Dec 20, 2016

Rajgir Bihar राजगृही वीरायतन में प्रतिष्ठा 17 फरवरी को

राजगृही पूज्य उपाध्याय श्री अमरमुनिजी म. के आशीर्वाद से एवं आचार्यश्री चन्दनाजी महाराज की पावन प्रेरणा से वीरायतन के पावन परिसर में श्री पाश्र्वनाथ परमात्मा का भव्य शिखरबद्ध जिन मंंदिर का निर्माण चल रहा है।
इस मंदिर निर्माण का संपूर्ण लाभ पूना निवासी श्री रसिकलालजी सौ. शोभादेवी धारीवाल परिवार ने लिया है। इस मंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. आदि मुनि मंडल एवं पूजनीया माताजी म. श्री रतनमालाश्रीजी म. पूजनीया बहिन म. डाँ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म. आदि ठाणा की पावन निश्रा में संपन्न होगा।

त्रिदिवसीय महोत्सव के साथ अंजनशलाका प्रतिष्ठा होगी। इस अवसर पर शासन रत्न श्री मनोजकुमारजी बाबुमलजी हरण पधारेंगे। विधि विधान हेतु जयपुर निवासी सुप्रसिद्ध विधिकारक श्री यशवंतजी गोलेच्छा पधारेंगे।

sammetshikhar tirth Vachna श्री सम्मेतशिखर महातीर्थ की पावन गोद में वांचना शिविर 7 से 9 जनवरी 2017 को

बीस तीर्थकरों की निर्वाण भूमि श्री सम्मेतशिखर महातीर्थ के पावन ऊर्जावान वातावरण में पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य प्रवर श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. आदि मुनि मंडल एवं पूजनीया माताजी म. श्री रतनमालाश्रीजी म., पू. बहिन म. डाँ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. आदि के पावन सानिध्य में दिनांक 7, 89 जनवरी 2017 को त्रिदिवसीय वांचना शिविर का आयोजन किया गया है। ता. 10 जनवरी को सामूहिक यात्रा होगी। इस शिविर का आयोजन अ.भा. खरतरगच्छ युवा परिषद केयुपद्वारा किया जा रहा है। इस शिविर का संपूर्ण लाभ गढ़ सिवाना-अहमदाबाद निवासी संघवी श्री अशोककुमारजी मानमलजी भंसाली द्वारा लिया गया है।
यह शिविर जैन धर्म दर्शन तत्त्वज्ञान का सामान्य बोध क्रिया, विधि, गच्छ, इतिहास आदि विविध विषयों पर केन्द्रित होगा।

शिविर में सम्मिलित होने हेतु इच्छुक शिविरार्थी शीघ्र ही संपर्क कर अपना नाम अंकित कराकर अनुमति प्राप्त करें। 
संपर्क सूत्र - 
अशोक भसांली- 9825030604, 

दुर्ग से कैवल्यधाम का छह री पालित संघ संपन्न

पूज्य गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्य देव श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा 6 एवं पूजनीया माताजी म. श्री रतनमालाश्रीजी म. बहिन म. डाँ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म. आदि ठाणा 5 की पावन निश्रा में दुर्ग नगर से श्री भूरमलजी पतासी देवी बरडिया परिवार की ओर से उवसग्गहरं तीर्थ-कैवल्यधाम तीर्थ के लिये छह री पालित संघ का भव्य आयोजन किया गया।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन विधि विधान के साथ चतुर्विध संघ ने नगपुरा की ओर प्रस्थान किया। श्री उवसग्गहरं तीर्थ पहुँचने पर संस्थान की ओर से भव्य स्वागत किया गया। वहाँ बिराजमान आचार्य श्री राजचन्द्रसूरिजी म. आदि की सामूहिक निश्रा में कार्तिक पूर्णिमा का विधान किया गया। प्रवचन में पूज्य गुरुदेव गच्छाधिपतिश्री ने शत्रुंजय तीर्थ की भावयात्रा विवेचना के साथ कराई।
ता. 15 को वहाँ से विहार कर संघ दुर्ग पहुँचा। जहाँ श्री सुखसागर प्रवचन मंडप में श्री भूरमलजी बरडिया ने जीवराशि क्षमापना की। पूज्यश्री ने पद्मावती आलोयणा सुनाने के साथ उसकी विवेचना कर जीवराशि क्षमापना का रहस्य समझाया।

