Dec 7, 2012

JAHAJ MANDIR NEWS

पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री की पुण्यतिथि मनाई गई
पूज्य गुरुदेव प्रज्ञापुरूष आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरीश्वरजी म.सा. की 27वीं पुण्यतिथि अत्यन्त आनंद व उल्लास के साथ जहाज मंदिर मांडवला में मिगसर वदि 7 ता. 6 दिसम्बर 2012 को मनाई गई।
समारोह को निश्रा प्रदान की पूजनीया ध्वल यशस्वी श्री विमलप्रभाश्रीजी म.सा. की शिष्या पूजनीया साध्वी श्री हेमरत्नाश्रीजी म. आदि ठाणा एवं पूजनीया तपागच्छीय साध्वी श्री विनयरत्नाश्रीजी म.सा. आदि ठाणा ने!
पूजनीया साध्वी श्री हेमरत्नाश्रीजी म., जयरत्नाश्रीजी म. नूतनप्रिया श्रीजी म. ने पूज्य गुरुदेव आचार्य भगवन्त के जीवन की उज्ज्वल गाथाओं का वर्णन करते हुए उनके असीम उपकारों का स्मरण किया... श्रद्धांजली अर्पण की।
पूजनीया साध्वी श्री विनयरत्नाश्रीजी म. ने जहाज मंदिर तीर्थ की विशिष्टताओं का वर्णन करते हुए पूज्य आचार्य भगवन्त के प्रति अपनी श्रद्धांजली अर्पण की।
पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री की प्रतिकृति के आगे दीप प्रज्ज्वलन का लाभ बालोतरा दिल्ली निवासी श्री देवराजजी स्वरूपकुमारजी खिंवसरा ने लिया। धुप पूजा का लाभ श्री प्रकाशजी छाजेड जालोर ने लिया। वासक्षेप पूजा का लाभ श्री जुगराजजी घेवरचंदजी गोलेच्छा मांडवला बालेसर ने, माल्यार्पण का लाभ श्री कांतिलालजी कागरेचा ओटवाला वालों ने तथा अक्षत गहुँली पूजा का लाभ जालोर निवासी श्री सुरेन्द्रकुमारजी धर्मेन्द्रजी पटवा ने लिया।
पूजनीया गुरुवर्याओं को कामली वहोराने का लाभ बाडमेर सांचोर जालोर निवासी श्री प्रकाशचंदजी छाजेड परिवार ने लिया।
दोपहर में श्री जिनकान्तिसागरसूरि गुरु पद पूजा पढाई गई व आरती उतारी गई। इस मेले का संपूर्ण लाभ श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ, मुंबई द्वारा लिया गया। समारोह का संचालन मंत्री श्री सूरजमलजी धोका खंडप वालों ने किया। इस अवसर पर ट्रस्ट के सलाहकार श्री चंपालालजी मुथा-मांडवला, सलाहकार श्री रिखबदासजी मालु-बाडमेर, कार्याध्यक्ष श्री द्वारकादासजी डोसी-बाडमेर, उपाध्यक्ष श्री मोहनलालजी दांतेवाडिया-मांडवला, उपाध्यक्ष श्री पारसमलजी छाजेड-मांडवला, उपाध्यक्ष श्री किशनचंदजी बोहरा-जयपुर, कोषाध्यक्ष श्री प्रकाशजी छाजेड-जालोर, मंत्री श्री सूरजमलजी धेका-खण्डप, मंत्री श्री मांगीलालजी संखलेचा-बाडमेर, निर्माण मंत्री श्री मीठालालजी विनायकिया-जालोर, श्री कांतिलालजी कागरेचा-ओटवाला, श्री दीपचंदजी कोठारी-ब्यावर, श्री धर्मेन्द्रजी पटवा-जालोर, श्री पारसमलजी बरडिया-मांडवला आदि ट्रस्टीगण उपस्थित थे।

