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Jan 3, 2016

Sangh Yatra... बैगानी परिवार जयपुर द्वारा आयोजित... श्री शत्रुंजय छ:री पालित तीर्थयात्रा भावोल्लास के संपन्न ...

Palitana
पूज्य पिताश्री शानुरामजी एवं माताश्री श्रीमती वीरांबाईजी के आशीर्वाद से आयोजित आदर्श नगर, जयपुर निवासी भ्राताद्वय संघवी श्री सुरेशकुमारजी, सुभाषचंदजी बैगानी परिवार द्वारा संघयात्रा का आयोजन किया गया। 
इस तीर्थयात्रा में पूज्य गुरुदेव गणाधीश उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. के शिष्य पूज्य मुनिराज श्री मयंकप्रभसागरजी म., मुनि मेहुलप्रभसागरजी म. आदि ठाणा की निश्रा एवं साध्वीवर्या श्री दिव्यप्रभाश्रीजी म. व प्रियदर्शनाश्रीजी म. आदि ठाणा की सानिध्यता प्राप्त हुयी। 
पालीताणा में संघ का विश्राम भीनमाल भवन व दक्ष विहार में हुआ। मुनि मेहुलप्रभसागरजी महाराज ने प्रवचन फरमाते हुए कहा- एक व्यक्ति गाडी में बैठकर तीर्थ यात्रा करता है। और एक व्यक्ति पैदल चल कर आज्ञा के अनुसार छह री का पालन करता हुआ तीर्थ यात्रा करता है। इन दोनों यात्राओं में बहुत अन्तर है। गाडी की यात्रा शरीर को आराम देती है। पर पैदल चलकर की जाने वाली यात्रा आत्मा को पावन करती है। 

Dec 4, 2015

Palitana Hari Vihar पालीताना - हरिविहार में ध्वजारोहण संपन्न

विश्व विख्यात श्री पालीताणा तीर्थ स्थित श्री जिन हरि विहार धर्मशाला के श्री आदिनाथ परमात्मा से सुशोभित मयूर मंदिर का 13वां वार्षिक ध्वजारोहण का कार्यक्रम दि. 24 नवंबर 2015 को आनन्द व उल्लास के साथ संपन्न हुआ। 


कायमी ध्वजा के लाभार्थी श्रीमती पुष्पाजी अशोकजी जैन परिवार द्वारा जिन मंदिर पर ध्वजा चढाई गई। प्रात: अठारह अभिषेक का आयोजन किया गया। सतरह भेदी पूजा पढाई गई। 
यह समारोह पूज्य मुनिवर श्री मयंकप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री मेहुलप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री मौनप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री मोक्षप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री मननप्रभसागरजी म., पू. मुनि श्री कल्पज्ञसागरजी म. आदि ठाणा एवं पूजनीया खान्देश शिरोमणि श्री दिव्यप्रभाश्रीजी म.सा. प्रियदर्शनाश्रीजी म. आदि साध्वी मंडल की पावन निश्रा में संपन्न हुआ। 

Oct 3, 2015

Palitana Gujarat शाश्वत तीर्थाधिराज पालीताना स्थित श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में पर्युषण महापर्व की आराधना आनंद मंगल व हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुई।

 परम पूज्य गुरुदेव गणाधीश उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. के शिष्य पूज्य मुनिराज श्री मयंकप्रभसागरजी म.सा., पूज्य मुनि श्री मेहुलप्रभसागरजी म., पूज्य मुनि श्री मौनप्रभसागरजी म., पूज्य मुनि श्री मोक्षप्रभसागरजी म., पूज्य मुनि श्री मननप्रभसागरजी म. एवं पूज्य गुरुदेव मुनिराज श्री मनोज्ञसागरजी म.सा. के शिष्य पूज्य मुनि श्री कल्पज्ञसागरजी म. की निश्रा में चातुर्मास की आराधना के अंतर्गत नित्य प्रवचन व दोपहर में स्वाध्याय का कालांश चला। जिसमें चातुर्मासिक आराधना करने हेतु पधारे सभी आराधकों ने एवं विभिन्न धर्मशालाओं में रुके श्रावक-श्राविकाओं ने पूरा भाग लिया।


हरि विहार में पर्युषण पर्वाराधना का अनोखा ठाठ रहा। प्रतिदिन प्रात: 9:30 बजे प्रवचन का आयोजन हुआ। पूज्य मुनिराज श्री मयंकप्रभसागरजी म. के श्रीमुख से प्रारंभ सुधर्म सभा में मुनि मेहुलप्रभसागरजी म. व मुनि कल्पज्ञसागरजी म. के प्रवचन के प’चात् संघ पूजन और साधर्मिक वात्सल्य का भी आयोजन रहा। ता. 12.09.2015 को दादा गुरूदेव मणिधारी जिनचन्द्रसूरिजी म.सा. की स्वर्गारोहण तिथि पर गुणानुवाद और दोपहर में मयुर मंदिर में दादागुरूदेव की पूजा पढाई गई। 

May 4, 2015

Jain Religion answer... Shravak ke prashn... shravak yogy prashna

1) shravak ke gun kitne ?
  21
2) shravak ke dainik kartavya kitne hai?
  6
3) shravak ke vaarshik kartavya kitne ?
  11
4) shravak ke paryushan ke kartavya kitne ?
  5
5) shravak roj kitne niyamo ko dhaaran karta hai ?
  14
6) shravak ko Dono samay kya Karna chahiye ?
  pratikraman
7) shravak ko mandir ki kitne aashaatana  taalani chahiye ?
 84
8) shravak ka kon sa gunsthan hai ?
  5th deshvirati gunsthan

Apr 19, 2015

VARSHITAP वर्षीतप का पारणा इक्षुरस से ही क्यों ... ???


प्रस्तुति -आर्य मेहुलप्रभसागरजी म. 
विश्व विज्ञान के प्रथम प्रस्तोता भगवान ऋषभदेव को वर्ष भर आहार उपलब्ध नहीं हुआ। कारण कुछ भी रहा हो किन्तु सुदीर्घ तप प्रभु ने जो उस समय सिद्ध किया वह अपने आपमें तप साधना का एक अदभुत इतिहास बन गया। जो सदियों की यात्रा करते हुए आज तक धर्म जगत को आंदोलित, प्रभावित करता रहा। वर्षी-तप के उस इतिहास को आज भी हमारे तपस्वी जन सुदीर्घ तप साधना कर जीवंत रखे हुए हैं। यह अलग बात है कि उसकी परिभाषा तो नहीं बदली किन्तु उसकी प्रक्रिया में कुछ परिवर्तन आया जो आज के तपस्वी
जनों के शारीरिक योग्यता के अनुरूप ही है।
एक वर्ष तक उपवास और पारणे का क्रम अविकल रूप से चलता है। तप में उपवास के उपरान्त वेला-तेला आदि तप का आधिक्य हो सकता है किन्तु किन्तु पारना तो एक ही करना होता है। उसके बाद अगले दिन उपवास ही करना होता है।
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