Showing posts with label NavPrabhat by Maniprabhsagar. Show all posts
Showing posts with label NavPrabhat by Maniprabhsagar. Show all posts

Sep 1, 2012

39. नवप्रभात -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

आवेश में आना बहुत आसान है। आवेश में निर्णय करना भी बहुत आसान है। और आवेश में किये गये निर्णय को क्रियान्वित करने के लिये और ज्यादा आवेश में आना भी बहुत आसान है। किन्तु यह स्थिति आदमी को बहुत नुकसान पहुँचाती है।
क्योंकि आवेश का अर्थ होता है- किसी एक तरफ दिमाग का जड हो जाना! वह वही देखता है.. उसे उन क्षणों में और कुछ नजर नहीं आता। उसका दिमाग... उसके विचार.. बस! एक ही दिशा में दौडते हैं। दांये बांये, आगे पीछे की दृष्टि को जैसे ताला लग गया हो!
वह एकांगी हो जाता है। और इस कारण उसका निर्णय सर्वांगीण नहीं हो पाता। उसका निर्णय मात्र उस समय की घटना या परिस्थिति पर ही आधारित होता है। वह उसके परिणाम के बारे में विचार नहीं करता। उसका निर्णय परिणामलक्षी नहीं होता।
मुश्किल यह है कि निर्णय तो तत्काल के आधार पर लेता है, पर उसका निर्णय उसके पूरे जीवन को प्रभावित करता है। एक बार निर्णय होने के बाद उससे पीछा छुडाना आसान नहीं होता।
इसलिये शान्ति और आनंद का पहला सूत्र है- आवेश में मत आओ! लेकिन बहुत मुश्किल है इस सूत्र के आधार पर चलना। क्योंकि जीवन विभिन्न राहों से गुजरता है। बहुत मोड हैं इसमें! तब अपने आपको संभालना मुश्किल हो जाता है।
तब दूसरे सूत्र का उपयोग करो- आवेश में आना पडे तो आओ, मगर उन क्षणों में कोई निर्णय मत लो! उन क्षणों का निर्णय निश्चित ही तुम्हारे जीवन रस धार में जहर भरने का काम करेगा। वह जिंदगी भर की कमाई को पल भर में साफ कर देगा। इसलिये यदि शांति चाहते हो तो आवेश के क्षणों में निर्णय लेना टालो। लेकिन मन को समझाना बहुत मुश्किल है। शांति की स्थिति में निर्णय लेने में अत्यंत आलसी होता है। परन्तु आवेश के क्षणों में जल्दबाजी करता है।
तब तीसरे सूत्र का उपयोग करो- आवेश में लिये गये निर्णय को कभी भी क्रियान्वित मत करो! उसे रोक दो। मन को थोडा सोचने का मौका दो! थोडा उसे धीरज मिलने दो! तब निर्णय पर मन अपने आप पुनर्विचार करेगा और तब पायेगा कि अच्छा हुआ जो निर्णय को स्वर नहीं दिया अन्यथा बहुत अनर्थ हो जाता।
हालांकि मन आवेश के क्षणों में लिये गये निर्णय को क्रियान्वित करने के लिये बहुत उतावला हो जाता है। वह एक क्षण भी रूकना नहीं चाहता। वह न पीछे मुडकर देखना चाहता है... न आगे की रोशनी उसे नजर आती है।
उन क्षणों में अपने चित्त को समझाना है। जो व्यक्ति आवेश के क्षणों में कुछ पलों के लिये भी संभल जाता है, वह अपने जीवन की तस्वीर में मोहक रंग भर लेता है।

Aug 28, 2012

38. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

काला, घना काजल से भी गहरा अंधेरा है! दांये हाथ को बांये हाथ का पता नहीं चल पा रहा है, इतना अंधेरा है। और मुश्किल यह है कि यह द्रव्य अंधेरा नहीं है। द्रव्य के अंधेरे को मिटाने के लिये एक दीया काफी है। एक दीपक की रोशनी हमारे कक्ष में उजाला भर सकती है।
यह अंतर का अंधेरा है। आँखों में रोशनी होने पर भी अंधेरा है। सूरज के प्रकाश में भी अंधेरा है। किधर चलें, कहाँ चलें, किधर जायें, क्या करें..... आदि आदि प्रश्न तो बहुतेरे हैं, पर समाधान नहीं है। अंतर के अंधेरे से जूझना भी कोई आसान काम नहीं है। जितना जितना उस बारे में सोचता हूँ, उतना ही ज्यादा मैं उसमें उलझता जाता हूँ।
बैठा रहता हूँ माथे पर चिंता की लकीरें लिये! पडा रहता हूँ शून्य चेहरे के साथ! उदास होकर बैठ जाता हूँ हाथ पर हाथ धर कर! रोता रहता हूँ अपने को, अपनी तकदीर को!
लेकिन मेरे भैया! यों हाथ पर हाथ धरके बैठने से क्या होगा? रोने से रोशनी तो नहीं मिलेगी न!
इसलिये उठो! जागो! पुरूषार्थ करो!
रोओ मत! थोडा हँसो! अपने भाग्य पर हँसो! और अपनी हँसी से यह दिखाओ कि मैं तुमसे हार मानने वाला नहीं है। अपनी हँसी से पुरूषार्थ का भी स्वागत करो।
अपने बिगडे भाग्य पर रोने के बजाय पुरूषार्थ में प्रचंडता लाओ! और पुरूषार्थ के बल पर भाग्य को अंगूठा दिखाने का प्रयास करो। पुरूषार्थ से भाग्य की दिशा बदल दो। तुम्हारे जीवन में हजारों सूर्यों की रोशनी उतर आयेगी।
तुम जड नहीं हो, जो पडे रहो।
तुम चैतन्य हो, जो अनंत शक्ति का स्रोत है। बस! उस शक्ति का परिचय करना है, उसे प्रकट करने का साहस करना है।
बांसुरी भी पडे पडे नहीं बजा करती! वीणा के तार भी अपने आप नहीं झनझनाते! मृदंग में से माधुर्य-रसगंगा भी थाप खाकर ही बहने लगती है।
तुममें शक्ति है, उसे अभिव्यक्ति देनी है। बीज को जलवायु देनी है ताकि वह विराट् वृक्ष का रूप पा सके।