जहाज मंदिर समाचार

पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री की पुण्यतिथि मनाई गई
पूज्य गुरुदेव प्रज्ञापुरूष आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरीश्वरजी म.सा. की 27वीं पुण्यतिथि अत्यन्त आनंद व उल्लास के साथ जहाज मंदिर मांडवला में मिगसर वदि 7 ता. 6 दिसम्बर 2012 को मनाई गई।
समारोह को निश्रा प्रदान की पूजनीया ध्वल यशस्वी श्री विमलप्रभाश्रीजी म.सा. की शिष्या पूजनीया साध्वी श्री हेमरत्नाश्रीजी म. आदि ठाणा एवं पूजनीया तपागच्छीय साध्वी श्री विनयरत्नाश्रीजी म.सा. आदि ठाणा ने!
पूजनीया साध्वी श्री हेमरत्नाश्रीजी म., जयरत्नाश्रीजी म. नूतनप्रिया श्रीजी म. ने पूज्य गुरुदेव आचार्य भगवन्त के जीवन की उज्ज्वल गाथाओं का वर्णन करते हुए उनके असीम उपकारों का स्मरण किया... श्रद्धांजली अर्पण की।
पूजनीया साध्वी श्री विनयरत्नाश्रीजी म. ने जहाज मंदिर तीर्थ की विशिष्टताओं का वर्णन करते हुए पूज्य आचार्य भगवन्त के प्रति अपनी श्रद्धांजली अर्पण की।
पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री की प्रतिकृति के आगे दीप प्रज्ज्वलन का लाभ बालोतरा दिल्ली निवासी श्री देवराजजी स्वरूपकुमारजी खिंवसरा ने लिया। धुप पूजा का लाभ श्री प्रकाशजी छाजेड जालोर ने लिया। वासक्षेप पूजा का लाभ श्री जुगराजजी घेवरचंदजी गोलेच्छा मांडवला बालेसर ने, माल्यार्पण का लाभ श्री कांतिलालजी कागरेचा ओटवाला वालों ने तथा अक्षत गहुँली पूजा का लाभ जालोर निवासी श्री सुरेन्द्रकुमारजी धर्मेन्द्रजी पटवा ने लिया।
पूजनीया गुरुवर्याओं को कामली वहोराने का लाभ बाडमेर सांचोर जालोर निवासी श्री प्रकाशचंदजी छाजेड परिवार ने लिया।
दोपहर में श्री जिनकान्तिसागरसूरि गुरु पद पूजा पढाई गई व आरती उतारी गई। इस मेले का संपूर्ण लाभ श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ, मुंबई द्वारा लिया गया। समारोह का संचालन मंत्री श्री सूरजमलजी धोका खंडप वालों ने किया। इस अवसर पर ट्रस्ट के सलाहकार श्री चंपालालजी मुथा-मांडवला, सलाहकार श्री रिखबदासजी मालु-बाडमेर, कार्याध्यक्ष श्री द्वारकादासजी डोसी-बाडमेर, उपाध्यक्ष श्री मोहनलालजी दांतेवाडिया-मांडवला, उपाध्यक्ष श्री पारसमलजी छाजेड-मांडवला, उपाध्यक्ष श्री किशनचंदजी बोहरा-जयपुर, कोषाध्यक्ष श्री प्रकाशजी छाजेड-जालोर, मंत्री श्री सूरजमलजी धेका-खण्डप, मंत्री श्री मांगीलालजी संखलेचा-बाडमेर, निर्माण मंत्री श्री मीठालालजी विनायकिया-जालोर, श्री कांतिलालजी कागरेचा-ओटवाला, श्री दीपचंदजी कोठारी-ब्यावर, श्री धर्मेन्द्रजी पटवा-जालोर, श्री पारसमलजी बरडिया-मांडवला आदि ट्रस्टीगण उपस्थित थे।

