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Sep 14, 2012

48. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा

जटाशंकर स्कूल में पढता था। जाति का वह रबारी था। भेड बकरियों को चराता था। छोटे-से गाँव में वह रहता था।
अध्यापक ने गणित समझाते हुए क्लाँस में बच्चों से प्रश्न किया- बच्चों! मैं तुम्हें गणित का एक सवाल करता हूँ।
एक बाडा है। बाडे में पचास भेडें हैं। उनमें से एक भेड ने बाड कूदकर छलांग लगाली, तो बताओ बच्चों! उस बाडे में पीछे कितनी भेडें बची।
जटाशंकर ने हाथ उँचा किया। अध्यापक ने प्रेम से कहा- बताओ! कितनी भेडें बची।
जटाशंकर ने कहा- सर! एक भी नहीं!
अध्यापक ने लाल पीले होते हुए कहा- इतनी सी भी गणित नहीं आती। पचास में से एक भेड कम हुई तो पीछे उनपचास बचेगी न!
जटाशंकर ने कहा- यह आपकी गणित है। पर मैं गडरिया हूँ! भेडों को चराता हूँ! और भेडों की गणित मैं जानता हूँ! एक भेड ने छलांग लगायेगी और सारी भेडें उसके पीछे कूद पडेगी। वह न आगे देखेगी न पीछे! सर! उन्हें आपकी गणित से कोई लेना देना नहीं।
भेडों की अपनी गणित होती है। इसी कारण बिना सोचे अनुकरण की प्रवृत्ति को भेड चाल कहा जाता है। वहाँ अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं होता। अपनी सोच के आधार पर गुण दोष विचार कर जो निर्णय करता है, वही व्यक्ति अपने जीवन को सफल करता है।

Sep 6, 2012

47. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा


जटाशंकर दौडता दौडता अपने घर पहुँचा। घर वाले बडी देर से चिन्ता कर रहे थे। रोजाना शाम ठीक छह बजे घर आ जाने वाला जटाशंकर आज सात बजे तक भी नहीं पहुँचा था। वे बार बार बाहर आकर गली की ओर नजर टिकाये थे।
जब जटाशंकर को घर में हाँफते हुए प्रवेश करते देखा तो सभी ने एक साथ सवाल करने शुरू कर दिये। उसकी पत्नी तो बहुत नाराज हो रही थी।
उसने पूछा- कहाँ लगाई इतनी देर!
जटाशंकर ने कहा- भाग्यवती! थोडी धीरज धार! थोडी सांस लेने दे! फिर बताता हूँ कि क्या हुआ! तुम सुनोगी तो आनंद से उछल पडोगी! मुझ पर धन्यवाद की बारिश करोगी!
कुछ देर में पूर्ण स्वस्थता का अनुभव करने के बाद जटाशंकर ने कहा- आज तो मैंने पूरे पाँच रूपये बचाये है!
रूपये बचाने की बात सुनी तो जटाशंकर की कंजूस पत्नी के चेहरे पर आनंद तैरने लगा।
उसने कहा- जल्दी बताओ! कैसे बचाये!
जटाशंकर ने कहा- आज मैं आँफिस से जब निकला तो तय कर लिया कि आज रूपये बचाने हैं। इसलिये बस में नहीं बैठा! बस के पीछे दौडता हुआ आया हूँ। यदि बस में बैठता तो पाँच रूपये का टिकट लगता! टिकट लेने के बजाय मैं उसके पीछे दौडता रहा, हाँफता रहा और इस प्रकार पाँच रूपये बचा लिये। बोलो धन्यवाद दोगी कि नहीं!
जटाशंकर की पत्नी का मुखकमल खिल उठा! परन्तु पल भर के बाद नाराज होकर बोली- अजी! आप तो मूरख के मूरख ही रहे!
अरे! जब दौडना ही तो बस के पीछे क्यों दौडे! सिर्फ पाँच रूपये बचे! यदि टेक्सी के पीछे दौडते तो पचास रूपये बच जाते! जटाशंकर ने अपना माथा पीट लिया।
पाँच बचे, इसका सुख नहीं। पचास नहीं बचे, इसका दु:ख है। जबकि पाँच रूपये बचे, यह यथार्थ है.... पचास रूपये बचने की बात कल्पना है। यथार्थ को अस्वीकार कर काल्पनिक दु:ख के लिये जो रोते हैं, वे अपनी जिन्दगी व्यर्थ खोते हैं।

46. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा

जटाशंकर चाय पीने के लिये घटाशंकर की होटल पर पहुँचा था। थोडा आदत से लाचार था। हर काम में कमी निकालने का उसका स्वभाव था। उसके इस स्वभाव से सभी परेशान थे।
जहाँ खाना खाने जाता, वहाँ कम नमक या कम मिर्च की शिकायत करके पैसे कम देने का प्रयास करता!
घटाशंकर ने उसे चाय का कप प्रस्तुत किया। धीरे धीरे वह चाय पीता जा रहा था। और मानस में कोई नया बहाना खोजता जा रहा था।
पूरी चाय पीने के बाद वह क्रोध में फुंफकारते हुए