Aug 24, 2012

37. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

अपने घर की खोज हम लम्बे समय से कर रहे हैं। पर मिला नहीं है। इसलिये नहीं कि दूरी बहुत है। दूरी तो जरा भी नहीं है। दूरी तो मात्र इतनी है कि देखा कि पाया!
एक कदम आगे बढाया कि मंज़िल मिली!
हाथ लंबा किया कि द्वार पाया!
दूरी अधिक नहीं है, फिर भी अभी तक अपना घर मिला नहीं है। इसलिये भी नहीं कि हम चले नहीं है। हम बहुत चले हैं। और इतना चले हैं कि थक कर चूर हो गये हैं। गोल गोल चक्कर न मालूम कितने काटे हैं। यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ भागने, दौडने में जिन्दगियाँ पूरी हो गई है। जिसे खोजने चले हैं, उसे पाने के लिये तो एक जिंदगी ही पर्याप्त है। यह विडम्बना ही है कि जिसे एक ही जिंदगी में, एक ही जिंदगी से पाया जा सकता है, उसे बहुत सारी जिन्दगियाँ खोने पर भी नहीं पा सके हैं।
चले बहुत हैं, फिर भी नहीं पाया है तो इसका अर्थ है कि कहीं कोई समस्या है! कहीं कोई गलती हो रही है।
दिशा भी सही है। चले भी हम सही दिशा में है। किन्तु बीच में अटक गये हैं। थोडा भटक गये हैं। क्योंकि बीच में बहकाने वाले बहुत दृश्य है। सुन्दर बगीचे हैं। कलकल बहते झरणे हैं।
आँखों को सुकून दें, ऐसे दृश्य हैं।
कानों में रस घोल दे, ऐसा संगीत है।
जीभ को स्वाद दें, ऐसे पदार्थ हैं।
पाँव वहीं टिक जाय, ऐसे महंगे कालीन है।
तिजोरी में सजाने का मन हो जाय, ऐसे रत्न है।
और बस! आँख टिकी कि मन भटका! और मन भटका कि मंज़िल दूर हुई। सारा पुरूषार्थ व्यर्थ हुआ। किनारे पहुँची नैया फिर मंझधार में झकोले खाने लगी। अपना घर फिर अपने से दूर हुआ।
बहुत भटके हो, अब अपने घर को याद करो। याद किया नहीं कि घर हाजिर हुआ नहीं। बस थोडा मन लगाकर याद करने की जरूरत है। थोडी देर अपने मन को उस याद में डूबोने की जरूरत है।

Aug 17, 2012

36. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


अपने अतीत का जो व्यक्ति अनुभव कर लेता है, वह वर्तमान में जीना सीख लेता है। वर्तमान कुछ अलग नहीं है। वर्तमान की हर प्रक्रिया मेरे अतीत का हिस्सा बन चुकी है। और एक बार नहीं, बार बार मैं उसे जी चुका हूँ।
मुश्किल यह है कि मुझे उसका स्मरण नहीं है। मैं उस अतीत की यथार्थ कल्पना तो कर सकता हूँ। पर उसे पूर्ण रूप से स्मरण नहीं कर पाता। इस कारण मैं अपने आपको बहुत छोटा बनाता हूँ। मैंने अपने जीवन को कुऐं की भांति संकुचित कर लिया है। वही अपना प्रतीत होता है। उस कुऐं से बाहर के हिस्से को मैं अपना नहीं मानता। क्योंकि यह मुझे ख्याल ही नहीं है कि वह बाहर का हिस्सा भी कभी मेरा रह चुका है।
अतीत में छलांग लगाना अध्यात्म की पहली शुरूआत है। अतीत को जाने बिना मैं वर्तमान को समग्रता से समझ नहीं पाता। और वर्तमान को जाने बिना कोई भविष्य नहीं है। सच तो यह है कि भविष्य कुछ अलग है भी नहीं, वर्तमान ही मेरा भविष्य है।
अपने अतीत को जानने का अर्थ है- अतीत में मैं कहाँ था, मैं क्या था, इसे जान लेना। वह अतीत किसी और का नहीं है, मेरा अपना है। और अतीत होने से वह पराया नहीं हो जाता। उसका अपनत्व मिटा नहीं है। मात्र अतीत हुआ है।
यदि अतीत होने से उसे अपना मानना छोड देंगे तो कुछ जी ही नहीं पायेंगे। क्योंकि अतीत होने की प्रक्रिया प्रतिक्षण चल रही है। फिर तो अपना कुछ रहेगा ही नहीं। इस जन्म के अतीत को ही अपना नहीं मानना है, अपितु पूर्वजन्मों के संपूर्ण अतीत को अपना अतीत मानना है।
यह भाव प्रकृति के हर अंश से जोड देगा, क्योंकि इस पृथ्वी पर कोई ऐसा पदार्थ नहीं है, कोई ऐसा आकार नहीं है, कोई ऐसी स्थिति नहीं है, जो कभी न कभी अतीत न रहा हो। मेरी चेतना इस धरती के हर अंश से गुजर चुकी है। तो फिर पूरी पृथ्वी अपनी है। और अपनत्व को थोडा और विस्तार देकर एकाकार हो जाना है।
हर पदार्थ मेरा है और हर पदार्थ मैं हूँ।
पेड पौधे, जीव जन्तु सब में मैं हूँ।
यह अनुभव हमें वर्तमान में जीना सिखाता है। जब सब में मैं ही हूँ, तो उसके प्रति मेरा व्यवहार वैसा ही होना चाहिये, जैसा मैं अपने साथ करता हूँ।
फिर कोई पराया नहीं रहता, फिर कोई शत्रु नहीं रहता।

Aug 16, 2012

35. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


जीवन सीधी लकीर नहीं है। इसकी पटरी में न जाने कितने ही उल्टे सीधे, दांये बांये मोड बिछे है। मोड मिलने के बाद ही हमें उसका पता चलता है! पहले खबर हो जाय, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
बहुत बार तो ऐसा होता है कि मोड गुजर जाने के बाद ही हमें पता चलता है कि हम किसी मोड से गुजरे हैं। और बहुत बार ऐसा भी होता है कि मोड गुजर जाने के बाद भी हमें पता नहीं चलता कि हम किसी मोड से गुजरे हैं।
भले हमें विभिन्न मोडों से गुजरना पडे पर सर्चलाइट तो एक ही पर्याप्त होती है। ऐसा तो होता नहीं कि दांये जाने के लिये टोर्च  अलग चाहिये और बांये जाना हो तो टाँर्च अलग किस्म की चाहिये। क्योंकि अंतर मात्र दिशा का है। न मुझमें अंतर हुआ है, न राह पर रोशनी डालने वाले में!
इस कारण जीवन एक निर्णय से नहीं चलता। विभिन्न परिस्थितियों में परस्पर विरोधी निर्णय भी लेने होते हैं। कभी प्यार से पुचकारना होता है तो कभी लाल आँखें करते हुए डांटना भी होता है। कभी लेने में आनंद होता है तो कभी देने में भी आनंद का अनुभव होता है। दिखने में भले निर्णय अलग अलग प्रतीत होते हों, पर अन्तर में उनका यथार्थ, निहितार्थ, फलितार्थ एक ही होता है। पुचकारना भी उसी लिये था जिसके लिये डांटना था।
हमें परिस्थितियाँ देख कर निर्णय करना होता है तो परिस्थितियों के आधार पर निर्णय बदलना भी होता है। कभी कभी एक जैसी स्थितियों में भी भिन्न निर्णय करने होते हैं। क्योंकि मुख्यता स्थितियों या परिस्थितियों की नहीं है। मुख्यता है निर्णय की! निर्णय के आधार की! निर्णय के परिणाम की!
परिस्थिति केवल वर्तमान का बोध कराती है। जबकि निर्णय करते वक्त हमें केवल वर्तमान ही देखना नहीं होता। अपनी चकोर आँखों को अतीत में भी भेजना होता है तो आँखें बंद करके भविष्य के परिणाम की भी कल्पना करनी होती है।
निर्णय हमेशा वर्तमान में, वर्तमान के लिये होता है। पर जो तीनों कालों को टटोल कर, तीनों कालों में उसके परिणाम के सुखद किंवा दुखद स्पर्श का अनुभव कर निर्णय करता है, वह जीतता है। विजय की यही परिभाषा है।