Nov 21, 2012

पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. की पावन निश्रा में श्री जिनकान्तिसागरसूरि स्मारक ट्रस्ट, जहाज मंदिर, मांडवला की ओर से जैन समाज की विशिष्ट विभूतियों का ‘जैन पद्मश्री’ अलंकरण से अभिनंदन किया जायेगा। यह अभिनंदन समारोह ता. 25 नवम्बर 2012 को प्रात: 10 बजे मुंबई के चर्चगेट स्थित के.सी. काँलेज के आँडिटोरियम में आयोजित किया जायेगा। उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री राजन कोचर को इस समारोह का संयोजक बनाया गया है। समाज के श्री प्रशान्त झवेरी ने बताया कि इस समारोह में श्री दीपचंदजी गार्डी, दानवीर सेठ श्री कनकराजजी लोढा, बहुश्रुत विद्वान् डाँ0 जितेन्द्रभाई बी. शाह एवं विधायक श्री मंगलप्रभातजी लोढा का अभिनंदन किया जायेगा। इस अवसर पर केन्द्रीय मंत्री श्री मिलिन्द देवरा, सांसद श्री देवजी भाई पटेल, विधायक श्री भाई जगताप, श्री अमीनभाई पटेल, श्री अरूणभाई गुजराथी आदि विशिष्ट महानुभाव मुख्य अतिथि के रूप में पधारेंगे। समारोह की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध सूफी संत श्री अरविन्द गुरूजी करेंगे। इस समारोह के प्रायोजक के रूप में मै. नियो बिल्डर्स के श्री केसरीचंदजी प्रेमचंदजी मेहता परिवार सांचोर वालों ने लाभ लिया है। श्री नरेश मेहता, श्री पुखराज छाजेड, श्री चंपालाल वाघेला, श्री प्रदीप श्रीश्रीश्रीमाल आदि ने इस अवसर पर अधिक से अधिक लोगों से पधारने की अपील की है।

पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. की पावन निश्रा में श्री जिनकान्तिसागरसूरि स्मारक ट्रस्ट, जहाज मंदिर, मांडवला की ओर से जैन समाज की विशिष्ट विभूतियों का ‘जैन पद्मश्री’ अलंकरण से अभिनंदन किया जायेगा।
यह अभिनंदन समारोह ता. 25 नवम्बर 2012 को प्रात: 10 बजे मुंबई के चर्चगेट स्थित के.सी. काँलेज के आँडिटोरियम में आयोजित किया जायेगा। उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री राजन कोचर को इस समारोह का संयोजक बनाया गया है।
समाज के श्री प्रशान्त झवेरी ने बताया कि इस समारोह में  श्री दीपचंदजी गार्डी, दानवीर सेठ श्री कनकराजजी लोढा, बहुश्रुत विद्वान् डाँ0 जितेन्द्रभाई बी. शाह एवं विधायक श्री मंगलप्रभातजी लोढा का अभिनंदन किया जायेगा।
इस अवसर पर केन्द्रीय मंत्री श्री मिलिन्द देवरा, सांसद श्री देवजी भाई पटेल, विधायक श्री भाई जगताप, श्री अमीनभाई पटेल, श्री अरूणभाई गुजराथी आदि विशिष्ट महानुभाव मुख्य अतिथि के रूप में पधारेंगे। समारोह की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध सूफी संत श्री अरविन्द गुरूजी करेंगे। इस समारोह के प्रायोजक के रूप में मै. नियो बिल्डर्स के श्री केसरीचंदजी प्रेमचंदजी मेहता परिवार सांचोर वालों ने लाभ लिया है।
श्री नरेश मेहता, श्री पुखराज छाजेड, श्री चंपालाल वाघेला, श्री प्रदीप श्रीश्रीश्रीमाल आदि ने इस अवसर पर अधिक से अधिक लोगों से पधारने की अपील की है।


चंपालाल वाघेला
ट्रस्टी
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जैन पद्मश्री अलंकरण

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पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. की पावन निश्रा में श्री जिनकान्तिसागरसूरि स्मारक ट्रस्ट, जहाज मंदिर, मांडवला की ओर से जैन समाज की विशिष्ट विभूतियों का ‘जैन पद्मश्री’ अलंकरण से अभिनंदन किया जायेगा। यह अभिनंदन समारोह ता. 25 नवम्बर 2012 को प्रात: 10 बजे मुंबई के चर्चगेट स्थित के.सी. कोलेज के ओडिटोरियम में आयोजित किया जायेगा। इस समारोह में स्वनाम धन्य श्री दीपचंदजी गार्डी, दानवीर सेठ श्री कनकराजजी लोढा, बहुश्रुत विद्वान् डॉ. जितेन्द्रभाई बी. शाह एवं विधायक श्री मंगलप्रभातजी लोढा का अभिनंदन किया जायेगा। इस अवसर पर कई केन्द्रीय मंत्री व विधायक आदि महानुभावों की उपस्थिति रहेगी। इस समारोह का संपूर्ण लाभ नियो बिल्डर के श्री केसरीचंदजी प्रेमचंदजी मेहता परिवार सांचोर वालों ने लिया है . jahaj mandir, maniprabh, mehulprabh