Sep 1, 2012

45. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा


जटाशंकर सिगरेट बहुत पीता था। उसकी पत्नी उसे बहुत समझाती थी। सिगरेट पीने से केंसर जैसी बीमारी हो जाती है! फेफडे गल जाते हैं! घर में थोडा धूआँ फैल जाय तो दीवार कितनी काली हो जाती है! फिर सिगरेट का धुआँ अपने पेट में डालने पर हमारा आन्तरिक शरीर कितना काला हो जाता होगा! धूऐं की वह जमी हुई परत मौत का कारण हो सकती है। इसलिये आपको सिगरेट बिल्कुल नहीं पीनी चाहिये।
एक दिन जटाशंकर की पत्नी अखबार पढ रही थी। उसमें सिगरेट से होने वाले नुकसानों की विस्तार से व्याख्या की गई थी। वह दौडी दौडी अपने पति के पास गई और हर्षित होती हुई कहने लगी- देखो! अखबार में क्या लिखा है? सिगरेट पीने से कितना नुकसान होता है?
जटाशंकर ने अखबार हाथ में लेते हुए कहा- कहाँ लिखा है! जरा देखूं तो सही!
उसने अखबार पढा! पत्नी सामने खडी उसके चेहरे के उतार चढाव देखती रही!
कुछ ही पलों के बाद जटाशंकर जोर से चिल्लाया- आज से बिल्कुल बंद! कल से बिल्कुल नहीं!
पत्नी अत्यन्त हर्षित होती हुई बोली- क्या कहा! कल से सिगरेट पीना बिल्कुल बंद! अरे वाह! मजा आ गया।
जटाशंकर चिल्लाते हुए बोला- अरी बेवकूफ! सिगरेट बंद का किसने कहा! मैं अखबार बंद करने का कह रहा हूँ!
सिगरेट के विरोध में ऐसा छापते हैं! ऐसे अखबार को हरगिज नहीं मंगाना है। न तुम पढोगी, न तुम मुझे बंद करने के लिये कहोगी!
अखबार बंद करने से सिगरेट की खराबी छिप नहीं जाती। विकारों को ही देशनिकाला देना होता है। यही जिन्दगी का सम्यक् परिवर्तन है।

Aug 28, 2012

44 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

जटाशंकर के घर कुछ काम था। एक बडा गड्ढा खुदवाना था। उसने मजदूर रख लिया और काम सौंप कर अपने काम पर चला गया। उसने सोचा था कि जब मैं शाम घर पर जाउँगा, तब तक काम पूरा हो ही जायेगा। शाम जब घर पर लौटा तो उसने देखा कि मजदूर ने गड्ढा तो बिल्कुल ही नहीं खोदा है।
उसने डाँटते हुए कहा- पूरा दिन बेकार कर दिया... तुमने कोई काम ही नहीं किया! क्या करते रहे दिन भर!
मजदूर ने जवाब दिया- हुजूर! गड्ढा खोदने का काम मैं शुरू करने ही वाला था कि अचानक एक प्रश्न दिमाग में उपस्थित हो गया। आपने गड्ढा खोदने का तो आदेश दे दिया पर जाते जाते यह तो बताया ही नहीं कि गड्ढे में से निकलने वाली मिट्टी कहाँ डालनी है? इसलिये मैं काम शुरू नहीं कर पाया और आपका इन्तजार करता रहा।
जटाशंकर ने कहा- इसमें सोचने की क्या बात थी? अरे इसके पास में एक और गड्ढा खोद कर उसमें मिट्टी डाल देता!
उधर से गुजरने वाले लोग जटाशंकर की इस बात पर मुस्कुरा उठे।
हमारा जीवन भी ऐसा ही है। एक गड्ढे को खोदने के लिये दूसरा गड्ढा खोदते हैं फिर उसकी मिट्टी डालने के लिये तीसरा गड्ढा खोदते हैं। यह काम कभी समाप्त ही नहीं होता।
संसार की हमारी क्रियाऐं ऐसी ही है। हर जीवन नये जीवन का कारण बनता है। साध्ाक तो वह है जो जीवन अर्थात् जन्म मरण की इतिश्री करता है।

Aug 24, 2012

43. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

जटाशंकर नौकरी की तलाश में घूम रहा था। वह समझ रहा था कि यदि मुझे शीघ्र ही नौकरी नहीं मिली तो घर का चूल्हा जलना बंद हो जायेगा।
चलते चलते वह एक सर्कस वाले के पास पहुँचा। सर्कस के मैनेजर ने कहा- मैं तुम्हें एक काम दे सकता हूँ। रूपये तुम्हें पूरे मिलेंगे।
जटाशंकर ने कहा- हुजूर! आप जो भी काम सौंपेंगे, मैं करने के लिये तैयार हूँ। बताइये मुझे क्या काम करना होगा?
मैनेजर ने कहा- एक शेर की हमारे पास कमी हो गई है। तुम्हें शेर की खाल पहन कर शेर का अभिनय करना है। बस! थोड़ी देर का काम है। थोडा चीखना है! दहाड लगानी है! आधे घंटे का काम है। पिंजरे में घूमना है। दर्शकों का मनोरंजन हो जायेगा। और तुम्हें पैसे मिल जायेंगे। महीने भर तो यह काम करो, फिर बाद में देखेंगे।
जटाशंकर थोड़ा हैरान हुआ कि शेर का काम मुझे करना पडेगा! पर सोचा कि पैसे तो मिल ही रहे हैं न! फिर क्या चिंता!
दूसरे दिन से समय पर उसने पिंजरे में बैठकर शेर की खाल पहन ली। दर्शकों का जोरदार मनोरंजन किया। नकली शेर तो ज्यादा ही दहाडता है। उसने जो दहाड लगाई, जो उछला, कूदा, लोग आनंदित हो गये।
मैनेजर ने प्रसन्न होकर उसे पुरस्कृत भी किया।
यह क्रम लगातार चलता ही रहा।
एक दिन वह दर्शकों के बीच जालियों से बने पिंजरे में दहाड लगा रहा था कि तभी उस पिंजरे में दूसरे शेर ने प्रवेश किया। असल में उस दिन दो शेरों के प्रदर्शन का कार्यक्रम था।
दूसरा शेर दांत निकाल कर, आँखें तरेर कर जोरदार दहाड रहा था।
दूसरे असली शेर को देखकर नकली शेर मिस्टर जटाशंकर डर गया। उसने विचार किया- लोग मुझे असली शेर समझ सकते हैं पर यह असली शेर तो मुझे सूंघते ही समझ जायेगा कि मैं शेर नहीं बल्कि आदमी हूँ।
उसकी तो मारे डर के घिग्घी बंध गई। उसने तो तुरंत आव देखा न ताव, छलांग लगाई और शेर की खाल उतार कर चारों ओर लगी जालियों पर तेजी से चढ़ गया। लोग चक्कर में पडे कि यह शेर आदमी कैसे हो गया!
जटाशंकर तो जाली पर चढकर जोर जोर से ‘बचाओ बचाओ चीखने लगा।
इतने में दूसरे शेर ने शेर की खाल थोडी सी उतारते हुए कहा- भैया! डर मत! मैं शेर नहीं हूँ।
लोग यह तमाशा देखकर दोहरे हो गये कि यहाँ तो दोनों ही शेर नकली है।
असली असली ही होता है... और नकली नकली! नकली ज्यादा टिकाउ नहीं हो सकता। उसकी तो पोल खुल ही जाती है। हमें अपना जीवन असलियत के आधार पर जीना है। नकली जीवन मात्र कर्मबंधन का ही कारण है।