Aug 10, 2012

34. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

34.  नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
जीवन को हमने दु:खमय बना दिया है। दु:खमय है नहीं, पर सुख की अजीब व्याख्याओं के कारण वैसा हो गया है। हम अपनी ही व्याख्याओं के जाल में फँस गये हैं। जिस जाल में फँसे हैं, उस जाल को हमने ही अपने विचारों और व्याख्याओं से बुना है। इस कारण किसी और को दोष दिया भी नहीं जा सकता। और इस कारण हम अपने ही अन्तर में कुलबुलाते हैं।
हमने अपने जीवन के बारे में एक मानचित्र अपने मानस में स्थिर कर लिया है। और उस मानचित्र में उन्हें बिठा दिया है हमने उन पदार्थों को, परिस्थितियों को, जिनका मेरे साथ कोई वास्ता नहीं है।
जिंदगी भर उस मानचित्र को देखते रहें, उस पर लकीरें खींचते रहें, बनाते रहें, बिगाडते रहें, बदलते रहें, परिवर्तन कुछ नहीं होना। परिवर्तन की आशा और आकांक्षा में जिंदगी पूरी हो जाती है, मानचित्र वैसा ही मुस्कुराता रहता है। फिर वही मानचित्र अगली पीढी के हाथ आ जाता है, वह भी उस धोखे में उलझ कर अपनी जिंदगी गँवा देता है।
हमने अपने मानचित्र में लकीर खींच दी है कि धन आयेगा तो सुख होगा! कुछ समय बाद लकीर बदलते हैं कि इतना धन आयेगा तो सुख होगा।
बदलते समय के साथ यह लकीर बदलती जाती है। इसकी सीमाऐं विस्तृत होती जाती है। आकांक्षा की उस लकीर तक कोई पहुँच ही नहीं पाता। और इस कारण उसे सुख मिल नहीं पाता। एक जिंदगी तो क्या सैंकडों हजारों जिन्दगियाँ क़ुर्बान कर दे, तो भी उस लकीर तक पहुँच नहीं पाता। क्योंकि लकीर स्थिर नहीं है।
अपने मानचित्र में दूसरी लकीर खींचता है- अभी शादी नहीं हुई, इसलिये सुख नहीं है। जब शादी होने के बाद भी सुख नहीं मिलता तो सुख का आधार पुत्र को बनाता है। आधार बदलते जाते हैं। क्योंकि आधार उन्हें बनाता है, जो नहीं है। और इस जगत में ‘है से ‘नहीं है सदैव ज्यादा होता है। वह अधिक है जो नहीं है। तो जो नहीं है, वह कभी भी पूर्ण रूप से है हो नहीं सकता। और इस प्रकार सुख मिल नहीं सकता। सुखी हो नहीं सकता। वह दु:ख में ही अपने जीवन को समाप्त कर डालता है।
सुखी होने का मंत्र एक ही है- सुख का आधार बाहर मत बनाओ। बाहर के द्रव्यों, परिस्थितियों को सुख का कारण मत मानो। अपने मानचित्र में बाहर की लकीरें मत खींचो। जीवन परम आनन्दमय हो जायेगा।

Aug 8, 2012

33. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


एक लघु कथा पढी थी।
एक आदमी सुबह ही सुबह एक लोटे में छास भर कर अपने घर की ओर आ रहा था। रास्ते में उसका दोस्त मिला। उसके पास एक बडे पात्र में दूध था।
उसने कहा- मेरे पास दूध ज्यादा है, थोडा तुम ले लो!
उसने कहा- मुझे भी दूध चाहिये। लाओ, मेरे इस लोटे में डाल दो।
वह दूध उसके लोटे में डाल ही रहा था कि उसकी निगाहें लोटे के भीतर पडी। देखा तो कहा- भैया! इसमें तो छास दिखाई दे रही है। पहले लोटे को खाली करके धो डालो, बाद में दूध डालूंगा।
उसने कहा- नहीं! मुझे छास बहुत प्रिय है। मैं इसका त्याग नहीं कर सकता। मुझे छास भी चाहिये और दूध भी चाहिये। तुम इसी में डाल दो। लोटा आधा खाली है। इतना दूध डाल दो।
उसने कहा- यह मूर्खता की बात है। यदि छास में दूध डाल दिया गया तो दूध भी बेकार हो जायेगा।
उसने कहा- जो होना हो, पर दूध तो इसी में डालना पडेगा। मैं खाली नहीं करूँगा।
वह अपना दूध लेकर रवाना हो गया।
यह कहानी व्यावहारिक जगत में घटी या नहीं, पता नहीं। परन्तु आध्यात्मिक जगत के लिये पूर्णत: सार्थक है।
पीना है दूध तो छास का त्याग करना ही पडेगा! हमें दूध पसंद है। उसे पाना भी चाहते हैं। पाने के बाद पीना भी चाहते हैं। परन्तु उसके अद्भुत स्वाद का हमें पूर्ण अनुभव नहीं है। सुना है बहुत उसके स्वाद के बारे में! पर निज-अनुभव के अभाव में निर्णय नहीं हो पा रहा है।
छास तो सदैव मिली है। इस कारण छास के स्वाद का पता है। अनादि काल से मिलने के कारण उससे दोस्ती भी हो गई है। छास की खटास में भी मिठास के अनुभव की आदत पड गई है। इस कारण वही अच्छी लगती है।
यह छास है- संसार! और दूध है- मुक्ति!
यह तय है कि दूध अच्छा लगना ही पर्याप्त नहीं है। दूध की मिठास प्रिय लगने के साथ साथ छास की खटास हमें अप्रिय लगनी चाहिये।
छोड़नी है संसार की छास! और पाना है मुक्ति का दूध!