Nov 10, 2012

नंदुरबार से बलसाणा पैदल संघ


पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. की निश्रा में नंदुरबार से बलसाणा तीर्थ का चार दिवसीय छहरी पालित पैदल संघ ता. 12.12.12 को प्रस्थान करेगा, जो 15 दिसम्बर को बलसाणा तीर्थ पर पहुँचेगा।
नंदुरबार निवासी श्री हरकचंदजी चंदनमलजी तातेड परिवार संघ का शुभ मुहूर्त प्राप्त करने के लिये 28 अक्टूबर को मुंबई में पूज्य गुरुदेवश्री की निश्रा में उपस्थित हुआ और निश्रा प्रदान करने व मुहूर्त प्रदान करने हेतु विनंती की। पूज्यश्री ने स्वीकृति प्रदान करते हुए मिगसर वदि 14 ता. 12 दिसम्बर का शुभ मुहूर्त प्रदान
किया।jahaj
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श्री जिनहरि विहार समिति के चुनाव संपन्न

पूज्य गुरूदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. की निश्रा में एवं समिति अध्यक्ष संघवी श्री विजयराजजी डोशी की अध्यक्षता में श्री जिनहरिविहार समिति, पालीताणा की बैठक हुई जिसमें लगभग 15 से अधिक ट्रस्टियों की उपस्थिति रही। श्री जिनहरि विहार धर्मशाला के कार्य पर परम संतोष व्यक्त किया गया। दिनों दिन हरि विहार की जाहोजलाली बढ रही है। यात्रिायों का आवागमन, उन्हें मिल रहा पूरा संतोष... यह समिति की पूंजी है।
साथ ही यहाँ बिराज रहे खरतरगच्छ संघ के समस्त साधु साध्वियों की वैयावच्च अत्यन्त मनोयोग से हो रही है, यह प्रसन्नता का विषय है।
निर्णय किया गया कि पीछे जो ज्ञान मंदिर बना है, उसका पूरा जीर्णोद्धार करवाया जाये। जिसमें विशाल भोजनशाला व कमरों का निर्माण करवाया जावें।
ट्रस्ट मंडल का कार्यकाल पूर्ण होने के कारण निवेदन किया गया कि आगामी तीन वर्षों के लिये नये ट्रस्ट मंडल का गठन किया जावे।
पूज्यश्री ने ट्रस्टियों से विचार विमर्श कर इस प्रकार ट्रस्ट मंडल की घोषणा की-
संघवी श्री विजयराजजी डोसी बैंगलोर- अध्यक्ष
श्री वीरेन्द्रकुमारजी मेहता चेन्नई- उपाध्यक्ष
संघवी श्री अशोककुमारजी भंसाली अहमदाबाद- उपाध्यक्ष
श्री बाबुलालजी लूणिया अहमदाबाद- महामंत्री
श्री बाबुलालजी लालन सिद्धपुर- मंत्री
श्री लक्ष्मीकांत पी. शाह भुज- मंत्री
श्री पुखराजजी तातेड अहमदाबाद- कोषाध्यक्ष
संघवी श्री भंवरलालजी मंडोवरा अहमदाबाद- सहकोषाध्यक्ष
ट्रस्टी
श्री कांतिलालजी रांका चेन्नई
संघवी श्री पुखराजजी छाजेड मुंबई
श्री घेवरचंदजी तातेड अहमदाबाद
श्री ज्ञानचंदजी गुलेच्छा कुनूर
श्रीमती पुष्पाजी ए. जैन मुंबई
श्री रतनलालजी बोहरा हाला वाले, अहमदाबाद
संघवी श्री कुशलराजजी गुलेच्छा बैंगलोर
श्री माणकचंदजी ललवानी अहमदाबाद
श्री जगदीशजी रांका अहमदाबाद
संघवी श्री बाबुलालजी मरडिया मुंबई
श्री जसराजजी छाजेड इचलकरंजी
श्री खीमराजजी बोहरा जोधपुर
श्री सुरेशजी कांकरिया रायपुर
श्री पदमचंदजी टाटिया चेन्नई
श्री बाबुलालजी छाजेड मुंबई
श्री बाबुलालजी बोथरा अहमदाबाद
श्री रणजीत गुलेच्छा चेन्नई
श्री प्रमोदकुमारजी चौपडा रायपुर