Aug 17, 2012

42. जटाशंकर

जटाशंकर परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था। अपना कार्ड लेकर मुँह लटका कर रोता हुआ जब घर पहुँचा तो पिताजी ने रोने का कारण पूछा- हाथ में रखा प्रगति पत्र आगे करते हुए कहा- मैं फेल हो गया हूँ। इसलिये रो रहा हूँ।
पिताजी को भी क्रोध तो बहुत आया। साल भर गँवा दिया। यदि मेहनत करता तो निश्चित ही पास हो जाता। इधर उधर घूमता रहा। पढाई की नहीं, तो फेल तो होओगे।
पर सोचा- मेरा लडका वैसे ही उदास है। रो रहा है। यदि मैंने भी क्रोध में इसे डाँटना प्रारंभ कर दिया तो पता नहीं यह क्या कर बैठेगा? कहीं उल्टी सीधी हरकत कर दी तो मैं अपने बेटे से हाथ खो बैठूंगा।
इसलिये सांत्वना देते हुए पिताजी ने कहा- बेटा जटाशंकर! रो मत! तुम्हारे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। इसलिये धीरज धर।
सुनते ही जटाशंकर ने अपना रोना बंद कर दिया और मुस्कुराते हुए कहा- पिताजी! मैं इस बात पर बहुत प्रसन्न हूँ कि मेरे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। अच्छा हुआ जो मैंने मेहनत पूर्वक पढाई नहीं की। यदि करता तो भी फेल हो जाता और इस प्रकार मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाती, मिट्टी में मिल जाती।
मेहनत न करने का दोष भाग्य पर नहीं ढाला जा सकता। भाग्य तो पुरूषार्थ का ही परिणाम है। मेहनत से जी चुराने वाला सदा अनुत्तीर्ण होता है। और दोष अपने आलस्य को नहीं, बल्कि भाग्य को देकर राजी होता है।

Aug 10, 2012

41. जटाशंकर

जटाशंकर परमात्मा के मंदिर में पहुँचा था। चावल के स्वस्तिक की रचना करने के बाद उसने अपनी जेब में से एक अठन्नी निकाली और अच्छी तरह निरख कर भंडार में डाल दी। एक लडका उसे देख रहा था।
उसने जटाशंकर से कहा- सेठजी! यह तो खोटी अठन्नी है। भगवान के पास भी ऐसा छल कपट करते हो! मंदिर में खोटी अठन्नी चढाते हो!
जटाशंकर ने कहा- अरे! तुम्हें पता नहीं है। चिलातीपुत्र, इलायचीकुमार, दृढ़प्रहारी जैसे खोटे लोग भी परमात्मा की शरण को प्राप्त कर सच्चे हो गये थे... तिर गये थे.... तो क्या मेरी खोटी अठन्नी परमात्मा की शरण को पाकर सच्ची नहीं बन जायेगी!
वह लडका तो देखता ही रह गया।
अपने तर्क के आधार पर परमात्मा के मंदिर को भी अपने छल कपट का हिस्सा बनाते हैं। और अपनी बुद्धि पर इतराते हैं। यह स्वस्थ मानसिकता नहीं है।

Aug 8, 2012

40. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.


जटाशंकर को बैंक में पहरेदारी की नौकरी मिली थी। होशियार था तो कम, पर अपने आप को समझता ज्यादा था।
शाम के समय में बैंक मैनेजर ने अपने सामने ताला लगवाया। उस पर सील लगवाई और चौकीदार जटाशंकर से कहा- ध्यान रखना! सील कोई तोड न दें। पूरी रात चौकीदारी करना।
जटाशंकर ने अपनी मूंछों पर अकडाई के साथ हाथ फेरते हुए कहा- आप जरा भी चिंता न करें। इस सील का बाल भी बांका नहीं होने दूंगा।
दूसरे दिन सुबह बैंक मैनेजर ने आकर देखा तो पता लगा कि रात लुटेरों ने बैंक को लूंट लिया है। क्रोध में उसने जटाशंकर को बुलाया और कहा- क्या करते रहे तुम रात भर! यहाँ पूरी बैंक ही लुट गई।
जटाशंकर ने कहा- हजूर! आपने मुझे सील की सुरक्षा का कार्य सौंपा था। मैंने उसे पूरी तरह सुरक्षित रखा है। आप देख लें।
पर चोर तो दीवार में सेंध मार कर भीतर घुसे हैं।
- हुजूर! यह तो मैं देख रहा था। दीवार को तोडते भी देखा, अंदर जाते भी देखा, सामान लूटते भी देखा, सामान ले जाते भी देखा।
- तो फिर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, उन्हें रोकना नहीं था!
- हुजूर! आपने मुझे सील की सुरक्षा की जिम्मेवारी सौंपी थी। मैं इधर उधर कैसे जा सकता था!
मैनेजर ने अपना माथा पीट लिया।

Aug 5, 2012

39. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

39. जटाशंकर     -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.
जटाशंकर परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था। अपना कार्ड लेकर मुँह लटका कर रोता हुआ जब घर पहुँचा तो पिताजी ने रोने का कारण पूछा- हाथ में रखा प्रगति पत्र आगे करते हुए कहा- मैं फेल हो गया हूँ। इसलिये रो रहा हूँ।
पिताजी को भी क्रोध तो बहुत आया। साल भर गँवा दिया। यदि मेहनत करता तो निश्चित ही पास हो जाता। इधर उधर घूमता रहा। पढाई की नहीं, तो फेल तो होओगे।
पर सोचा- मेरा लडका वैसे ही उदास है। रो रहा है। यदि मैंने भी क्रोध में इसे डाँटना प्रारंभ कर दिया तो पता नहीं यह क्या कर बैठेगा? कहीं उल्टी सीधी हरकत कर दी तो मैं अपने बेटे से हाथ खो बैठूंगा।
इसलिये सांत्वना देते हुए पिताजी ने कहा- बेटा जटाशंकर! रो मत! तुम्हारे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। इसलिये धीरज धर।
सुनते ही जटाशंकर ने अपना रोना बंद कर दिया और मुस्कुराते हुए कहा- पिताजी! मैं इस बात पर बहुत प्रसन्न हूँ कि मेरे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। अच्छा हुआ जो मैंने मेहनत पूर्वक पढाई नहीं की। यदि करता तो भी फेल हो जाता और इस प्रकार मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाती, मिट्टी में मिल जाती।
मेहनत न करने का दोष भाग्य पर नहीं ढाला जा सकता। भाग्य तो पुरूषार्थ का ही परिणाम है। मेहनत से जी चुराने वाला सदा अनुत्तीर्ण होता है। और दोष अपने आलस्य को नहीं, बल्कि भाग्य को देकर राजी होता है।

Aug 2, 2012

38. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.