Aug 5, 2012

32. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


हमें मन के अनुसार जीवन का निर्माण नहीं करना है। बल्कि जीवन के लक्ष्य के अनुसार अपने मन का निर्माण करना है।
यह तो तय है कि मन की दिशा के अनुसार ही हमारा आचरण होता है। मन मुख्य है। मन यदि सम्यक् है तो जीवन सम्यक् है! मन यदि विकृत है तो जीवन विकृत है।
मन के अधीन जो जीता है, वह हार जाता है। जो मन को अपने अधीन बनाता है, वह जीत जाता है। मन को अपना मालिक मत बनने दो! वह तो मालिक होने के लिये कमर कस कर तैयार है। वह छिद्र खोजता है। छोटा-सा भी छिद्र मिला नहीं कि उसने प्रवेश किया नहीं! प्रवेश होने के बाद वह राजा भोज बन जाता है।
फिर हमें नचाता है! उलटे सीधे सब काम करवाता है। क्योंकि उसे किसकी परवाह है। वह किसी के प्रति जवाबदेह भी नहीं है। उसे परिणाम भोगने की चिंता भी नहीं है।
वह तो थप्पड मार कर अलग हो जाता है। दूर खडा परिणाम को और परिणाम भोगते तन या चेतन को देखता रहता है। उसे किसी से लगाव भी तो नहीं है। तन का क्या होगा, उसे चिंता नहीं है। चेतना का क्या होगा, उसे कोई परवाह नहीं है। उसे तो केवल अपना मजा लेना है। और सच यह भी है कि हाथ उसके भी कुछ नहीं आता! न पाता है, न खोता है, न रोता है, न सोता है! जैसा था, वैसा ही रहता है।
सुप्रसिद्ध योगीराज श्री आनंदघनजी महाराज कुंथुनाथ परमात्मा की स्तुति करते हुए अपने हृदय को खोलते हैं! मन को समझाते हैं! मन की सही व्याख्या करते हैं! और मन से ऊपर उठकर चेतना के साथ जीने का पुरूषार्थ भी करते हैं, प्रेरणा भी देते हैं!
उन्होंने मन के लिये सांप का उदाहरण दिया है-
सांप खाय ने मुखडुं थोथुं, एह उखाणो न्याय!
सांप किसी को खाता है, तो उसके मुँह में क्या आता है? मुख तो खाली का खाली रहता है। इसी प्रकार का मन है। उसे मिलता कुछ नहीं है। पर दूसरों का बहुत कुछ छीन लेता है। वह रोता नहीं है, परन्तु रूलाने में माहिर है।
जीना है पर मन के अनुसार नहीं! मन को मनाना है, इन्द्रियों के अनुसार नहीं! अपने लक्ष्य के आधार पर! अपनी चेतना के आधार पर!

Aug 1, 2012

31. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

घर पुराना था। मालिक उसे सजाने के विचारों में खोया रहता था। पोल में एक पुरानी खटिया पडी थी। कुछ पैसे जुटे थे। वह एक अच्छा कारीगरी वाला लकडी का पलंग ले आया था। पुरानी खटिया को पिछवाडे में डालकर उसे कबाड का रूप दे दिया गया था।
कमरे की शोभा उस पलंग से बढ गई थी। उस पर नई चादर बिछाई गई थी। रोजाना दो बार उसकी साफ सफाई होने लगी थी। बच्चों को उस पलंग के पास आने की भी सख्त मनाई थी। वह मालिक और परिवार उस पलंग को देखता था और सीना तान लेता था। घर आते ही पहले पलंग को देखता था। घर से जाते समय वह पीछे मुड मुड कर पलंग को देखा करता था।
बच्चे उनके जाने की प्रतीक्षा करते थे। उनके जाने के बाद वह पलंग बच्चों की कूदाकूद का साक्षी बन जाता था। एकाध बार उन्हें पता चला तो बच्चों को मेथीपाक अर्पण किया गया था।
पलंग को सजाने के लिये नये तकिये खरीदे गये थे। आस पास के लोग, पडौसी भी इस कलात्मक नये सजे संवरे पलंग को देखे, इस लिये उन्हें एक बाद चाय पर बुलाया गया था।
पलंग के संदर्भ में उनके द्वारा की गई प्रशंसा को सुनकर चाय पानी में हुआ खर्च न केवल दिमाग से निकल गया था बल्कि वह खर्च उसे सार्थक लगा था।
अपने संबंधियों को भी आमंत्रण दिया गया था। उन्हें बडी नजाकत से उस पलंग पर बिठाया गया था। उन्हें कम देर तक बिठाया गया था, ज्यादा देर तक दिखाया गया था। उनकी प्रशंसा भरी आँखों को देख कर उसके मन में गुदगुदी होने लगी थी।
कुछ वर्षों बाद...!
पलंग थोडा पुराना पडने लगा था। रंग बदरंग होने लगा था। उसके पाये थोडा चूं चूं की आवाज करने लगे थे। किसी बुढिया की गर्दन की भाँति वह थोडा डोलने लगा था। अब उसके प्रति जागृति नहीं थी।
बच्चों को उसके पास जाने की अब कोई मनाई नहीं थी। पर बच्चे खुद ही अब उसके पास नहीं जाते थे।
समय थोडा बदला था। एक दिन पलंग को वहाँ से उठा दिया गया और उसे चौक में धर दिया गया। अब उस पर कोई बैठता नहीं था। वह अतिथि की प्रतीक्षा करता रहता मगर कोई उसे पूछता नहीं था। कभी कभार कोई उस पर बैठता तो वह जोर जोर से चूं चूं की आवाज कर अपने हर्ष को अभिव्यक्त करता। उसके हर्ष को हर आदमी समझ नहीं पाता। कोई चीखता, कोई चिल्लाता, कोई नाराज होता, कोई डरता!
कमरे का स्वरूप बदल गया था। उस पलंग का स्थान एक नये विशाल पलंग ने ले लिया था। वह पलंग दूर से अपने स्थान पर आये पलंग को देखता और मन ही मन रोता! कभी यही सजावट मेरी थी। कभी यही दशा मेरी थी। जो ध्यान आज उसका रखा जाता है, कभी उस ध्यान का मालिक मैं था।
पर वह कर कुछ नहीं सकता था। वह केवल चूं चूं ही कर सकता था। हाँलाकि नये पलंग को उसकी चूं चूं अच्छी नहीं लगती थी। वह अपने पर इतराता! अहा! एक वो है, एक मैं हूँ! वो बिचारा चूं चूं करता रहता है।
पर उसकी चूं चूं में एक शाश्वत सत्य छिपा था। वह जानता था कि हर पलंग की यही दशा होनी है। इसलिये वह जोर जोर से चूं चूं करके सावधान करता था। वह कहता था कि अकडो मत!
यह अलग बात है कि समझने वाला ही चूं चूं के रहस्य को समझ सकता है। जो समझ जाता है, वह जाग जाता है।
यह जिन्दगी की कथा है! जागरण की कथा है! समझ की कथा है।