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KUMARPAL BHAI V. SHAHKUMARPAL BHAI V. SHAHKUMARPAL BHAI V. SHAHKUMARPAL BHAI V. SHAH

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चौथे दादा गुरूदेव की 399वीं पुण्यतिथि मनाई गई

चतुर्थ दादा गुरूदेव अकबर प्रतिबोधक श्री जिनचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की 399वीं पुण्यतिथि मुंबई महानगर में आसोज वदि 2 ता. 2 अक्टूबर 2012 को हर्षोल्लास के साथ मनाई गई।
इस उपलक्ष्य में प्रात: 9 बजे कान्ति मणि नगर कपोलवाडी में गुणानुवाद सभा का आयोजन किया गया। पूज्य गुरूदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म. भारत जैन महामंडल के विश्व मैत्री दिवस के सामूहिक कार्यक्रम में पधरना हुआ था। पूज्य मुनिराज श्री मनितप्रभसागरजी म.सा. ने दादा गुरूदेव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा- दादा गुरूदेव ने शिथिलाचार का विरोध करते हुए श्रमण संघ के आचार को सुविशुद्ध किया था। पू. साध्वी श्री श्रद्धान्जनाश्रीजी म.सा. ने गुरूदेव के विशिष्ट व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए श्रद्धा पुष्प समर्पित किये। मुमुक्षु कुमारी नीलिमा भंसाली ने गीतिका प्रस्तुत की।
प्रात: 10 बजे पूज्य मुनिराज श्री कुशलमुनिजी म.सा. की निश्रा में भायखला दादावाडी में दादा गुरूदेव की पूजा का भव्य आयोजन किया गया। पूजा के बाद स्वामिवात्सल्य का आयोजन किया गया।
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Oct 5, 2012

दुर्ग में तपस्या का ठाट

पूज्य गुरुदेव प्रज्ञापुरूष आचार्य भगवन्त श्री जिनकान्तिसागरसूरीश्वरजी म. सा. के शिष्य पूज्य ब्रह्मसर तीर्थोद्धारक मुनि श्री मनोज्ञसागरजी म.सा. पूज्य स्वाध्यायी मुनि श्री कल्पज्ञसागरजी म. पू. बाल मुनि श्री नयज्ञसागरजी म. ठाणा 3 का  दुर्ग नगर में ऐतिहासिक चातुर्मास चल रहा है।

पूज्यश्री के प्रवचन श्रवण करने के लिये बडी संख्या में श्रद्धालु उमडते हैं। विविध प्रकार की तपश्चर्याऐं हो रही है। तपस्या का तो कीर्तिमान स्थापित हुआ है।
पहले चरण में 19 आराध्कों ने सिद्धि तप की महान् तपस्या की। दूसरे चरण में 20 आराध्कों ने सिद्धि तप की आराध्ना की। साथ ही मासक्षमण, अट्ठाई, तेले, अक्षय  तप, समवशरण तप, कषाय विजय तप, मोक्ष दण्ड तप, स्वस्तिक तप, पंच परमेष्ठी नवकार तप, चौदह पूर्व तप आदि विविध तपस्या हुई है। साथ ही नेमिनाथ परमात्मा का जन्म कल्याणक अत्यन्त उल्लास के साथ मनाया गया। उपवास, आयंबिल एवं एकासणा की आराध्ना सामूहिक रूप से हुई। नौ दिवसीय नवग्रह पूजन विधान संपन्न हुआ। यह विधान इस क्षेत्र में पहली बार आयोजित किया गया। साथ ही पद्मावती पूजा महाविधन आदि का भी आयोजन किया गया।
प्रत्येक रविवार को बाल शिविर के माध्यम से बालकों ने लाभ उठाया। संस्कारों की मजबूती के लिये कवि श्री युगराज जैन द्वारा अब तो संभल के प्रदर्शन के साथ साथ धर्मिक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। रोजाना स्वाध्याय की कक्षा हुई।
द्वितीय चरण के सिद्धि तप के पारणे के अवसर पर वैशाली नगर भिलाई में चातुर्मासार्थ बिराजमान श्रमण संघ के प्रवर्तक श्री रतनमुनिजी महाराज का भी पदार्पण होगा। इस उपलक्ष्य में त्रिादिवसीय महोत्सव का आयोजन किया गया है।
ता. 7 अक्टूबर को सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा। ता. 8 को तपस्वियों का वरघोडा निकाला जायेगा। भजन संध्या में कुमारी प्राची जैन इन्दौर अपनी भक्ति संगीतमय प्रस्तुति देगी। ता. 9 को तपस्वियों का संघ द्वारा अभिनंदन किया जायेगा। तपस्वियों का सामूहिक पारणा होगा। श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ, दुर्ग के तत्वावधन में सिद्धि तप आराधक परिवार द्वारा सारा आयोजन किया जा रहा है।