जटाशंकर बस में यात्रा कर रहा था। वह तेजी से कभी बस में आगे की ओर जाता, कभी पीछे की ओर! बस आधी खाली होने पर भी वह बैठ नहीं रहा था। कुछ यात्रियों ने कहा भी कि भैया! बैठ जाओ! सीट खाली पडी है। जहाँ मरजी, बैठ जाओ! पर वह सुना अनसुना कर गया।
आखिर कुछ लोगों से रहा नहीं गया। उन्होंने उसे पकड कर पूछना शुरू किया- तुम चल क्यों रहे हो? आखिर एक स्थान पर बैठ क्यों नहीं जाते?
उसने जवाब दिया! मुझे बहुत जल्दी है। मुझे जल्दी से जल्दी अपनी ससुराल पहुँचना है। वहाँ मेरी सासुजी बीमार है। मेरे पास समय नहीं है। इसलिये तेजी से चल रहा हूँ।
भैया मेरे! बस जब पहुँचेगी तब पहुँचेगी। बस में तुम्हारे चलने का क्या अर्थ है? बस में तुम चल तो कितना ही सकते हो...चलने के कारण थक भी सकते हो... पर पहुँच कहीं नहीं सकते।
जब भी देखोगे, अपने आप को बस में ही पाओगे... वहीं के वहीं पाओगे।
वह चलना व्यर्थ है, जो कहीं पहुँचने का कारण नहीं बनता। हमारी यात्रा भी ऐसी होनी चाहिये जिसका कोई परिणाम होता है। वही यात्रा सफल है।

37. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.


मिस्टर घटाशंकर के गधे को बुखार आ गया था। बुखार बहुत तेज था। गधा जैसे जल रहा था। न कोई काम कर पा रहा था जटाशंकर को अपने गधे से स्वाभाविक रूप से बहुत प्रेम था। वह परेशान हो उठा।
उसने डोक्टर से इलाज करवाने का सोचा। मुश्किल यह थी कि उस गाँव में पशुओं का कोई डोक्टर न था। अत: सामान्य डोक्टर को ही बुलवाया गया।
डोक्टर जटाशंकर ने आते ही गधे का मुआयना किया। उसने देखा- बुखार बहुत तेज है। उसे पशुओं के इलाज का कोई अनुभव नहीं था।
उसने अपना अनुमान लगाते हुए सोचा- सामान्यत: किसी व्यक्ति को बुखार आता है तो उसे एक मेटासिन या क्रोसिन दी जाती है। चूंकि यह गधा है। इसके शरीर का प्रमाण आदि का विचार करते हुए उसने 10 गोलियाँ मेटासिन की इसे देने का तय किया।
घटाशंकर भागा भागा मेटासिन की 10 गोलियाँ ले आया। अब समस्या यह थी कि इसे गधे को खिलाये कैसे?
घटाशंकर ने घास में गोलियाँ डाल कर गधे को खिलानी चाही। पर गधा बहुत होशियार था। उसने अपने मालिक को जब घास में कुछ सफेद सफेद गोलियाँ डालते देखा वह सशंकित हो गया। उसने सोचा- कुछ गडबड है। मैं इस घास को हरगिज नहीं खाउँगा, पता नहीं मेरे मालिक ने इसमें क्या डाल दिया है। जरूर यह सारी गडबड इस दूसरे आदमी की है।
घटाशंकर ने बहुत प्रयास किया कि वह गोलियों वाली घास खाले। पर गधा टस से मस न हुआ
आखिर हारकर घटाशंकर ने डोक्टर जटाशंकर से पूछा- अब क्या किया जाये? वह रूआँसा होकर कहने लगा- डोक्टर साहब! इसे गोलियाँ आपको कैसे भी करके खिलानी है? यह काम आप ही कर सकते हैं। मैं आपको दुगुनी फीस दूंगा।
दुगुनी फीस प्राप्त होने के निर्णय से प्रसन्न होते हुए जटाशंकर ने कुछ सोच कर योजना बनाई। उसने कहा- तुम एक काम करो। एक गोल भूंगली ले आओ। भूंगली के इस सिरे पर 10 गोलियाँ रखो। फिर भूंगली के सामने वाले सिरे को गधे के गले में अन्दर तक डाल दो। फिर भूंगली के इधर वाले सिरे से मैं जोर से फूंक मारता हूँ। फिर देखो, सारी गोलियाँ सीधी गधे के पेट में चली जायेगी।
अपनी योजना पर राजी होते हुए उसने इसे क्रियान्वित करना प्रारंभ किया। घटाशंकर दौडकर चूल्हा फूंकने वाली भूंगली ले आया।
डोक्टर जटाशंकर ने भूंगली गधे के मुँह में डालने के बाद इधर वाले सिरे पर गोलियाँ रखनी प्रारंभ की।
गधा अचरज में पड गया। यह आदमी मेरे साथ क्या कर रहा है? वह चौकन्ना हो उठा।
डोक्टर ने गोलियाँ रखकर भूंगली का इधर वाला सिरा अपने मुँह में डाल दिया और जोर से फूंक मारने की तैयारी करने लगा।
वह फूंक मारे, उससे पहले ही भडक कर गधे से जोर से एक फूंक मार दी। गधे की फूंक से सारी गोलियाँ डोक्टर के पेट में पहुँच गई।
डोक्टर गधे को तो न खिला सका। सारी गोलियाँ उसी का आहार बन गई।
योजना बनाना बहुत आसान है। पर बहुत बार बाजी पलट कर उसी को लपेट में ले लेती है।

Aug 1, 2012

36. जटाशंकर         -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.