Jul 29, 2012

30. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

30.  नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

करने और चाहने की क्रिया में बीतता है पूरा जीवन! कुछ हम करते हैं जगत में! कुछ हम चाहते हैं जगत से! हमारा अपना व्यवहार जगत के प्रति कैसा भी हो, पर हम जगत से सदा अच्छे व्यवहार की कामना में जीते हैं।
दूसरों को अच्छा कहने में कंजूसी करने वाला व्यक्ति दूसरों से अपने लिये सदैव अच्छा कहलवाना चाहता है।
यह हमारे सोच की तराजू है। इस तराजू में समतुला का अपना कोई अर्थ नहीं है। समतुला की डंडी स्वतंत्र भी नहीं है। न केवल इसके दोनों पलडे हमारे हाथ में होते हैं बल्कि समतुला की डंडी भी हमारे इशारों पर नाचती है।
पलडों की सामग्री बराबर होने पर भी हम उसे बराबर रहने नहीं देते। हमारे स्वार्थ की अंगुली पलडों को दांये बांयें घुमाती रहती है। जिधर हमें अपना पक्ष नजर आता है, उधर घुमा देते हैं।
हम देखते भी वैसे ही है! हम सोचते भी वैसे ही है! हम बोलते भी वैसे ही है! सच तो यह है कि सत्य से हमें लेना देना नहीं है। हमें अपनी सोच से लेना देना है। हमें अपने स्वार्थ से लेना देना है।
या यों कहें कि सत्य भी यदि हमारे स्वार्थ की फ्रेम में फिट होता है तो ठीक है। अन्यथा हमें उससे कोई मतलब नहीं है।
इसलिये हम सत्य के प्रमाण नहीं खोजते बल्कि अपने स्वार्थ को प्रमाण के आधार पर सत्य साबित करने की मेहनत करते हैं।
फ्रेम हमारी है। फोटो के अनुसार फ्रेम नहीं बनती बल्कि फ्रेम के अनुसार फोटो में काँटछाँट होती है। इससे फोटो का अपनी असली आकार स्थिर नहीं रह पाता है। वह खो जाता है।
हमारी आलोचना जब दूसरा करता है, तो उस व्यक्ति के विषय में हमारे भाव अलग होते हैं! और जब हम स्वयं किसी की आलोचना करने लगते हैं, उन क्षणों के अपने विषय में हमारे भाव अलग होते हैं!
यदि कृत्य की दृष्टि से देखें तो जो भाव अन्य आलोचक के प्रति हैं, वही अपने बारे में भी होने चाहिये! पर हमारी नजर कृत्य पर नहीं होती....! क्योंकि कृत्य को देखने के लिये शुद्ध दृष्टि चाहिये! जबकि हमारी दृष्टि तो छनकर बाहर आती है! वह स्वार्थ की छलनी में छनती है! इस दृष्टि में रोशनी नहीं होती! रोशनी के लिये समतुला की नजर चाहिये! मैं किसी ओर को देखूं या अपने को, नजर एक ही चाहिये! यही नजर सम्यक्दर्शन है।

29. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

29.  नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

हमारा जीवन गलतियों का पिटारा है। सबसे बडी गलती है गलतफहमी में डूबना और उस आधार पर अपनी सोच का निर्माण करना।
गलतियों से हम जितने परेशान नहीं है, गलतफहमियाँ उससे कई गुणा हमारे जीवन को, हमारी सोच को नरक बना देती है।
प्रश्न है कि गलतफहमी क्यों होती है?
इस प्रश्न का समाधान हमारी सोच में छिपा है।
गलतफहमी होने के कई कारण है। मुख्य कारण है- हमारा पूर्वाग्रह!
हम पूर्वाग्रहों में जीते हैं और पूर्वाग्रहों से जीते हैं। ‘में और ‘से के बीच अन्तर है तो थोडा, मगर गहरा है। ‘में वर्तमान की सूचना देता है और ‘से अतीत की! और इस ‘में और ‘से से ही भविष्य का रास्ता निकलता है। क्योंकि एक बार पूर्वाग्रह बना नहीं कि फिर हारमाला शुरू हो जाती है। फिर रूकता नहीं है। एक गलतफहमी दूसरी को जन्म देती है, दूसरी तीसरी को, और इस प्रकार एक अन्तहीन सिलसिला शुरू हो जाता है।
पूर्वाग्रहग्रस्त होना हमारी कमजोर और अज्ञानभरी मानसिकता का परिणाम है। यह अनुमान है जो सच भी हो सकता है, जो गलत भी हो सकता है। पर हम उसे सच मान कर ही जीते हैं। फिर यह अनुमान हमारी सोच को प्रभावित करता है।
उससे गलतफहमी निर्मित होती है। मुश्किल यह है कि गलतफहमी गलतफहमी लगती नहीं है। वह सच ही लगती है। फिर उसका व्यवहार, उसका प्रत्युत्तर सब कुछ वैसा ही हो जाता है।
बहुत बार तो ऐसा भी होता है कि आँखों देखी बात झूठ हो जाती है। कभी कभी प्रमाण जो सूचना देते हैं, सत्य वैसा नहीं होता।
एक बात तय कर लेनी चाहिये कि संबंधित व्यक्ति से सत्य की जानकारी परिपूर्ण करने के बाद ही हम कोई अनुमान भरोसेमंद मानेंगे। क्योंकि जब हमें पता लगता है कि मेरा अनुमान ठीक नहीं था, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। तब तक हम अपना बहुत नुकसान कर चुके होते हैं। नुकसान सामने वाले का भी बहुत कर चुके होते हैं, जिसकी भरपाई संभव नहीं होती।
इसलिये अपनी नजरों को दो ओर घुमाने की बजाय चारों ओर घुमाना सीखो। सब कुछ देखना और सब कुछ समझना सीखो। कुछ अतीत का इतिहास भी देखो, उसे थोडा उलट पुलट कर भी देखो, ताकि गलतफहमी की गलती न हो।

28. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

28.  नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
जो करता है, वह जरूरी नहीं है कि सही ही हो! वह गलती भी कर सकता है! गलती का अनुमान ‘करने से पहले भी हो सकता है... और बाद में भी हो सकता है।
स्वभावत: बाद में ही अधिक होता है, क्योंकि पहले पता चल जाय तो फिर गलती कर नहीं पाता।
बाद में पता चलना भी बहुत हितकर होता है। वह बोध आगे के लिये आँख खोल देता है।
हमें अपनी गलती का पता अपने से भी चल सकता है, और दूसरों से भी! अपनी गलती का अहसास अपने से होता है, वहाँ इतनी समस्या नहीं होती! पर जब हमें अपनी गलती का अहसास औरों से होता है, उन क्षणों को सहन कर पाना बहुत मुश्किल होता है।
दूसरों की ओर अंगुलियाँ उठाना बहुत आसान होता है, पर अपनी ओर उठी अंगुलियों को झेल पाना निश्चित ही मुश्किल कार्य है।
जुडे हुए हाथों की अपेक्षा उठी हुई अंगुलियाँ ज्यादा उपकारी होती है। क्योंकि जुडे हुए हाथ हमें असावधान बना सकते हैं, जबकि उठी हुई अंगुलियाँ हमें जागरूक करती है।
ऐसा बार बार कहना कि मेरी गलती हो तो बताना, बहुत आसान है। पर जब कोई बताता है, तब चित्त को कषाय भावों से न भरते हुए उपकारक भावों से भरना बहुत मुश्किल होता है।
गलती को गलती के रूप में जानना हमारे लिये बहुत आसान है, पर उसे गलती के रूप में मानना और स्पष्टत:,  प्रकटत: स्वीकारना सहज नहीं होता।
जो ऐसा कर लेता है, वह अपने जीवन को सम्यक्त्व की रोशनी से भर लेता है।