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माध्वबाग में श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ परमात्मा के मंदिर में बिराजमान दादा गुरूदेव की चरणपादुकाओं के समक्ष ता. 15 सितम्बर को मणिधारी जिनचन्द्रसूरि की पुण्यतिथि के अवसर पर आरती का विधान किया गया। चतुर्विध संघ के साथ इकतीसे के पाठ के साथ साथ गुरूदेव की भक्ति की गई।


माध्वबाग में श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ परमात्मा के मंदिर में बिराजमान दादा गुरूदेव की चरणपादुकाओं के समक्ष ता. 15 सितम्बर को मणिधारी जिनचन्द्रसूरि की पुण्यतिथि के अवसर पर आरती का विधान किया गया। चतुर्विध संघ के साथ इकतीसे के पाठ के साथ साथ गुरूदेव की भक्ति की गई।jahaj mandir, maniprabh, mehulprabh

KUMARPAL BHAI V. SHAH

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भगवती सूत्र का वरघोडा

पर्व पर्युषण महापर्व की आराधना के पश्चात् पूज्य गुरूदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. द्वारा 45 आगमों की वांचना फरमाई जा रही है। इस आगम वांचना के अन्तर्गत भगवती सूत्र का वरघोडा निकाला गया। इसका लाभ सांचोर निवासी श्री जीवराजजी उकचंदजी श्रीश्रीश्रीमाल परिवार ने लिया। सकल संघ के साथ आगम की पधरामणी उनके निवास स्थान पर हुई। वहाँ आगम की स्तुति करने के उपरान्त आगम पूजा की गई। दूसरे दिन पूज्यश्री द्वारा भगवती सूत्र की वांचना व्याख्या के साथ की गई।
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KUMARPAL BHAI V. SHAH

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Oct 4, 2012

आसोज वदि 13 गर्भापहार कल्याणक


   ता. 13 अक्टूबर 2012 को परमात्मा महावीर का गर्भापहार कल्याणक है। परमात्मा महावीर का च्यवन कल्याणक देवानंदा की कुक्षि में हुआ था। 83 दिनों के बाद हरिणैगमेषी देव द्वारा परमात्मा महावीर के गर्भ को त्रिशला महारानी की कुक्षि में संस्थापित किया गया। वह दिन गर्भापहार कल्याणक दिन कहलाता है। कई लोग इस घटना को कल्याणक नहीं मानकर निंद्य अच्छेरा कहते हैं। अच्छेरा तो है पर वह निंद्य कैसे हो सकता है। क्योंकि उस रात्रि में त्रिशला महारानी ने चौदह महास्वप्न देखे थे। फिर कल्पसूत्र आदि आगमों में इस गर्भापहार कल्याणक का स्पष्ट उल्लेख है।

