जटाशंकर ने कहा-यह मत पूछ! यह तो पूछना मत। उसके दृढ़ इंकार ने दोस्तों के मन में रहस्य गहरा हो उठा। वे पीछे ही पड़ गये। तुम्हें हर हाल में बताना ही होगा। आ…
6 जटाशंकर-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. जटाशंकर का हाथ मशीन में आ गया था। अस्पताल में भर्ती करने के बाद डाक्टर ने कहा-तुम्हारा यह बायां हाथ काटना पडेगा। सुनकर जटाशंकर रोने लगा। डाक्टर ने उसे सांत्वना देते हुए कहा भाई जटाशंकर! तुम इतने दु:खी मत बनो। अच्छा हुआ जो बायां हाथ मशीन में आया। यदि दाहिना हाथ आ जाता तो तुम बिल्कुल बेकार हो जाते। भगवान का शुक्र है,जो तुम बच गये। जटाशंकर ने रोते रोते कहा डाक्टर साहब! मशीन में तो मेरा दाहिना हाथ ही आया था। लेकिन मैंने दाहिने हाथ की विशिष्ट उपयोगिता का क्षण भर में विचार कर पल भर में निर्णय लेते हुए दाहिना हाथ वापस खींच लिया और बांये हाथ को अन्दर डाल दिया। सुनकर डाक्टर उसकी मूर्खता पर मुस्कुराने लगा। अरे! दायां हाथ निकल ही गया था तो बायां हाथ डालने की क्या जरूरत थी? मूर्खता पर भी शेखी बघारने की आदती बढ़ती जा रही है। चिंतन नहीं कि मैं क्या कर रहा हूं? क्यों कर रहा हूं?परिणाम क्या होगा? www.jahajmandir.com -------------------------- www.jainEbook.com
5 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.जटाशंकरदौड़ दौड़ करपूरेगांवमेंमिठाईवितरणकररहाथा।गांववालोंनेउससेपूछाभाईक्याबातहै? 
पुत्रहुआहै। जटाशंकरनेकहानहीं! फिरकिसबातकेलियेमिठाईबांटरहेहो! अरे! मतपूछोयहबात! मैंआजकितनाअपनेआपकोप्रफुल्लितमहसूसकररहाहूं। आखिरगांवके 25-30 व्यक्तिएकसाथइकट्ठेहोकरउससेपूछनेलगेभैया, कारणतोतुम्हेंबतानाहीहोगा। जटाशंकरनेकहा-अरे, औरकुछनहींमेरागधाखोगयाहैं, इसउपलक्ष्यमेंमिठाईवितरणकररहाहूँ।
लोगहैरानहोकरकहनेलगेभैया, यहबातखुशीकीहैयाशोककी! तुमपरेशानहोनेकीजगहराजीहोरहेहो। जटाशंकरनेकहाराजीक्योंनहोउँ।रोजमैंगधे परसवारहोकरनिकलताथा।यदिमैंउसपर
सवारहोतातोगधे केसाथसाथमैंभीनहींखोजाता।मैंअपनीसुरक्षितउपस्थितिकेलियेमिठाईबाँटरहाहूँ। लोगउसकेतर्ककोसुनकरमुस्कुरानेलगे। सहीदिशाकेअभावमेंतर्कतथ्यकाबोधनहींकरापाता।
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4 जटाशंकर-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. जटाशंकरस्कूलमेंपढताथा।अध्यापकनेएकदिनसभीछात्रोंकोअलगअलगचित्रबनानेकाआदेशदिया।सबकोअलगअलगविषयभीदिये। सभीअपनीअपनी कॉपी खोलकरचित्रबनानेमेंजुटगये।जटाशंकरकोबैठीगायकाचित्रबनानाथा।परउसेचित्रबनातेसमयध्याननरहा।बैठीगायकेस्थानपरखडीगायकाचित्रबनाडाला। जबअध्यापकनेउसकीकाँपीदेखीतोवहचिल्लाउठा।यहक्याकियातूने? मैंनेक्याकहाथा? जटाशंकरनेजबावदियासर! जैसाआपनेकहाथावैसाहीचित्रबनायाहै।अध्यापकनेडंडाहाथमेंलेकरउसेदिखातेहुएकहामूर्ख! मैंनेबैठीगायकाचित्रबनानेकोकहाथाऔरतूनेखड़ीगायकाचित्रबनादिया। जटाशंकरपलभरविचारमेंपडगया।उसनेसोचागलतीतोहोगई।अबक्याकरूँकिमारनपड़े। वहधीरेसेविनयभरेशब्दोंमेंबोला-सर! मैंनेतोबैठीगायकाहीचित्रबनायाथा।परलगताहै- आपकेहाथमेंडंडादेखकरडरकेमारेखडीहोगईहै। मास्टरसमेतसभीखिलखिलाकरहँसपडे।
उचितसमयपरउचितशब्दोंकाप्रयोगवातावरण
3 जटाशंकर-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. जटाशंकरबाजारमेंकागज़केपंखेबेचरहाथा।जोरजोरसेबोलरहाथा ‘एकरूपयेकाएकपंखा! 
जिन्दगीभरचलेगा! इसबातकीगारन्टी।नहींचलेतोपैसावापस!’ सुनकरलोगअचरजसेभरउठे।इतनासस्ता झेलनेवालापंखा! औरजिंदगीभरचलनेवाला! 
यदिनहींचलातोनुकसानभीनहीं! पैसेवापसमिलजायेंगे।देखतेदेखतेलोगोंकीभीड़लगगई।
लोग पंखाखरीदनेकेलियेउतावलेबावरेहोउठे।
कहींऐसानहोकिपंखेखत्महोजायऔरहमारानंबरहीनहींलगे।सौकेकरीबपंखेहाथोहाथबिकगये। महिलाएंउनकाउपयोगकरनेकेलियेअधीरहोउठी।कागज़काबनापंखा।दोचारबारहिलाकिफटगया! 
उसे धराशाहीहोतेदेखलोगक्रुद्धहोउठे।दूसरेदिनवहीपंखेबेचनेवालाजबपुकारलगाताहुआगलीसेगुजरातोलोगोंनेअपनेटूटेपंखेदिखाकरउसपरझूठबोलनेकाआरोपलगाया।तुमनेहमेंठगाहै।कहाथाजिंदगीभरचलेंगे।अरेएकदिनभीनहींचले।हमारारूपयावापसकरों। जटशंकरने धीरजसेजवाबदेतेहुएकहाभाई! मैंनेआपको