Jul 27, 2012

27. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

27.  नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
हिसाब किताब के दिन आ रहे हैं। यह समय लेखा जोखा करने का है। कितना कमाया.... कितना गँवाया....! कमाया तो क्या कमाया! और गँवाया तो क्या गँवाया!
कमाने और गँवाने में मूल्यवान यदि वह है जो कमाया है, तो निश्चित ही हमने कुछ पाया है।
और जो कमाया है, उसकी अपेक्षा जो गँवाया है, वह ज्यादा मूल्यवान है, तो निश्चित ही हम हार गये हैं।
गत वर्ष की दीपावली के बाद आज इस दीपावली तक हमने एक साल जीया है। मैं एक साल बूढा हो गया हूँ। मेरी उम्र में एक साल का इज़ाफा हुआ है। आज मुझे इस साल भर की अपनी मेहनत का परिणाम सोचना है।
साल भर में मैंने क्या किया? आज का दिन आगे की ओर मुँह करके आगे बढने का नहीं है।
आज का दिन तो पीछे मुड कर अतीत में छलांग लगाने का है।
अच्छी तरह अपने अतीत को टटोलना है। लेकिन अतीत को केवल देखना है। उसे पकड कर बैठ नहीं जाना है।
उसे देखते रहने से क्या होगा? कितना ही अच्छा अतीत हो, उसमें जीया तो नहीं जा सकता। क्योंकि जीना तो वर्तमान में ही होता है।
अच्छे अतीत को निहार कर वर्तमान में रोना नहीं है। आ सकता है रोना क्योंकि वर्तमान उतना अच्छा नहीं ह
तो बुरे अतीत को देख कर वर्तमान में अहंकार भी नहीं करना है। आ सकता है अभिमान अपने उपर कि मैंने कितना अच्छा पुरूषार्थ किया कि अतीत इतना खराब होने पर भी मैंने अपना वर्तमान कितना अच्छा बना दिया!
सीख लेनी है अतीत से, लक्ष्य बनाना है भविष्य का और जीना है वर्तमान में!
दीपपंक्तियों के प्रकाश में यह तय करना है कि मेरा साल कैसे बीता!
यह तो तय है कि यह सोच मेरे अतीत को बदल नहीं सकती। जो बीत गया, वह बीत गया। उस हुए को अनहुआ नहीं किया जा सकता।
पर उस अतीत की क्रिया और उसके वर्तमान परिणाम को देखकर मैं अपने भविष्य को तो बदल ही सकता हूँ।
अपने भविष्य की रूपरेखा बनाकर अपना वर्तमान जीवन जीना, यही तो दीपावली की सीख है।
आज अपना हिसाब करना है। मेरा स्वभाव कैसा रहा! और जानना है कि मैं नफे में रहा या घाटे में रहा।
खोया एक साल और पाया क्या? अपने से ही यह प्रश्न करना है! अपने से ही इसका उत्तर पाना है। और उस आधार पर आने वाले साल के लिये संकल्पबद्ध हो जाना है।

26. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

26. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
हमारे पास केवल ‘आज है। ‘आज ‘कल नहीं है। और ‘आज को ‘कल होने में समय लगेगा। आज का उपयोग होने के बाद ‘आज ‘कल में बदल भी जायेगा तो कोई चिंता की बात नहीं होगी।
पर उपयोग किये बिना ही ‘आज यों ही यदि ‘कल में बदल गया तो निश्चित ही हम अपने आपको क्षमा नहीं कर सकेंगे।
यह तय है कि ‘आज को कल में बदलने से रोका नहीं जा सकता। कोई नहीं रोक सकता। तीर्थंकर भी आज को ‘कल में बदलने से रोक नहीं पाये थे। उन्होंने भी उसका उपयोग किया और सिद्ध हो गये।
जो उपयोग करता है, बल्कि कहना चाहिये कि जो सम्यक् उपयोग करता है, वह सिद्ध हो जाता है। आज ही यथार्थ है। क्योंकि आज ही हमारे सामने है।
कल का विचार किया जा सकता है... सोचा जा सकता है... उसमें डुबकी लगायी जा सकती है... पर उसमें जीया नहीं जा सकता। चाहे वह कल बीता हुआ कल हो, या आने वाला, हमारे जीने के लिये उसका महत्व उसके ‘आज रहने पर या ‘आज बनने पर ही था या होगा।
हिन्दी भाषा का कल शब्द महत्वपूर्ण है। चाहे बीते दिन के लिये प्रयोग करना हो या आने वाले दिन के लिये.... दोनों के लिये ‘कल शब्द का ही प्रयोग किया जाता है। दोनों कल में कोई विशेष अंतर नहीं है, जीवन की अपेक्षा से!
हालांकि समझ की अपेक्षा से अंतर है। क्योंकि बीता कल हमारी परीक्षा का प्रश्न पत्र था, जिसकी उत्तरपुस्तिका हमने कल जमा करवाई थी। ‘आज उसका परिणाम है। हम प्रश्नपत्र की उस उत्तर पुस्तिका में ‘आज के रूप में अपना परिणाम खोज सकते हैं। बीते कल को देखकर हम आने वाले कल का निर्णय कर सकते हैं। दोनों कल का महत्व इतना ही है।
पर निर्णय तो आज ही करना होगा! सोचना भी आज ही होगा! लाभ हानि के आंकडे भी आज ही लिखने होंगे!
समय का अर्थ ही आज है। जो बीत गया, वह अब समय नहीं रहा। समय की परिभाषा केवल वर्तमान के इर्दगिर्द घूमती है। जो बीत गया या जो आने वाला है, वह इतिहास या भविष्य हो गया।
समय वर्तमान की सूचना देता है। क्योंकि उसी पर हमारा अधिकार है। उसे पाने या छोडने का अधिकार हमें नहीं है। हमें केवल उसके उपभोग, उपयोग का अधिकार है।
परमात्मा महावीर का सुप्रसिद्ध सूत्र- ‘समयं गोयम मा पमायए हमें प्रतिपल जागरूक रहने की सूचना देता है।