घटाशंकर की विद्वत्ता दूर दूर तक प्रसिद्ध थी। पर लोगों के मन में इस बात का रंज था कि पंडितजी घोर अहंकारी है। किसी की भी बात को काटने में ही वे अपनी विद्वत्ता को सार्थक मानते थे।

एक बार जटाशंकर ने उन्हें भोजन करने का निमंत्रण दिया। पंडित प्रवर ज्योंहि भोजन करने के लिये बैठे, जटाशंकर ने उन्हें याद दिलाते हुए कहा- आप हाथ धोना भूल गये हैं, चलिये पहले हाथ धो लीजिये।

पंडितजी को भी अपनी भूल तो समझ में आ गई कि भोजन की थाली पर आने से पूर्व ही हाथ धो लेने चाहिये थे। पर अब क्या करें? कोई और मुझे मेरी गलती बताये, यह मुझे मंजूर नहीं है।

उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- अरे यजमान! क्या तुम पानी से हाथ धोने की बात करते हो। हमारे अन्दर तो ज्ञानगंगा लगातार बह रही है। इसलिये उस जल से हम सदा स्वच्छ ही रहते हैं। क्या इस बाहर के पानी से हाथ धोना!

जटाशंकर इस उत्तर से अन्दर ही अन्दर बहुत कुपित हुआ। उसने इस उत्तर का प्रत्युत्तर देने का तय कर लिया।

भोजन में भरपूर दाल बाटी खा लेने के बाद पंडित प्रवर घटाशंकरजी को गहरी निद्रा आने लगी। वे खूंटी तानकर सो गये। सोने से पहले यजमान जटाशंकर को कहा- भैया! पानी का लोटा भर कर सिरहाने के पास रख देना।

जटाशंकर के दिमाग में पंडितजी का उत्तर तैर रहा था।

उसने कमरे में पंडितजी को सुलाकर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और पास वाले कमरे में जाकर सो गया।

एक घंटे के विश्राम के बाद दो बजे पंडितजी की आँख खुली। उन्हें जोरदार प्यास लगी थी। पानी पीने के लिये लोटा हाथ में लिया तो  देखा  कि लोटा तो एकदम खाली था। उसे यजमान के प्रति बडा क्रोध आया। मैंने कहा था कि लोटा भर कर रखना। पर इसने तो रखा ही नहीं।

उन्होंने दरवाजा खटखटाना शुरू किया। जटाशंकर सुन रहा था, पर दरवाजा नहीं खोला। आखिर पंडितजी जोर से चिल्लाने लगे। प्यास खतरनाक रूप से गहरी हो गई।

आखिर चार बजे जटाशंकर ने दरवाजा खोला। और कृत्रिम क्षमायाचना करते हुए कहने लगा- माफ करना पंडितजी, जरा आँख लग गई थी। फरमाईये कोई काम तो नहीं!

पंडितजी ने आँखें तरेरते हुए कहा- काम पूछता है। प्यासा मार दिया। एक बूंद पानी लोटे में नहीं था।

जटाशंकर ने कहा- अरे पंडितजी! आप क्या पानी पानी करते हो! ज्ञानगंगा आपके भीतर ही बह रही है। प्यास लगी थी तो एक लोटा वहीं से भरकर पी लेते। क्या बाहर का पानी पीते हो! अंदर के ज्ञानघट का पानी पीजिये।

अपने नहले पर इस दहले को सुनते ही पंडितजी को बात समझ में आ गई। उन्होंने क्षमायाचना करने में सार समझा।

जीवन में व्यवहार जरूरी है। दार्शनिकता का संबंध चिंतन से है। जबकि जीवन तो व्यवहार से चलता है।

35 जटाशंकर      -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.

जटाशंकर की माता सामायिक कर रही थी। दरवाजे के ठीक सामने ही उसने अपना आसन लगाया था। सामायिक लेकर वह माला हाथ में लेकर बैठ गयी थी। उसकी बहू पानी लेने के लिये कुएं पर जाने की तैयारी कर रही थी। तब नल घरों में लगे नहीं थे। बहूजी ने घडा हाथ में लिया... इंडाणी भी ले ली..। पर बहुत खोजने पर भी उसे पानी छानने के लिये गरणा नहीं मिला। उसने इधर से उधर पूरा कमरा छान मारा... पर गरणा नहीं मिला।

सासुजी सामायिक में माला फेरते फेरते भी बहू को देख रही थी। वह समझ गयी थी कि बहू को गरणा नहीं मिला है। सासुजी को सामने ही गरणा नजर आ रहा था। पर बहू को नहीं दीख रहा था। सासुजी ने माला फेरते फेरते हूं हूं करते हुए कई बार इशारा किया। पर बहूजी समझ नहीं पाई।

इशारा करते सासुजी को बहूजी ने देखा तो आखिर परेशान होकर कह ही दिया कि मांजी! अब आप बताही दो कि गरणा कहाँ रखा है? मुझे देर हो जायेगी पानी लाने में... फिर दिन भर के हर काम में देर होती ही रहेगी।

सासुजी साधु संतों के प्रवचनों में जाने वाली थी। वह जानती थी कि सामायिक में सांसारिक वार्तालाप किया नहीं जाता। धार्मिक शब्दों का ही उच्चारण किया जा सकता है। अब गरणा मेरे सामने पडा है, पर बहू को बताउँ कैसे?

आखिर उसने युक्ति काम में ली। उसने एक पद्य की रचना की। वह जोर से बोलने लगी!

अरिहंत देव को शरणो।

खूंटी पर पड्यो है गरणो! 

