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Jain Religion is very oldest Religion

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Jain Religion is very oldest Religion

39. नवप्रभात -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

आवेश में आना बहुत आसान है। आवेश में निर्णय करना भी बहुत आसान है। और आवेश में किये गये निर्णय को क्रियान्वित करने के लिये और ज्यादा आवेश में आना भी बहुत आसान है। किन्तु यह स्थिति आदमी को बहुत नुकसान पहुँचाती है। क्योंकि आवेश का अर्थ होता है- किसी एक तरफ दिमाग का जड हो जाना! वह वही देखता है.. उसे उन क्षणों में और कुछ नजर नहीं आता। उसका दिमाग... उसके विचार.. बस! एक ही दिशा में दौडते हैं। दांये बांये, आगे पीछे की दृष्टि को जैसे ताला लग गया हो! वह एकांगी हो जाता है। और इस कारण उसका निर्णय सर्वांगीण नहीं हो पाता। उसका निर्णय मात्र उस समय की घटना या परिस्थिति पर ही आधारित होता है। वह उसके परिणाम के बारे में विचार नहीं करता। उसका निर्णय परिणामलक्षी नहीं होता। मुश्किल यह है कि निर्णय तो तत्काल के आधार पर लेता है, पर उसका निर्णय उसके पूरे जीवन को प्रभावित करता है। एक बार निर्णय होने के बाद उससे पीछा छुडाना आसान नहीं होता। इसलिये शान्ति और आनंद का पहला सूत्र है- आवेश में मत आओ! लेकिन बहुत मुश्किल है इस सूत्र के आधार पर चलना। क्योंकि जीवन विभिन्न राहों से गुजरता है। बहुत मोड हैं इसमें! तब अपने आपको स…

38. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

काला, घना काजल से भी गहरा अंधेरा है! दांये हाथ को बांये हाथ का पता नहीं चल पा रहा है, इतना अंधेरा है। और मुश्किल यह है कि यह द्रव्य अंधेरा नहीं है। द्रव्य के अंधेरे को मिटाने के लिये एक दीया काफी है। एक दीपक की रोशनी हमारे कक्ष में उजाला भर सकती है। यह अंतर का अंधेरा है। आँखों में रोशनी होने पर भी अंधेरा है। सूरज के प्रकाश में भी अंधेरा है। किधर चलें, कहाँ चलें, किधर जायें, क्या करें..... आदि आदि प्रश्न तो बहुतेरे हैं, पर समाधान नहीं है। अंतर के अंधेरे से जूझना भी कोई आसान काम नहीं है। जितना जितना उस बारे में सोचता हूँ, उतना ही ज्यादा मैं उसमें उलझता जाता हूँ। बैठा रहता हूँ माथे पर चिंता की लकीरें लिये! पडा रहता हूँ शून्य चेहरे के साथ! उदास होकर बैठ जाता हूँ हाथ पर हाथ धर कर! रोता रहता हूँ अपने को, अपनी तकदीर को! लेकिन मेरे भैया! यों हाथ पर हाथ धरके बैठने से क्या होगा? रोने से रोशनी तो नहीं मिलेगी न! इसलिये उठो! जागो! पुरूषार्थ करो! रोओ मत! थोडा हँसो! अपने भाग्य पर हँसो! और अपनी हँसी से यह दिखाओ कि मैं तुमसे हार मानने वाला नहीं है। अपनी हँसी से पुरूषार्थ का भी स्वागत करो। अपने बिगडे भाग्य प…

37. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

अपने घर की खोज हम लम्बे समय से कर रहे हैं। पर मिला नहीं है। इसलिये नहीं कि दूरी बहुत है। दूरी तो जरा भी नहीं है। दूरी तो मात्र इतनी है कि देखा कि पाया! एक कदम आगे बढाया कि मंज़िल मिली! हाथ लंबा किया कि द्वार पाया! दूरी अधिक नहीं है, फिर भी अभी तक अपना घर मिला नहीं है। इसलिये भी नहीं कि हम चले नहीं है। हम बहुत चले हैं। और इतना चले हैं कि थक कर चूर हो गये हैं। गोल गोल चक्कर न मालूम कितने काटे हैं। यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ भागने, दौडने में जिन्दगियाँ पूरी हो गई है। जिसे खोजने चले हैं, उसे पाने के लिये तो एक जिंदगी ही पर्याप्त है। यह विडम्बना ही है कि जिसे एक ही जिंदगी में, एक ही जिंदगी से पाया जा सकता है, उसे बहुत सारी जिन्दगियाँ खोने पर भी नहीं पा सके हैं। चले बहुत हैं, फिर भी नहीं पाया है तो इसका अर्थ है कि कहीं कोई समस्या है! कहीं कोई गलती हो रही है। दिशा भी सही है। चले भी हम सही दिशा में है। किन्तु बीच में अटक गये हैं। थोडा भटक गये हैं। क्योंकि बीच में बहकाने वाले बहुत दृश्य है। सुन्दर बगीचे हैं। कलकल बहते झरणे हैं। आँखों को सुकून दें, ऐसे दृश्य हैं। कानों में रस घोल दे, ऐसा संगीत है। जी…

36. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

अपने अतीत का जो व्यक्ति अनुभव कर लेता है, वह वर्तमान में जीना सीख लेता है। वर्तमान कुछ अलग नहीं है। वर्तमान की हर प्रक्रिया मेरे अतीत का हिस्सा बन चुकी है। और एक बार नहीं, बार बार मैं उसे जी चुका हूँ। मुश्किल यह है कि मुझे उसका स्मरण नहीं है। मैं उस अतीत की यथार्थ कल्पना तो कर सकता हूँ। पर उसे पूर्ण रूप से स्मरण नहीं कर पाता। इस कारण मैं अपने आपको बहुत छोटा बनाता हूँ। मैंने अपने जीवन को कुऐं की भांति संकुचित कर लिया है। वही अपना प्रतीत होता है। उस कुऐं से बाहर के हिस्से को मैं अपना नहीं मानता। क्योंकि यह मुझे ख्याल ही नहीं है कि वह बाहर का हिस्सा भी कभी मेरा रह चुका है। अतीत में छलांग लगाना अध्यात्म की पहली शुरूआत है। अतीत को जाने बिना मैं वर्तमान को समग्रता से समझ नहीं पाता। और वर्तमान को जाने बिना कोई भविष्य नहीं है। सच तो यह है कि भविष्य कुछ अलग है भी नहीं, वर्तमान ही मेरा भविष्य है। अपने अतीत को जानने का अर्थ है- अतीत में मैं कहाँ था, मैं क्या था, इसे जान लेना। वह अतीत किसी और का नहीं है, मेरा अपना है। और अतीत होने से वह पराया नहीं हो जाता। उसका अपनत्व मिटा नहीं है। मात्र अतीत हुआ है…

35. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

जीवन सीधी लकीर नहीं है। इसकी पटरी में न जाने कितने ही उल्टे सीधे, दांये बांये मोड बिछे है। मोड मिलने के बाद ही हमें उसका पता चलता है! पहले खबर हो जाय, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। बहुत बार तो ऐसा होता है कि मोड गुजर जाने के बाद ही हमें पता चलता है कि हम किसी मोड से गुजरे हैं। और बहुत बार ऐसा भी होता है कि मोड गुजर जाने के बाद भी हमें पता नहीं चलता कि हम किसी मोड से गुजरे हैं। भले हमें विभिन्न मोडों से गुजरना पडे पर सर्चलाइट तो एक ही पर्याप्त होती है। ऐसा तो होता नहीं कि दांये जाने के लिये टोर्च  अलग चाहिये और बांये जाना हो तो टाँर्च अलग किस्म की चाहिये। क्योंकि अंतर मात्र दिशा का है। न मुझमें अंतर हुआ है, न राह पर रोशनी डालने वाले में! इस कारण जीवन एक निर्णय से नहीं चलता। विभिन्न परिस्थितियों में परस्पर विरोधी निर्णय भी लेने होते हैं। कभी प्यार से पुचकारना होता है तो कभी लाल आँखें करते हुए डांटना भी होता है। कभी लेने में आनंद होता है तो कभी देने में भी आनंद का अनुभव होता है। दिखने में भले निर्णय अलग अलग प्रतीत होते हों, पर अन्तर में उनका यथार्थ, निहितार्थ, फलितार्थ एक ही होता है। पुचकारन…

34. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

34.नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. जीवन को हमने दु:खमय बना दिया है। दु:खमय है नहीं, पर सुख की अजीब व्याख्याओं के कारण वैसा हो गया है। हम अपनी ही व्याख्याओं के जाल में फँस गये हैं। जिस जाल में फँसे हैं, उस जाल को हमने ही अपने विचारों और व्याख्याओं से बुना है। इस कारण किसी और को दोष दिया भी नहीं जा सकता। और इस कारण हम अपने ही अन्तर में कुलबुलाते हैं। हमने अपने जीवन के बारे में एक मानचित्र अपने मानस में स्थिर कर लिया है। और उस मानचित्र में उन्हें बिठा दिया है हमने उन पदार्थों को, परिस्थितियों को, जिनका मेरे साथ कोई वास्ता नहीं है। जिंदगी भर उस मानचित्र को देखते रहें, उस पर लकीरें खींचते रहें, बनाते रहें, बिगाडते रहें, बदलते रहें, परिवर्तन कुछ नहीं होना। परिवर्तन की आशा और आकांक्षा में जिंदगी पूरी हो जाती है, मानचित्र वैसा ही मुस्कुराता रहता है। फिर वही मानचित्र अगली पीढी के हाथ आ जाता है, वह भी उस धोखे में उलझ कर अपनी जिंदगी गँवा देता है। हमने अपने मानचित्र में लकीर खींच दी है कि धन आयेगा तो सुख होगा! कुछ समय बाद लकीर बदलते हैं कि इतना धन आयेगा तो सुख होगा। बदलते समय के साथ यह लकीर बद…

33. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

एक लघु कथा पढी थी। एक आदमी सुबह ही सुबह एक लोटे में छास भर कर अपने घर की ओर आ रहा था। रास्ते में उसका दोस्त मिला। उसके पास एक बडे पात्र में दूध था। उसने कहा- मेरे पास दूध ज्यादा है, थोडा तुम ले लो! उसने कहा- मुझे भी दूध चाहिये। लाओ, मेरे इस लोटे में डाल दो। वह दूध उसके लोटे में डाल ही रहा था कि उसकी निगाहें लोटे के भीतर पडी। देखा तो कहा- भैया! इसमें तो छास दिखाई दे रही है। पहले लोटे को खाली करके धो डालो, बाद में दूध डालूंगा। उसने कहा- नहीं! मुझे छास बहुत प्रिय है। मैं इसका त्याग नहीं कर सकता। मुझे छास भी चाहिये और दूध भी चाहिये। तुम इसी में डाल दो। लोटा आधा खाली है। इतना दूध डाल दो। उसने कहा- यह मूर्खता की बात है। यदि छास में दूध डाल दिया गया तो दूध भी बेकार हो जायेगा। उसने कहा- जो होना हो, पर दूध तो इसी में डालना पडेगा। मैं खाली नहीं करूँगा। वह अपना दूध लेकर रवाना हो गया। यह कहानी व्यावहारिक जगत में घटी या नहीं, पता नहीं। परन्तु आध्यात्मिक जगत के लिये पूर्णत: सार्थक है। पीना है दूध तो छास का त्याग करना ही पडेगा! हमें दूध पसंद है। उसे पाना भी चाहते हैं। पाने के बाद पीना भी चाहते हैं। परन्तु उसक…

32. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

हमें मन के अनुसार जीवन का निर्माण नहीं करना है। बल्कि जीवन के लक्ष्य के अनुसार अपने मन का निर्माण करना है। यह तो तय है कि मन की दिशा के अनुसार ही हमारा आचरण होता है। मन मुख्य है। मन यदि सम्यक् है तो जीवन सम्यक् है! मन यदि विकृत है तो जीवन विकृत है। मन के अधीन जो जीता है, वह हार जाता है। जो मन को अपने अधीन बनाता है, वह जीत जाता है। मन को अपना मालिक मत बनने दो! वह तो मालिक होने के लिये कमर कस कर तैयार है। वह छिद्र खोजता है। छोटा-सा भी छिद्र मिला नहीं कि उसने प्रवेश किया नहीं! प्रवेश होने के बाद वह राजा भोज बन जाता है। फिर हमें नचाता है! उलटे सीधे सब काम करवाता है। क्योंकि उसे किसकी परवाह है। वह किसी के प्रति जवाबदेह भी नहीं है। उसे परिणाम भोगने की चिंता भी नहीं है। वह तो थप्पड मार कर अलग हो जाता है। दूर खडा परिणाम को और परिणाम भोगते तन या चेतन को देखता रहता है। उसे किसी से लगाव भी तो नहीं है। तन का क्या होगा, उसे चिंता नहीं है। चेतना का क्या होगा, उसे कोई परवाह नहीं है। उसे तो केवल अपना मजा लेना है। और सच यह भी है कि हाथ उसके भी कुछ नहीं आता! न पाता है, न खोता है, न रोता है, न सोता है! जैसा…

31. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

घर पुराना था। मालिक उसे सजाने के विचारों में खोया रहता था। पोल में एक पुरानी खटिया पडी थी। कुछ पैसे जुटे थे। वह एक अच्छा कारीगरी वाला लकडी का पलंग ले आया था। पुरानी खटिया को पिछवाडे में डालकर उसे कबाड का रूप दे दिया गया था। कमरे की शोभा उस पलंग से बढ गई थी। उस पर नई चादर बिछाई गई थी। रोजाना दो बार उसकी साफ सफाई होने लगी थी। बच्चों को उस पलंग के पास आने की भी सख्त मनाई थी। वह मालिक और परिवार उस पलंग को देखता था और सीना तान लेता था। घर आते ही पहले पलंग को देखता था। घर से जाते समय वह पीछे मुड मुड कर पलंग को देखा करता था। बच्चे उनके जाने की प्रतीक्षा करते थे। उनके जाने के बाद वह पलंग बच्चों की कूदाकूद का साक्षी बन जाता था। एकाध बार उन्हें पता चला तो बच्चों को मेथीपाक अर्पण किया गया था। पलंग को सजाने के लिये नये तकिये खरीदे गये थे। आस पास के लोग, पडौसी भी इस कलात्मक नये सजे संवरे पलंग को देखे, इस लिये उन्हें एक बाद चाय पर बुलाया गया था। पलंग के संदर्भ में उनके द्वारा की गई प्रशंसा को सुनकर चाय पानी में हुआ खर्च न केवल दिमाग से निकल गया था बल्कि वह खर्च उसे सार्थक लगा था। अपने संबंधियों को भी आम…

30. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

30.नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.करने और चाहने की क्रिया में बीतता है पूरा जीवन! कुछ हम करते हैं जगत में! कुछ हम चाहते हैं जगत से! हमारा अपना व्यवहार जगत के प्रति कैसा भी हो, पर हम जगत से सदा अच्छे व्यवहार की कामना में जीते हैं। दूसरों को अच्छा कहने में कंजूसी करने वाला व्यक्ति दूसरों से अपने लिये सदैव अच्छा कहलवाना चाहता है। यह हमारे सोच की तराजू है। इस तराजू में समतुला का अपना कोई अर्थ नहीं है। समतुला की डंडी स्वतंत्र भी नहीं है। न केवल इसके दोनों पलडे हमारे हाथ में होते हैं बल्कि समतुला की डंडी भी हमारे इशारों पर नाचती है। पलडों की सामग्री बराबर होने पर भी हम उसे बराबर रहने नहीं देते। हमारे स्वार्थ की अंगुली पलडों को दांये बांयें घुमाती रहती है। जिधर हमें अपना पक्ष नजर आता है, उधर घुमा देते हैं। हम देखते भी वैसे ही है! हम सोचते भी वैसे ही है! हम बोलते भी वैसे ही है! सच तो यह है कि सत्य से हमें लेना देना नहीं है। हमें अपनी सोच से लेना देना है। हमें अपने स्वार्थ से लेना देना है। या यों कहें कि सत्य भी यदि हमारे स्वार्थ की फ्रेम में फिट होता है तो ठीक है। अन्यथा हमें उससे कोई मतलब…

29. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

29.नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.हमारा जीवन गलतियों का पिटारा है। सबसे बडी गलती है गलतफहमी में डूबना और उस आधार पर अपनी सोच का निर्माण करना। गलतियों से हम जितने परेशान नहीं है, गलतफहमियाँ उससे कई गुणा हमारे जीवन को, हमारी सोच को नरक बना देती है। प्रश्न है कि गलतफहमी क्यों होती है? इस प्रश्न का समाधान हमारी सोच में छिपा है। गलतफहमी होने के कई कारण है। मुख्य कारण है- हमारा पूर्वाग्रह! हम पूर्वाग्रहों में जीते हैं और पूर्वाग्रहों से जीते हैं। ‘में’ और ‘से’ के बीच अन्तर है तो थोडा, मगर गहरा है। ‘में’ वर्तमान की सूचना देता है और ‘से’ अतीत की! और इस ‘में’ और ‘से’ से ही भविष्य का रास्ता निकलता है। क्योंकि एक बार पूर्वाग्रह बना नहीं कि फिर हारमाला शुरू हो जाती है। फिर रूकता नहीं है। एक गलतफहमी दूसरी को जन्म देती है, दूसरी तीसरी को, और इस प्रकार एक अन्तहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। पूर्वाग्रहग्रस्त होना हमारी कमजोर और अज्ञानभरी मानसिकता का परिणाम है। यह अनुमान है जो सच भी हो सकता है, जो गलत भी हो सकता है। पर हम उसे सच मान कर ही जीते हैं। फिर यह अनुमान हमारी सोच को प्रभावित करता है। उससे गलतफह…

28. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

28.नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. जो करता है, वह जरूरी नहीं है कि सही ही हो! वह गलती भी कर सकता है! गलती का अनुमान ‘करने’ से पहले भी हो सकता है... और बाद में भी हो सकता है। स्वभावत: बाद में ही अधिक होता है, क्योंकि पहले पता चल जाय तो फिर गलती कर नहीं पाता। बाद में पता चलना भी बहुत हितकर होता है। वह बोध आगे के लिये आँख खोल देता है। हमें अपनी गलती का पता अपने से भी चल सकता है, और दूसरों से भी! अपनी गलती का अहसास अपने से होता है, वहाँ इतनी समस्या नहीं होती! पर जब हमें अपनी गलती का अहसास औरों से होता है, उन क्षणों को सहन कर पाना बहुत मुश्किल होता है। दूसरों की ओर अंगुलियाँ उठाना बहुत आसान होता है, पर अपनी ओर उठी अंगुलियों को झेल पाना निश्चित ही मुश्किल कार्य है। जुडे हुए हाथों की अपेक्षा उठी हुई अंगुलियाँ ज्यादा उपकारी होती है। क्योंकि जुडे हुए हाथ हमें असावधान बना सकते हैं, जबकि उठी हुई अंगुलियाँ हमें जागरूक करती है। ऐसा बार बार कहना कि मेरी गलती हो तो बताना, बहुत आसान है। पर जब कोई बताता है, तब चित्त को कषाय भावों से न भरते हुए उपकारक भावों से भरना बहुत मुश्किल होता है। गलती को गलती के…

27. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

27.नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. हिसाब किताब के दिन आ रहे हैं। यह समय लेखा जोखा करने का है। कितना कमाया.... कितना गँवाया....! कमाया तो क्या कमाया! और गँवाया तो क्या गँवाया! कमाने और गँवाने में मूल्यवान यदि वह है जो कमाया है, तो निश्चित ही हमने कुछ पाया है। और जो कमाया है, उसकी अपेक्षा जो गँवाया है, वह ज्यादा मूल्यवान है, तो निश्चित ही हम हार गये हैं। गत वर्ष की दीपावली के बाद आज इस दीपावली तक हमने एक साल जीया है। मैं एक साल बूढा हो गया हूँ। मेरी उम्र में एक साल का इज़ाफा हुआ है। आज मुझे इस साल भर की अपनी मेहनत का परिणाम सोचना है। साल भर में मैंने क्या किया? आज का दिन आगे की ओर मुँह करके आगे बढने का नहीं है। आज का दिन तो पीछे मुड कर अतीत में छलांग लगाने का है। अच्छी तरह अपने अतीत को टटोलना है। लेकिन अतीत को केवल देखना है। उसे पकड कर बैठ नहीं जाना है। उसे देखते रहने से क्या होगा? कितना ही अच्छा अतीत हो, उसमें जीया तो नहीं जा सकता। क्योंकि जीना तो वर्तमान में ही होता है। अच्छे अतीत को निहार कर वर्तमान में रोना नहीं है। आ सकता है रोना क्योंकि वर्तमान उतना अच्छा नहीं ह तो बुरे अतीत को देख …

26. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

26. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
हमारे पास केवल ‘आज’ है। ‘आज’ ‘कल’ नहीं है। और ‘आज’ को ‘कल’ होने में समय लगेगा। आज का उपयोग होने के बाद ‘आज’ ‘कल’ में बदल भी जायेगा तो कोई चिंता की बात नहीं होगी। पर उपयोग किये बिना ही ‘आज’ यों ही यदि ‘कल’ में बदल गया तो निश्चित ही हम अपने आपको क्षमा नहीं कर सकेंगे। यह तय है कि ‘आज’ को कल में बदलने से रोका नहीं जा सकता। कोई नहीं रोक सकता। तीर्थंकर भी आज को ‘कल’ में बदलने से रोक नहीं पाये थे। उन्होंने भी उसका उपयोग किया और सिद्ध हो गये। जो उपयोग करता है, बल्कि कहना चाहिये कि जो सम्यक् उपयोग करता है, वह सिद्ध हो जाता है। आज ही यथार्थ है। क्योंकि आज ही हमारे सामने है। कल का विचार किया जा सकता है... सोचा जा सकता है... उसमें डुबकी लगायी जा सकती है... पर उसमें जीया नहीं जा सकता। चाहे वह कल बीता हुआ कल हो, या आने वाला, हमारे जीने के लिये उसका महत्व उसके ‘आज’ रहने पर या ‘आज’ बनने पर ही था या होगा। हिन्दी भाषा का कल शब्द महत्वपूर्ण है। चाहे बीते दिन के लिये प्रयोग करना हो या आने वाले दिन के लिये.... दोनों के लिये ‘कल’ शब्द का ही प्रयोग किया जाता है। दोनों …

25. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

25. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. सम्राट् ने साधु को संसारी बनाना चाहा है। उसने साधु बनने का कारण भी जानना चाहा है। ‘मैं अनाथ था, इसलिये साधु बन गया’ इस कारण को जानकर वह प्रसन्न हुआ है, क्योंकि उसने भी इसी कारण का अनुमान किया था। अपने अनुमान को सही जानकर आनंदित हुआ है। वह दर्प से दपदपा उठा है। उसने अहंकार भरी हुंकार के साथ कहा है- आओ! मेरे साथ आओ, साधु! मैं तुम्हारा नाथ बनूँगा! साधु मुस्कुराया है। उसने आँखों में आँखें डालकर कहा है- जो खुद का नाथ नहीं है, वह किसी और का नाथ कैसे बन सकता है। तूं तो स्वयं अनाथ है, फिर मेरा नाथ कैसे बनेगा! और सम्राट् की आँखें लाल हो गई है। पर उसकी लाल आँखों पर साधु की निर्मल, पवित्र और स्थिर आँखें हावी हो गई है। उन आँखों में उसे रहस्य भरी गहराई नजर आई है। तेरा है क्या राजन्! और तो और, यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है। फिर क्यों तुम नाथ होने का ढोंग कर रहे हो! मेरे द्वारा दिये गये उत्तर में ‘अनाथ’ शब्द का सही अर्थ तुम नहीं लगा पाये हो, राजन्! तुम अनाथ की जो परिभाषा करते हो, वह अलग है। उस अपेक्षा से मैं अनाथ नहीं था। धन, सत्ता, परिवार सब कुछ मेरे पास था, फिर …

24. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

24.नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. दृश्य तो जैसा है, वैसा ही रहता है। दृश्य नहीं बदला करता। दृष्टि को बदलना होता है! हमें बदलना होता है। और हमारी मुसीबत यह है कि हम सदैव दृश्य बदलने की ही कामना करते हैं, हमारा पुरूषार्थ भी दृश्य बदलने के लिये होता है। यदि मैं न बदला तो दृश्य बदल भी जायेगा तो क्या हो जायेगा? क्योंकि दृश्य वैसा दिखाई नहीं देता, जैसा वह होता है। बल्कि दृश्य वैसा दिखाई देता है, जैसे हम होते हैं। हम अपनी आँखों पर चढे चश्मे के रंग को दृश्य पर स्थापित करते हैं। संसार हमारी ही दृष्टि का हस्ताक्षर है। सूखी घास को खाने से इंकार करने वाले घोडे की आँखों पर जब गहरे हरे रंग का चश्मा बिठा दिया जाता है तो, वह उसी सूखी घास को हरी मान कर बडे चाव और स्वाद से खा जाता है। यह दृष्टिकोण का अन्तर है। उसी संसार में ज्ञानी भी रहता है और उसी संसार में अज्ञानी भी रहता है। दृश्य वही है, लोग वही है, सृष्टि वही है, पेड पौधे वही है, घटनाऐं वही है, शब्द वही है, प्रेम मोह का जाल वही है! सब कुछ एक सा है। अन्तर दृष्टिकोण का है। ज्ञानी उसी दृश्य से अनासक्ति का विकास करता है और अज्ञानी उसी दृश्य से आसक्त…

23. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

23. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. कष्ट और दु:ख की परिभाषा समझने जैसी है। उपर उपर से दोनों का अर्थ एक-सा लगता है, पर गहराई से सोचने, समझने पर इसका रहस्य कुछ और ही पता लगता है। कष्टों में जीना अलग बात है और दु:ख में जीना अलग बात है। कष्ट जब हमारे मन को दु:खी करते हैं तो जीवन अशान्त हो जाता है। और कष्टों में भी जो व्यक्ति मुस्कुराता है, वे जीवन जीत जाते हैं। कष्ट तो परमात्मा महावीर ने बहुत भोगे, परन्तु वे दु:खी नहीं थे। उन कष्टों में भी सुख का अनुभव था। कष्टों को जब हमारा मन स्वीकार कर लेता है, तो यह तो संभव है कि कष्ट मिले, पर वह दु:खी नहीं होता। कष्टों को जब हमारा मन स्वीकार नहीं करता, तो यह व्यक्ति दु:खी हो जाता है। यों समझे कि स्वीकार्य तकलीफ कष्ट है और अस्वीकार्य तकलीफ दु:ख है। कष्टों पर हमारा कोई वश नहीं है। पर दु:ख पर हमारा वश है। आने वाले कष्ट तो हमारे पूर्व जीवन का परिणाम है जो भाग्य बनकर हमारे द्वार तक पहुँचा है। पर कष्ट भरे उन क्षणों में दु:ख करना, आने वाले समय में और कष्ट पाने का इन्तजाम करना है। इस दुनिया में हम कष्टों से भाग नहीं सकते। और बचाव के उपाय सदैव सार्थक परिणाम …

22. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

22. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. संवत्सरी महापर्व निकट है। हमेशा की भांति इस वर्ष भी यह हमारी कुण्डी खटखटाने चला आया है। यह ऐसा अतिथि है, जो आमंत्रण की परवाह नहीं करता। जो बुलाने पर भी आता है, नहीं बुलाने पर भी आता है। यह ऐसा अतिथि है जो ठीक समय पर आता है। पल भर की भी देरी नहीं होती। जिसके आगमन के बारे में कभी कोई संशय नहीं होता। सूरज के उदय और अस्त की भांति नियमित है। यह आता है, जगाता है और चला जाता है। जो देकर तो बहुत कुछ जाता है, पर लेकर कुछ नहीं जाता। यह हम पर निर्भर है कि हम जाग पाते हैं या नहीं! इसे सुन पाते हैं या नहीं! यह अपना कर्त्तव्य निभा जाता है। और हम नहीं जागते तो यह नाराज भी नहीं होता। कितनी आत्मीयता और अपनत्व से भरा है यह पर्व! न नाराजगी है, न उदासी है, न क्रोध है, न चापलूसी है, न शल्य है, न मोह! वही जानी पहचानी मुस्कुराहट लिये... आँखों में रोशनी लिये... जीने का एक मजबूत जज़्बा लिये..... हमें रोशनी से भरने, जीने का एक मकसद देने, एक मीठी मुस्कुराहट देने चला आता है। मुश्किल हमारी है कि हम इसे देखते हैं, जानते हैं, पहचानते हैं, सोचते हैं, विचारते हैं, बधाते हैं, गीत …

21. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

21 नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा. जीवन पुण्य और पाप का परिणाम है। पूर्व पर्याय {पूर्व जन्म} का पुरूषार्थ हमारे वर्तमान का अच्छापन या बुरापन तय करता है। जीवन बिल्कुल हमारी इच्छाओं से चलता है। इच्छा के विपरीत कुछ भी नहीं होता। हमारे साथ जो भी होता है, हमारी इच्छा से ही होता है। मन में पैदा हुए विचारों को ही जिन्हें हम रूचि से सहेजते हैं, इच्छा माना है। परन्तु यहाँ इच्छा का अर्थमन में पैदा हुए विचार ही नहीं है। यहाँ इच्छा का अर्थ थोडा व्यापक है। इसमें मन तो मुख्य है ही, क्योंकि बिना मन के तो कोई प्रवृत्ति होती नहीं। इच्छा का अर्थ है- मानसिक, वाचिक और कायिक प्रवृत्ति! जो भी हमारे साथ हुआ है, होता है, होगा, वह सब इसी का परिणाम है। होता सब कुछ हमारी इच्छा से है। पर वर्तमान की इच्छा से नहीं, पूर्वकृत इच्छा से! पूर्व में हमने जैसा सोचा, जैसा बोला, जैसा किया, वही वर्तमान में हमें उपलब्ध होता है। यह तय है कि उपलब्धि पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। क्योंकि इसकी चाभी हमारे हाथ से पूर्व जीवन में ही निकल चुकी होती है। पुण्य और पाप का उदय महत्वपूर्ण नहीं है! पुण्य और पाप के उदय के क्षण महत्वपूर्ण नही…