दुर्ग नगर में उपधान तप की आराधना सानन्द संपन्न

पूज्य गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्य देव श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. पूज्य मुनि श्री मनितप्रभसागरजी म. पूज्य मुनि श्री समयप्रभसागरजी म. पूज्य मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म. पूज्य मुनि श्री श्रेयांसप्रभसागरजी म. पूज्य मुनि श्री मलयप्रभसागरजी म. ठाणा 6 एवं पूजनीया माताजी म. श्री रतनमालाश्रीजी म. पूजनीया बहिन म. डाँ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म. पूजनीया साध्वी श्री प्रज्ञांजनाश्रीजी म. पूजनीया साध्वी श्री नीतिप्रज्ञाश्रीजी म. पूजनीया साध्वी श्री निष्ठांजनाश्रीजी म. ठाणा 5 की पावन निश्रा में दुर्ग नगर में दिनांक 8 नवंबर 2016 को उपधान तप का माला विधान अत्यन्त आनंद व उत्साह के साथ संपन्न हुआ।
मालारोपण विधान के उपलक्ष्य में पंचदिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। ता. 4 से 6 तक खरतरगच्छाचार्य श्री वर्धमानसूरि विरचित श्री अर्हद् महापूजन पढाया गया। ता. 7 को भव्यातिभव्य शोभायात्रा निकाली गई। ता. 8 को माला विधान हुआ। प्रथम माला धारण करने का लाभ श्रीमती निर्मलादेवी चोपडा को प्राप्त हुआ। माला पहनाने का लाभ मातुश्री तारादेवी श्री पन्नालालजी मूलचंदजी दिलीपजी नवकुमारजी चोपडा सुरगी वालों ने लिया।
द्वितीय माला श्रीमती ललितादेवी संखलेचा ने धारण की। उन्हें श्रीमती मोहिनीदेवी भंवरलालजी संखलेचा हैदराबाद परिवार ने धारण करवाई।

चातुर्मासों की घोषणा 16 अप्रेल 2017 को रायपुर (छ.ग.) में होगी

JINMANIPRABHSURI

पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने फरमाया है कि पूज्य गणनायक श्री सुखसागरजी म.सा. के समुदाय के साधु साध्वीजी भगवंतों के आगामी चातुर्मासों की घोषणा रायपुर नगर में 16 अप्रेल 2017 को की जायेगी।
पालीताना खरतरगच्छ सम्मेलन में लिये गये निर्णय में इस वर्ष यह परिवर्तन किया गया है। सम्मेलन में यह निर्णय किया गया था कि समुदाय के समस्त चातुर्मासों का निर्णय पूज्य गच्छाधिपतिश्री द्वारा ही फाल्गुन सुदि चतुर्दशी के दिन किया जायेगा।
चूंकि इस वर्ष पूज्य गच्छाधिपतिश्री होली चातुर्मास की अवधि में विहार में रहेंगे। वे 17 फरवरी 2017 को राजगृही नगर में प्रतिष्ठा संपन्न करवाकर रायपुर की ओर विहार करेंगे, अत: होली चातुर्मास के दिन चातुर्मासों की घोषणा नहीं हो पायेगी।
रायपुर में देवेन्द्रनगर में ता. 17 अप्रेल 2017 को प्रतिष्ठा है। उस अवसर पर प्रतिष्ठा से एक दिन पूर्व ता. 16 अप्रेल 2017 वैशाख वदि 5 को चातुर्मास घोषित किये जायेंगे।

चातुर्मास की विनंती करने हेतु सकल संघ ता. 16 अप्रेल 2017 को रायपुर पहुँचेंगे।

Nov 19, 2016

Jinakantisagarsuri Gurudev
सदैव कृपा की अमीवर्षा करके 
हमें सन्मार्ग प्रदर्शित करें 
इसी अभिलाषा के साथ 
पुण्यतिथि पर अनंतानंत श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हैं। 

यशस्वी पाट परम्परा पर सुशोभित जन-जन की श्रद्धा के केन्द्र, शासन प्रभावक, संयम शिरोमणि गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरिजी महाराज