अरिहंत परमत्मा का नाम लेकर अपने धार्मिक मन को संतोष भी दे दिया और गरणे का स्थान बताकर बहू का समाधान भी कर लिया।

यह गली निकालने वाली बात है। यह धार्मिक प्रवृत्ति नहीं कही जा सकती। हम गलियाँ निकालने में माहिर है पर इससे मूल सिद्धांतों के साथ धोखा कर बैठते हैं।

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Jul 29, 2012

34 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

34 जटाशंकर   -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.
जटाशंकर ठग था। ठगी करके अपना गुजारा चलाता था। वह घी बेचने का काम करता था। एक दिन उसे रास्ते घटाशंकर मिल गया। जटाशंकर ने सोचा- मैं इसे पटा लूं और घी बेच दूं। उसे पता नहीं था कि घटाशंकर भी पहुँचा हुआ ठग है। वह भी यह विचार कर रहा था कि जटाशंकर को पटा कर इसे सोने की अंगूठी बेच दूं।
जटाशंकर ने घटाशंकर से और घटाशंकर ने जटाशंकर से परिचय साधा। दोनों आपस में बात करने लगे। घटाशंकर ने पूछा- भैया! क्या हाल चाल है?
जटाशंकर ने जवाब दिया- बहुत मुश्किल काम हो रहा है। जब से डालडा लोग खाने लगे हैं, असली घी को तो कोई पूछता ही नहीं है। मैं सुबह से घूम रहा हूँ गाय का घी लेकर... पर कोई खरीददार नहीं मिला। देखो, कितना सुगंधदार, शानदार, दानेदार घी है! यों कहकर थोडा-सा घी घटाशंकर की अंगुली पर धरा।
घटाशंकर बोला- मेरा भी यही हाल है। मैं सोने के आभूषण बेचता हूँ! पर सत्यानाश हो इन नकली आभूषणों का! जब से नकली आभूषण बाजार में आये हैं, लोग वही पहनने लगे हैं। असली सोने के आभूषणों को कोई हाथ भी नहीं लगाता। देखो, कितना सुन्दर यह आभूषण है। यह कहकर उसे सोने की अंगूठी दिखाई।
दोनों ने एक दूसरे को पटाना प्रारंभ किया। घटाशंकर ने जटाशंकर से घी खरीद लिया। और जटाशंकर ने घटाशंकर से अंगूठी!
दोनों अपने मन में बडे राजी हुए। सोचते थे अपने मन में कि मैंने उसे ठगा।
घर जाने के बाद जब घटाशंकर ने घी का डिब्बा दूसरे डिब्बे में खाली किया तो पाया उपर दो अंगुल ही घी था, उसके नीचे तो पानी भरा था।
जटाशंकर ने सोने के अंगूठी को जब किसी सुनार को दिखाई तो पता लगा कि अंगूठी तो पीतल की है, उपर सोने का मात्र धूआं है।
दोनों चिल्लाने लगे कि मुझे ठग लिया है।
यह दुनिया ऐसी ही है। हम सोचते हैं कि मैंने ठगा, पर हकीकत है कि हम ठगे गये। यहाँ हर व्यक्ति एक दूसरे को ठग रहा है। और राजी हो रहा है। सत्य की आँख खुले तो जिंदगी बदल जाये।

Jul 28, 2012

33. जटाशंकर उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

33. जटाशंकर  उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

 जटाशंकर पढाई कर रहा था। पढाई में मन उसका और बच्चों की भाँति कम ही लगता था। पिताजी बहुत परेशान रहते थे। बहुत बार डाँटते भी थे। पर वांछित परिणाम आया नहीं था। वह बहाना बनाने में होशियार था।
आखिर पिताजी ने तय कर लिया कि वे अब उसे डांटेंगे नहीं, बल्कि प्रेम से समझायेंगे।
उन्होंने अपने बच्चे को अपने पास बिठाकर तरह तरह से समझाया कि बेटा! यही उम्र है पढाई की! मूर्ख व्यक्ति की कोई कीमत नहीं होती।
दूसरे दिन उन्होंने देखा कि बेटा पढ तो रहा है। पर कमर पर उसने रस्सी बांध रखी है।
यह देखकर पिताजी बडे हैरान हुए।
उन्होंने पूछा- जटाशंकर! यह तुमने रस्सी क्यों बाँध रखी है?
-अरे पिताजी! यह तो मैं आपकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ।
-अरे! मैंने कब कहा था कि रस्सी बांधनी चाहिये!
-वाह पिताजी! कल ही आपने मुझे कहा था कि बेटा! अब खेलकूद की बात छोड और कमर कस कर पढाई कर!
सो पिताजी कमर कसने के लिये रस्सी तो बांधनी पडेगी न!
पिताजी ने अपना माथा पीट लिया।
शब्द वही है, पर समझ तो हमारी अपनी ही काम आती है। कहा कुछ जाता है, समझा कुछ जाता है, किया कुछ जाता है! ऐसा जहाँ होता है, वहाँ जिंदगी दुरूह और कपट पूर्ण हो जाती है। मात्र शब्दों को नहीं पकडना है... भावों की गहराई के साथ तालमेल बिठाना है।

Jul 27, 2012

32 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

32 जटाशंकर       -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.

जटाशंकर सेना में ड्राइवर था। घुमावदार पहाड़ी रास्ते में एक दिन वह ट्रक चला रहा था कि उसकी गाड़ी खाई में गिर पडी। वह तो किसी तरह कूद कर बच गया परन्तु गाडी में रखा सारा सामान जल कर नष्ट हो गया।
सेना ने जब इस घटना की जाँच की तो सबसे पहले जटाशंकर से पूछा गया कि तुम सारी स्थिति का वर्णन करो कि यह दुर्घटना कैसे हुई।
जटाशंकर हाथ जोड कर कहने लगा- अजी! मैं गाड़ी चला रहा था। रास्ते में मोड बहुत थे। गाड़ी को पहले दांये मोडा कि बांये हाथ को मोड आ गया। मैंने गाडी को फिर बांये मोडा। फिर दांये मोड आ गया। मैंने दांयी ओर गाडी को काटा। कि फिर बांयी ओर मोड आ गया, मैंने फिर गाडी को बांयी ओर मोडा। दांये मोड, फिर बांये मोड, फिर दांये मोड, फिर बांये मोड, ऐसे दांये से बांये और बांये से दांये मोड आते गये, मैं गाडी को मोडता रहा! मैं गाडी को मोडता रहा और मोड आते रहे। मोड आते रहे... मैं मोडता रहा! मैं मोडता रहा... मोड आते रहे।
एक बार क्या हुआ जी कि मैंने तो गाडी को मोड दिया पर मोड आया ही नहीं! बस गाडी में खड्ढे में जा गिरी!
यह अचेतन मन की प्रक्रिया है। हम बहुत बार अभ्यस्त हो जाते हैं। और जिसमें अभ्यस्त हो जाते हैं, उस पर से ध्यान हट जाता है। फिर मशीन की तरह हाथ काम करते हैं, दिमाग भी मशीन की तरह काम करने लग जाता है। फिर मोड आये कि नहीं आये... गाडी को दांये बांये मोडने के लिये हाथ अभ्यस्त हो जाते हैं। हम अपने जीवन को इसी तरह जीते हैं। हर कदम उठने से पहले उस कदम के परिणामों का चिंतन जरूरी है, यही जागरूकता है।

Jul 26, 2012

31. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.