Jul 25, 2012

25. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

25. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
सम्राट् ने साधु को संसारी बनाना चाहा है। उसने साधु बनने का कारण भी जानना चाहा है। ‘मैं अनाथ था, इसलिये साधु बन गया इस कारण को जानकर वह प्रसन्न हुआ है, क्योंकि उसने भी इसी कारण का अनुमान किया था।
अपने अनुमान को सही जानकर आनंदित हुआ है। वह दर्प से दपदपा उठा है। उसने अहंकार भरी हुंकार के साथ कहा है- आओ! मेरे साथ आओ, साधु! मैं तुम्हारा नाथ बनूँगा!
साधु मुस्कुराया है। उसने आँखों में आँखें डालकर कहा है- जो खुद का नाथ नहीं है, वह किसी और का नाथ कैसे बन सकता है। तूं तो स्वयं अनाथ है, फिर मेरा नाथ कैसे बनेगा!
और सम्राट् की आँखें लाल हो गई है। पर उसकी लाल आँखों पर साधु की निर्मल, पवित्र और स्थिर आँखें हावी हो गई है। उन आँखों में उसे रहस्य भरी गहराई नजर आई है।
तेरा है क्या राजन्! और तो और, यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है। फिर क्यों तुम नाथ होने का ढोंग कर रहे हो!
मेरे द्वारा दिये गये उत्तर में ‘अनाथ शब्द का सही अर्थ तुम नहीं लगा पाये हो, राजन्! तुम अनाथ की जो परिभाषा करते हो, वह अलग है। उस अपेक्षा से मैं अनाथ नहीं था। धन, सत्ता, परिवार सब कुछ मेरे पास था, फिर भी अनाथ था। क्योंकि मैं असह्य पीडा से भर गया था। मेरा परिवार मेरे दर्द के कारण आँसू बहाते थे, दवाई लाते थे, चंदन का लेप करते थे, पर मेरी पीडा को बाँट नहीं सकते थे।
और मेरी आँखों में प्रश्नचिह्न तैरने लगा था। सब कुछ होने पर भी मैं अकेला हूँ। और तभी एक संत ने मेरे कक्ष में प्रवेश किया था। उन्होंने कहा था- वत्स! दुख तो खुद को ही भोगना होता है। इसलिये दूसरों की शरण में सुख मत खोजो! सुख पाना है तो अपनी शरण में जाओ। अपने मालिक बनो। जो दूसरों का मालिक बनने की कोशिष करता है, वह तो अनाथ होता है। तुम्हें नाथ बनना है तो अपने नाथ बनो। और मैं अपनी शरण में आ गया।
परमात्मा की स्तुति में गाया जाने वाला यह श्लोक कितनी गहराई समेटे है-
अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम।
और कोई शरण नहीं है। जब भी जिस किसी का शरण लिया है, उसने मेरा साथ छोड दिया है। अब तो केवल हे परमात्मन्! तेरा ही शरण है। परमात्मा का शरण लेना, अपनी आत्मा का शरण लेना है। आत्मा को सर्वस्व मान कर उसे संपूर्ण भाव से स्वीकार करते हुए उसके अनुभव-रस में डूब जाना है।

24. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

24.  नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
दृश्य तो जैसा है, वैसा ही रहता है। दृश्य नहीं बदला करता। दृष्टि को बदलना होता है! हमें बदलना होता है।
और हमारी मुसीबत यह है कि हम सदैव दृश्य बदलने की ही कामना करते हैं, हमारा पुरूषार्थ भी दृश्य बदलने के लिये होता है।
यदि मैं न बदला तो दृश्य बदल भी जायेगा तो क्या हो जायेगा?
क्योंकि दृश्य वैसा दिखाई नहीं देता, जैसा वह होता है। बल्कि दृश्य वैसा दिखाई देता है, जैसे हम होते हैं। हम अपनी आँखों पर चढे चश्मे के रंग को दृश्य पर स्थापित करते हैं। संसार हमारी ही दृष्टि का हस्ताक्षर है।
सूखी घास को खाने से इंकार करने वाले घोडे की आँखों पर जब गहरे हरे रंग का चश्मा बिठा दिया जाता है तो, वह उसी सूखी घास को हरी मान कर बडे चाव और स्वाद से खा जाता है। यह दृष्टिकोण का अन्तर है।
उसी संसार में ज्ञानी भी रहता है और उसी संसार में अज्ञानी भी रहता है। दृश्य वही है, लोग वही है, सृष्टि वही है, पेड पौधे वही है, घटनाऐं वही है, शब्द वही है, प्रेम मोह का जाल वही है! सब कुछ एक सा है। अन्तर दृष्टिकोण का है।
ज्ञानी उसी दृश्य से अनासक्ति का विकास करता है और अज्ञानी उसी दृश्य से आसक्ति का विस्तार करता है।
अध्यात्मोपनिषद् प्रकरणम् का यह श्लोक यही घोषणा करता है-
संसारे निवसन् स्वार्थसज्ज: कज्जलवेश्मनि।
लिप्यते निखिलो लोको, ज्ञानसिद्धो न लिप्यते।।35।।
काजल का घर है। जो भी छुएगा, काला हो जायेगा। पर हर व्यक्ति नहीं है। जो अज्ञानी है, वही उससे लिप्त होगा। जो ज्ञानी है, ज्ञानसिद्ध है, वह लिप्त नहीं होता।
यह संसार काजल का ही घर है, पर उसके लिये जो लिप्त है, जो आसक्त है, जिसकी आँखों पर पट्टी चढी है।
उसके लिये मुक्ति का मंगल द्वार है, जो निर्लिप्त है, जो अनासक्त है, जिसने दृश्य की यथार्थता को समझकर अपनी दृष्टि यथार्थ बनाली है।
अपने दृष्टिकोण को बदलना ही अंधेरे से उजाले की ओर गति करना है।

23. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

23. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
कष्ट और दु:ख की परिभाषा समझने जैसी है। उपर उपर से दोनों का अर्थ एक-सा लगता है, पर गहराई से सोचने, समझने पर इसका रहस्य कुछ और ही पता लगता है।
कष्टों में जीना अलग बात है और दु:ख में जीना अलग बात है। कष्ट जब हमारे मन को दु:खी करते हैं तो जीवन अशान्त हो जाता है। और कष्टों में भी जो व्यक्ति मुस्कुराता है, वे जीवन जीत जाते हैं।
कष्ट तो परमात्मा महावीर ने बहुत भोगे, परन्तु वे दु:खी नहीं थे। उन कष्टों में भी सुख का अनुभव था।
कष्टों को जब हमारा मन स्वीकार कर लेता है, तो यह तो संभव है कि कष्ट मिले, पर वह दु:खी नहीं होता।
कष्टों को जब हमारा मन स्वीकार नहीं करता, तो यह व्यक्ति दु:खी हो जाता है। यों समझे कि स्वीकार्य तकलीफ कष्ट है और अस्वीकार्य तकलीफ दु:ख है।
कष्टों पर हमारा कोई वश नहीं है। पर दु:ख पर हमारा वश है। आने वाले कष्ट तो हमारे पूर्व जीवन का परिणाम है जो भाग्य बनकर हमारे द्वार तक पहुँचा है। पर कष्ट भरे उन क्षणों में दु:ख करना, आने वाले समय में और कष्ट पाने का इन्तजाम करना है।
इस दुनिया में हम कष्टों से भाग नहीं सकते। और बचाव के उपाय सदैव सार्थक परिणाम नहीं लाते। कभी कभी हमारे उपाय व्यर्थ भी चले जाते हैं। क्योंकि यह एक अन्तहीन श्रृंखला है। एक कडी तोडते हैं तो दूसरी कडी उपस्थित हो जाती है। पेट दर्द शान्त होता है तो सिर में दर्द पैदा हो जाता है। दु:खती आँख की दवा की जाती है तो अपेन्डिक्स का दर्द उपस्थित हो जाता है। शरीर ठीक रहता है तो मित्र धोखा दे जाता है। मित्र वफादार होता है तो कोई व्यापारी अपनी नीति बदल देता है। व्यापार ठीक रहता है तो परिवार परेशानी खडी कर देता है। पुत्र कहना नहीं मानता। ये सब ठीक रहता है तो कभी झूठे कलंक का सामना करना पड जाता है। निहित स्वार्थों के कारण बदनामी का शिकार हो जाता है। आदि आदि... एक अन्तहीन श्रृंखला!
कोई भी कितना भी बडा क्यों न हो, उसे संसार में कष्टों का भोग तो बनना ही पडता है। ऐसी दशा में परमात्मा महावीर की वाणी ही उसे दु:ख से बचाती है। कष्टों से बचाने का तो कोई उपाय नहीं है। क्योंकि वह मेरे कृत्यों का ही परिणाम है। पर उन क्षणों में मेरे चित्त में समाधि का भाव, सुख का भाव कैसे टिके, इस सूत्र को समझ लेना है।
और वह सूत्र है- उन कष्टों को मन से स्वीकार कर लेना! जो मिला है, जैसा मिला है, मुझे स्वीकार्य है। क्योंकि मेरे अस्वीकार करने से स्थिति बदल तो नहीं जायेगी। अस्वीकार करने से मात्र दु:ख मिलेगा, पीडा मिलेगी और मिलेगी चित्त की विभ्रम स्थिति!
इससे बचने का उपाय है- प्रसन्नता से स्वीकार करना! यह प्रसन्नता ही हमारे भविष्य की प्रसन्नता का आधार बन जायेगी।

22. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

22. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
संवत्सरी महापर्व निकट है। हमेशा की भांति इस वर्ष भी यह हमारी कुण्डी खटखटाने चला आया है। यह ऐसा अतिथि है, जो आमंत्रण की परवाह नहीं करता। जो बुलाने पर भी आता है, नहीं बुलाने पर भी आता है।
यह ऐसा अतिथि है जो ठीक समय पर आता है। पल भर की भी देरी नहीं होती। जिसके आगमन के बारे में कभी कोई संशय नहीं होता। सूरज के उदय और अस्त की भांति नियमित है।
यह आता है, जगाता है और चला जाता है। जो देकर तो बहुत कुछ जाता है, पर लेकर कुछ नहीं जाता।
यह हम पर निर्भर है कि हम जाग पाते हैं या नहीं! इसे सुन पाते हैं या नहीं! यह अपना कर्त्तव्य निभा जाता है। और हम नहीं जागते तो यह नाराज भी नहीं होता। कितनी आत्मीयता और अपनत्व से भरा है यह पर्व! न नाराजगी है, न उदासी है, न क्रोध है, न चापलूसी है, न शल्य है, न मोह!
वही जानी पहचानी मुस्कुराहट लिये... आँखों में रोशनी लिये... जीने का एक मजबूत जज़्बा लिये..... हमें रोशनी से भरने, जीने का एक मकसद देने, एक मीठी मुस्कुराहट देने चला आता है।
मुश्किल हमारी है कि हम इसे देखते हैं, जानते हैं, पहचानते हैं, सोचते हैं, विचारते हैं, बधाते हैं, गीत गाते हैं, बोलते हैं, महिमा गाते हैं, रंग उडाते हैं, खुशियाँ मनाते हैं... सब करते हैं पर अपनाते नहीं है।
इसे केवल बधाने से काम नहीं चलता है! इसे तो स्वीकारना होता है। अपनाना होता है। वही इसे जी पाता है। उसे ही यह जीना सिखा पाता है।
और मजे की बात यह है कि आता तो यह सर्वत्र है, पर जो इसे स्वीकार कर लेता है, उसे मालामाल कर जाता है। जो स्वीकार नहीं कर पाता, वह गंगा किनारे पहुँच कर भी प्यासा का प्यासा रह जाता है।
पर्युषण पर्व की इस दस्तक में जीवन जीने का राज छिपा है। कषाय का कचरा बहुत जमा किया है, अब इस बाढ में बहादो। कचरे को लाद कर कब तक फिरते रहोगे। यह बोझ तुम्हें जीने नहीं देगा।
इसे उतार कर थोडा हल्का हो जाओ। संबंधों की दुनिया में फिर थोडी मीठास पैदा करो।
फिर ताजगी का अहसास करो। कोशिष करो कि फिर वह या वैसा कचरा दुबारा जमा न हो जाय।
यह चिंता मत करना कि शुरूआत सामने से होगी या मुझसे! तुम तो कर ही लेना। सामने वाला स्वीकार करे, न करे, इसकी भी परवाह मत करना।
तुम तो अपनी ओर से खुशबू बांटकर निश्चिंत हो जाओ। तुम्हारा एक कदम उसे कदम उठाने के लिये स्वत: मजबूर कर देगा। वह खींचा चला आयेगा।
फिर देखना.. कैसी गुलाल उडती है... बहारों में क्या ताजगी आती है... और देखना कि जिन्दगी कितनी ताजगी से भर उठती है।

21. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

21   नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
जीवन पुण्य और पाप का परिणाम है। पूर्व पर्याय {पूर्व जन्म} का पुरूषार्थ हमारे वर्तमान का अच्छापन या बुरापन तय करता है।
जीवन बिल्कुल हमारी इच्छाओं से चलता है। इच्छा के विपरीत कुछ भी नहीं होता। हमारे साथ जो भी होता है, हमारी इच्छा से ही होता है।
मन में पैदा हुए विचारों को ही जिन्हें हम रूचि से सहेजते हैं, इच्छा माना है। परन्तु यहाँ इच्छा का अर्थ  मन में पैदा हुए विचार ही नहीं है। यहाँ इच्छा का अर्थ थोडा व्यापक है। इसमें मन तो मुख्य है ही, क्योंकि बिना मन के तो कोई प्रवृत्ति होती नहीं।
इच्छा का अर्थ है- मानसिक, वाचिक और कायिक प्रवृत्ति!
जो भी हमारे साथ हुआ है, होता है, होगा, वह सब इसी का परिणाम है।
होता सब कुछ हमारी इच्छा से है। पर वर्तमान की इच्छा से नहीं, पूर्वकृत इच्छा से!
पूर्व में हमने जैसा सोचा, जैसा बोला, जैसा किया, वही वर्तमान में हमें उपलब्ध होता है।
यह तय है कि उपलब्धि पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। क्योंकि इसकी चाभी हमारे हाथ से पूर्व जीवन में ही निकल चुकी होती है।
पुण्य और पाप का उदय महत्वपूर्ण नहीं है! पुण्य और पाप के उदय के क्षण महत्वपूर्ण नहीं है। उन क्षणों की हमारी विचारधारा महत्वपूर्ण है। क्योंकि वह मानसिकता हमारे भविष्य का निर्माण करती है।
आत्म यात्रा की पोथी में  अतीत के पृष्ठ नहीं, भविष्य के पन्ने महत्वपूर्ण होते हैं। वर्तमान को भी वर्तमान के रूप में ही देखा है, तो महत्वपूर्ण नहीं है। वर्तमान को भी भविष्य के दर्पण में देखने का प्रयास किया है, तो महत्वपूर्ण है।
क्योंकि वर्तमान को तो बहुत जल्दी अतीत का हिस्सा हो जाना है।
अतीत में क्या किया, यह महत्वपूर्ण नहीं है।
वर्तमान में हम क्या कर रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है।
वर्तमान में हमें क्या मिला, यह महत्वपूर्ण नहीं है।
भविष्य में हमें क्या पाना है, यह महत्वपूर्ण है।
यह चिंतन ही वह चाबी है, जो हमें वर्तमान में जागृत रखती है। यह सोचकर ही हमें अपनी इच्छा को गति देना है, नियंत्रित करना है, दिशा देनी है।