1 जटाशंकर

1 जटाशंकर लेखक  -आचार्य जिनमणिप्रभसूरिजी म. सा. जटाशंकरस्कूलमेंपढताथा।अध्यापककेबतायेकामकरनेमेंउसेकोईरूचिनहींथी।
बहानेबनानेमेंहोशियारथा।अपनेतर्कोंकेप्रतिउसेअहंकारथा।
वहसोचतारहता, मैंअपनेतर्कसेहरएककोनिरूत्तरकरसकताहूँ। एकबारवहकक्षामेंपढ़रहाथा।
अध्यापकनेसभीबच्चोंकोआदेशदियाकिघासखातीहुईगायकाचित्रबनाओ।
कक्षाकेसभीछात्रचित्रबनानेलगे।जटाशंकरअपनी कॉपी इधर सेउधरकररहाथा।
कभीअध्यापककोदेखता, तोकभीचित्रबनानेमेंजुटेअन्यछात्रोंको, 
परस्वयंउसेचित्रबनानेमेंकोईरूचिनहीथी। आधेघंटेबादजबसभीछात्रोंनेअपनीकाँपियाँजमाकरादी।
अध्यापकसमझगयाथाकिजटाशंकरनेचित्रहीनहींबनायाहोगा
क्योंकिवहपूरासमय इधर उधरदेखरहाथा। अध्यापकनेजटाशंकरकीखालीकाँपीदेखीतोउसेअपनेपास
एकमिनिट ! जटाशंकर-उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा. जटाशंकरकोईव्यक्तिनहींहै।यहवहपात्रहैजोहरव्यक्तिकेभीतरछिपाबैठाहै।यहहमारेअपनेअन्तरकाहीप्रतिबिम्बहै। जीवनमेंव्यक्तिविविधघटनाओंसेगुजरताहै! अच्छीभी, बुरीभी! उनक्षणोंमेंमानसिकताभीउसीप्रकारकीहोजातीहै।तबएकसच्चेसलाहकारकीआवश्यकताहोतीहै, जिससेजानसकेंकिउनक्षणोंमेंउचितउपायक्याहै? ऐसेसमयमेंजटाशंकरसच्चामित्रबनताहै।वहअपनेआपकोउदाहरणकेरूपमेंप्रस्तुतकरकेसमझानेकाप्रयासकरताहैकिउनअवसरोंपरक्याऔरकैसेकार्यकरनाचाहिये? यहगहरीसेगहरीबातहँसीद्वाराहमेंसमझादेताहै।यहीइसकीविशिष्टताहै। सीधेसीधेकिसीकानामलेनेपरद्वन्द्वखडाहोसकताहै।तबजटाशंकरहमारेसामनेकाल्पनिकपात्रकेरूपमेंप्रकटहोताहै।उसकेनामसेकडवीबातभीआनन्दकेसाथकही@सुनीजासकतीहै।हास्यकथाओंकेरूपमेंजीवनकेसत्यकोउजागरकरनेवाली... सहीदिशादेनेवालीयह

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मैंखालीबैठाथा।देरतकपढतेरहनेसेमस्तिष्कथोडीथकावटकाअहसासकरनेलगाथा।मैंनेकिताबबंदकरदीथी।आँखेंमूंदलीथी।विचारोंकाप्रवाहआ... जारहाथा।बिनाकिसीप्रयासकेमैंउसेदेखरहाथा। मेरामनउनक्षणोंमेंमेरेहीनिर्णयों, विचारोंऔरआचारोंकीसमीक्षाकरनेलगाथा।किसीएकनिर्णयपरविचारकर