31. जटाशंकर         -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.

मिस्टर जटाशंकर का व्यापार चल नहीं रहा था। कोई युक्ति समझ में आ नहीं रही थी। क्या करूँ कि मैं अतिशीघ्र करोड़पति बन जाऊँ! आखिर उसने अपना दिमाग लडाकर एक ठगी का कार्य करना प्रारंभ किया। बाबा का रूप धार लिया। बोलने में तो उस्ताद था ही। उसने स्वर्ग के टिकट बेचने प्रारंभ कर दिये। उसने वचन दिया सभी को कि जो भी इस टिकिट को खरीदेगा, उसे निश्चित रूप से स्वर्ग ही मिलेगा, भले उसने जिन्दगी में कितने ही पाप किये हों... न केवल पूर्व के किये गये पाप नष्ट हो जायेंगे बल्कि भविष्य में होने वाले पापों की सजा भी नहीं भुगतनी होगी। बस केवल एक टिकिट खरीदना होगा और मरते समय उसे यह टिकिट अपनी छाती पर रखना होगा।
लोगों को तो आनंद आ गया। मात्र 5000 रूपये में स्वर्ग का रिजर्वेशन! और क्या चाहिये! फिर पाप करने की छूट! लोगों में तो टिकिट खरीदने के लिये अफरातफरी मच गई। हजारों टिकट बिक गये।
बहुत बडी राशि एकत्र कर वह अपने आश्रम लौट रहा था।
उसकी कार फर्राटे भरती हुई दौड रही थी। जटाशंकर अतिप्रसन्न था कि मेरा आइडिया कितना सफल रहा। रूपये उसने बडे बडे बैगों में भरकर कार की डिक्की में रखवा दिये थे। घर जल्दी पहुँचने के भाव थे।
रास्ता थोडा टेढा था। बीच में जंगल भी था। घुमावदार रास्ते में उसकी गाडी तेजी से दौड रही थी। कि अचानक सामने एक मोड पर बीच रास्ते पर कुछ बडे बडे पत्थर पडे दिखाई दिये।
ड्राईवर को गाडी रोकनी पडी। अचानक चारों ओर से बंदूक और पिस्तौल ताने लोग कार पर हमला करने लगे। उन डाकुओं के सरदार ने बाबा जटाशंकर के पास जाकर उसकी गर्दन से पिस्तौल लगा कर कहा- बाबा! रूपयों के बैग जल्दी से मेरे हवाले कर दो। बहुत पैसा एकत्र किया है तुमने!
बाबा जटाशंकर घबराते हुए बोला- अरे! एक संत को तुम लूट रहे हो... तुम्हें खतरनाक दंड भोगना पडेगा। नरक मिलेगी नरक!
सरदार ने कहा- बाबा! उसकी तुम चिंता न करो! मैं नरक में जाने वाला नहीं हूँ! क्योंकि मैंने स्वर्ग का टिकट खरीद लिया है। आपने ही तो कहा था- भविष्य में कुछ भी पाप करो... तुम्हें स्वर्ग ही मिलेगा!
इसलिये बाबा! आप तो जल्दी से सारी राशि मेरे हवाले करो।
बाबा जटाशंकर अपनी ही बातों में फँस गया था।
स्वर्ग कोई और नहीं दे सकता। कोई टिकट नहीं होता! हम स्वयं ही अपना स्वर्ग या नरक तय करते हैं। हमारा आचरण ही हमें स्वर्ग या नरक ले जाता है।

Jul 25, 2012

16 नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


इस जगत में कोई भी व्यक्ति अपमान करने योग्य नहीं है। सम्मान करने योग्य व्यक्ति भरे पड़े हैं। खराब से खराब काम करने वाला व्यक्ति भी निंदा योग्य नहीं है। सामान्य से सामान्य अच्छा कार्य करने वाला भी परम अभिनंदनीय है। क्योंकि खराब या अच्छा काम करने वाला कल क्या बनेगा, हमें पता नहीं है! हमें उससे मतलब भी नहीं है। पर हमारे द्वारा निंदा या सम्मान की की गई क्रिया हमें अच्छा या बुरा फल अवश्य दे देती है।
हमारी प्रतिक्रिया ‘कि्रया की अच्छाई या बुराई को कम या बाद में प्रकट करती है... हमारे अपने अच्छे या बुरे स्वभाव को पहले प्रकट करती है। अच्छी प्रतिक्रिया करने का हमें जन्मसिद्ध अधिकार है, बुरी प्रतिक्रिया करने का हमें कोई अधिकार नहीं है।
जीव की भवितव्यता का हमें कोई पता नहीं है। आज दिखाई देने वाला खराब व्यक्ति कब अच्छा हो सकता है। कब उसके पुण्य उदय में आयेंगे... कब भवितव्यता जोर मारेगी और जीवन बदल जायेगा। तब उसे उसके अतीत के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
और अतीत तो हर आत्मा का संसार से भरा हुआ ही होता है। जो भी सिद्ध बना है, उसका भी अतीत तो राग द्वेष से भरा हुआ ही था। ‘कल तो हर आत्मा का कषाय से भरा हुआ ही होता है।
इसलिये महत्वपूर्ण ‘कल नहीं है, महत्वपूर्ण ‘कल है।
बीता हुआ कल महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। आने वाला कल ही महत्वपूर्ण होता है।
वह क्या है.. यह महत्वपूर्ण नहीं है। वह क्या होगा, यह महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें भविष्य का राज छिपा है। इसमें उसके अस्तित्व के आयाम छिपे है।
इसलिये अतीत कितना ही खराब क्यों न हो, उसे दोष मत दो! उसका अपमान मत करो! उज्ज्वल भविष्य का सदैव बहुमान करना सीखो।
दुर्गुणों का अपमान करने के बजाय सद्गुणों का सम्मान करना सीखो। विकारों का पैदा होना, आश्चर्यजनक घटना नहीं है, क्योंकि ये तो हमारी चेतना के अनादिकाल के संस्कार है। हर भव में यही किया है। आश्चर्यजनक घटना तो यह है, जब ऐसे वातावरण में भी हमारे चित्त में पवित्रता और सद्गुणों का संचार होता है। सद्गुणों का सम्मान हमारे अन्तर को सद्गुणों से भर देगा।