यशस्वी पाट परम्परा पर सुशोभित जन-जन की श्रद्धा के केन्द्र, शासन प्रभावक, संयम शिरोमणि गच्छाधिपति  आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरिजी महाराज
आपका जन्म रतनगढ़ निवासी श्री मुक्तिमलजी सिंघी की धर्मपत्नी श्रीमती सोहनदेवी की कोख से वि.सं. 1968 माघ वदी एकादशी को हुआ था। जन्म का नाम तेजकरण था। माता-पिता तेरापंथी संप्रदाय के होने से तत्कालीन तेरापंथी समुदाय के अष्टम आचार्य श्री कालुगणि के पास 9 वर्ष की बाल्यावस्था में पिता के साथ वि.सं. 1978 में तेजकरण ने दीक्षा ग्रहण की। दीक्षित होने के बाद तेरापंथी शास्त्रों का गहनतापूर्वक अध्ययन किया। जिससे मूर्तिपूजा, मुखविस्त्रका, दया, दान आदि के सम्बन्ध में तेरापंथ सम्प्रदाय की मान्यताएं अशास्त्रीय लगी। फलत: तेरापंथ संप्रदाय का त्याग कर वि.सं. 1989 ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी को अनूपशहर में गणाधीश्वर श्री हरिसागरजी महाराज के कर कमलों से भगवती दीक्षा अंगीकार करने पर मुनि श्री कांतिसागरजी नाम पाया। 
आप प्रखर वक्ता थे। आपकी वाणी में मिठास होने के साथ ही आपका कण्ठ सुरीला एवं ओजस्वी था। आपको आगम ज्ञान के अलावा संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी, मारवाड़ी भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। आप एक अच्छे कवि थे। आप प्रवचन के समय अपने मधुर कण्ठ से व्याख्यान को कविता का रूप देने में समर्थ थे। राजस्थानी भाषा में अंजना रास, मयणरेहा रास, पैंतीस बोल विवरण आदि रचनाएं लिखी। 
आपने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, हरियाणा, जम्मु कश्मीर, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु आदि क्षेत्रों में विचरण किया। 
आपको वि.सं. 2038 आषाढ़ सुदी षष्ठी, 13 जून 1982 को जयपुर खरतरगच्छ श्रीसंघ ने आचार्य पद से विभुषित किया। 
आपने अपने दीक्षा काल में अनेक स्थानों पर जैसे- जलगांव, कुलपाक, आहोर, सम्मेतशिखर, पावापुरी, उदयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, कल्याणपुर आदि तीर्थ स्थलों पर प्रतिष्ठाएं व अंजनशलाका करवायी। अनेक उपधान तप कराये। खरतरगच्छ की मजबूती एवं वृद्धि के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। 
आपकी निश्रा में बाड़मेर से शत्रुंजय तीर्थ तक 1000 यात्रियों का एक विशाल ऐतिहासिक पैदल यात्रा संघ निकला। आप परम यशस्वी, महान शासक प्रभावक, संयम शिरोमणि एवं आध्यात्मिक प्रज्ञा पुरुष थे। आपके 11 शिष्य है जिनमें प्रथम एवं प्रमुख शिष्य प.पू. आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा. है जो वर्तमान में खरतरगच्छ के गच्छाधिपति के रूप में विराजमान है। शेष 10 शिष्यों में प.पू. उपाध्याय श्री मनोज्ञसागरजी म., मुनि मुक्तिप्रभसागरजी म., महोपाध्याय ललितप्रभसागरजी म., मुनि श्री चन्द्रप्रभसागरजी म. आदि जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न है। 
आपका अंतिम प्रभावक चातुर्मास राजस्थान के सिवाणा नगर हुआ। विहार के दौरान वि.सं.2042 मिगसर वदि सप्तमी को मांडवला गांव में हृदय गति रुक जाने से स्वर्गवास हो गया। मांडवला में आपकी स्मृति स्वरूप आपके प्रिय व प्रथम शिष्य आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म.सा. के अथक प्रयासों एवं उनकी प्रेरणा से विश्व प्रसिद्ध स्थापत्य ‘जहाज मंदिर’ का निर्माण कराया गया है, जो वर्तमान में विश्व विख्यात एक भव्य तीर्थ के रूप में सौभाग्यवान हो रहा है। 
31  वीं पुण्यतिथि पर सादर आदरांजलि