कोई भी ना है बुरा, परिणति का परिमाण।
परिवर्तन में देर ना, भावी है अनजान।।

Jul 24, 2012

30 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

30 जटाशंकर     -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.
जटाशंकर रोज अपने घर के पिछवाडे जाकर परमात्मा से हाथ जोड कर प्रार्थना करता- हे भगवान! कुछ चमत्कार दिखाओ! मैं रोज तुम्हारी पूजा करता हूँ! नाम जपता हूँ। फिर इतना दुखी क्यों हूँ!
भगवन् मुझे कुछ नहीं चाहिये। बस! थोडे बहुत रूपये चाहिये। कभी कृपा करो भगवन्! ज्यादा नहीं बस सौ रूपये भेज दो! कहीं से भेजो! आकाश से बरसाओ चाहे... पेड पर लटकाओ! मगर भेजो जरूर! रोज रोज नहीं, तो कम से कम एक बार तो भेजो! और भगवन् ध्यान रखना! मैं अपनी आन बान का पक्का आदमी हूँ। पूरे सौ भेजना! ज्यादा मुझे नहीं चाहिये। एक भी ज्यादा हुआ तो भी मैं नहीं रखूंगा। एक भी कम हुआ, तब भी नहीं रखूंगा। जहाँ से रूपया आयेगा, उसी दिशा में वापस भेज दूंगा। मगर कृपा करो! एक बार सौ रूपये बरसा दो भगवन्!
पडौस में रहने वाला घटाशंकर रोज उसकी यह प्रार्थना सुनता था। उसने सोचा- चलो.. इसकी एक बार परीक्षा कर ही लें। देखें... यह क्या करता है।
उसने हँसी मज़ाक में एक थैली में 99 रूपये के सिक्के डाले और शाम को जब जटाशंकर आँख बंद कर प्रार्थना कर रहा था तब उसने दीवार के पास छिप कर निन्याणवें रूपये की वह थैली उसके हाथ में फेंक दी।
थैली का वजन भांप कर तुरंत जटाशंकर ने अपनी आँखें खोली। इधर उधर देखा.. कोई नजर नहीं आया। नजर कोई कहाँ से आता क्योंकि घटाशंकर तो थैली फेंक कर छिप गया था। वह छिप कर सब देख रहा था।
जटाशंकर तो थैली पाकर फूला नहीं समा रहा था। उसने सोचा- अहा! भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली। मैं रोज मांगता था.. आज मेरी मांग लगता है पूरी हो गई है। भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा बढ गई।
उसने बुदबुदाते हुए कहा- लेकिन भगवान! आपको मेरी शर्त याद है न! पूरे सौ होने चाहिये। एक भी कम नहीं! एक भी ज्यादा नहीं! कम-ज्यादा हुए तो वापस लौटा दूंगा।
जटाशंकर ने वहीं बैठकर थैली खोलकर रूपये गिनने शुरू किये! रूपये 99 निकले। उसका चेहरा उतर गया।
दीवार की ओट में छिपा घटाशंकर सोच रहा था कि अब 99 ही है... थैली फेंक वापस जल्दी से!
जटाशंकर ने दुबारा गिनना शुरू किया- शायद पहले मेरी गणना में भूल हो गई हो। लेकिन दुबारा भी 99 ही निकले। अब 99 ही थे। सौ थे ही नहीं तो एक बार गिनो चाहे पचास बार गिनो... 99 कभी भी सौ नहीं हो सकते।
जटाशंकर बहुत विचार में पड गया। उसने सोचा- भगवान की गणना में भूल कैसे हो सकती है। मैंने 100 मांगे थे..तो 99 कैसे निकले! अब क्या करूँ! यह थैली मुझे वापस फेंकनी पडेगी। यह तो ठीक नहीं हुआ। पैसा पाने के बाद वापस खोना पडेगा। वह काफी देर तक थैली हाथ में लेकर बैठा रहा... सोचता रहा...बार बार पैसे रगड रगड कर गिनता रहा!
घटाशंकर दीवार के उस पार देख देख कर मुस्कुरा भी रहा था और थैली का इंतजार भी कर रहा था। वह मन ही मन जटाशंकर को कह रहा था- भैया! कितनी ही बार गिन ले- 99 ही है। क्योंकि यह थैली कोई भगवान ने नहीं भेजी, बल्कि मैंने भेजी है। अब तूं जल्दी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वापस फेंक! ताकि मुझे मेरी थैली मिले और काम पे लगूं! लेकिन वह चिन्ता भी कर रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि यह प्रतिज्ञा भूल जाय और थैली रख ले... मुझे सौ रूपयों का नुकसान हो जायेगा।
वह आँखें फाड कर देख रहा था।
जटाशंकर विचार करते करते अचानक राजी होते हुए बोला- अरे.. वाह भगवान! तुम भी क्या खूब हो.. पक्के बनिये हो। भेजे तो तुमने पूरे सौ रूपये! परंतु एक रुपया थैली का काटकर 99 रूपये रोकड भेज दिये! वाह भगवान वाह!
घटाशंकर ने अपना माथा पीट लिया।
सांसारिक स्वार्थ के लिये तर्क करना हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं! परन्तु अपनी बुद्धि का प्रयोग स्वयं के लिये अर्थात् अपनी आत्मा के लिये नहीं करते।