    इस दिन परमात्मा महावीर की विशेष रूप से पूजा, आराधना आदि करें।

jahaj mandir, maniprabh, mehulprabh

Oct 3, 2012

मणिधारी गुरूदेव की पुण्यतिथि मनाई गई

द्वितीय दादा गुरूदेव मणिधारी श्री जिनचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पुण्यतिथि पूज्य गुरूदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. आदि साधु साध्वी मंडल की पावन निश्रा में अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाई गई।
गुणानुवाद सभा, पूजा व महाआरती का आयोजन किया गया।
पूज्य गुरूदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने फरमाया- आज द्वितीय भाद्रपद वदि 14 का महान् पर्व है। इसी दिन दादा गुरूदेव का मात्र 26 वर्ष की उम्र में स्वर्गवास हुआ था। जिस वर्ष स्वर्गवास हुआ था, उस वर्ष दो भाद्रपद थे व उनका स्वर्गवास दूसरे भाद्रपद वदि 14 को हुआ था। वर्षों बाद यह अनूठा संयोग उपस्थित हुआ है।
पूज्यश्री ने फरमाया- जैन शासन के इतिहास-फलक पर मणिधारी दादा का नाम स्वर्णाक्षरों द्वारा अंकित है। मात्र 6 वर्ष की उम्र में दीक्षा ग्रहण कर 8 वर्ष की उम्र में आचार्य पद को प्राप्त करना, इतिहास की एक दुर्लभ घटना है। उस समय दादा गुरूदेव जिनदत्तसूरि के सैंकडों शिष्य थे। वे सभी चारित्रवान् व ज्ञानवान् थे। दीक्षा पर्याय में कई ज्येष्ठ मुनियों के होते हुए भी मात्र दो वर्ष के संयम-पर्याय वाले लघुवयी मुनि को आचार्य पद प्रदान कर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हुए गच्छाधीपति घोषित करना, उनकी योग्यता, उनके ज्ञान और निष्ठा का सूचक है।
शास्त्रों में उल्लेख है कि आचार्य पद किसी सामान्य योग्यता वाले मुनि को नहीं दिया जा सकता या मात्र दीक्षा पर्याय में ज्येष्ठ होने के कारण भी नहीं दिया जा सकता। गुरू भगवंत ही अपने शिष्य की विशिष्ट योग्यता के आधार पर निर्णय करते हैं।
उन्होंने कहा- निर्णय का अधिकार गुरू भगवंत को ही है। उस समय का श्रमण संघ व श्रावक संघ कितना विनयी और आज्ञाकारी होगा कि गुरू महाराज के इस निर्णय को अहोभाव से स्वीकार कर लिया।
उन्होंने कहा- जैन शासन के इतिहास में केवल दो महापुरूष ही ऐसे हुए हैं जिनके मस्तिष्क में मणि थी। एक तो मणिधारी दादा गुरूदेव और दूसरे अध्यात्म योगी श्रीमद् देवचन्द्रजी महाराज!
पूज्यश्री ने गुरूदेव के जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए श्रद्धांजली अर्पित की और प्रार्थना की कि उनकी कृपा दृष्टि संघ पर, गच्छ पर सदा सदा बरसती रहे।
इस अवसर पर साध्वी श्री श्रद्धांजनाश्रीजी म. ने भी गुणानुवाद किया। प्रवचन के तुरन्त बाद सकल संघ के साथ लालबाग माधवबाग स्थित श्री चिंतामणि पाश्र्वनाथ मंदिर पधारे जहाँ बिराजमान दादा गुरूदेव की भक्ति भावना के साथ आरती उतारी गई। पूजा पढाई गई।
शाम को मदनपाल महाराजा का वरघोडा निकाला गया। इस वरघोडे का प्रारंभ विल्सन स्ट्रीट स्थित सांचोर खरतरगच्छ भवन से हुआ जो खेतवाडी, सी.पी.टेंक होता हुआ कान्ति मणि नगर पहुँचा, जहाँ मदनपाल महाराजा द्वारा दादा गुरूदेव की भव्य आरती उतारी गई। भक्ति भावना का आयोजन हुआ। मदनपाल महाराजा बनने का लाभ श्री गोरधनमलजी प्रतापजी सेठिया धोरीमन्ना वालों ने एक लाख छत्तीस हजार इकतीसे के पाठ की बोली बोलकर लिया। कुमारी ज्वेल झवेरी ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इस महाआरती का आयोजन श्री मणिधारी युवा परिषद् मुंबई द्वारा किया गया।

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Sep 17, 2012

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Sep 14, 2012

48. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा

जटाशंकर स्कूल में पढता था। जाति का वह रबारी था। भेड बकरियों को चराता था। छोटे-से गाँव में वह रहता था।
अध्यापक ने गणित समझाते हुए क्लाँस में बच्चों से प्रश्न किया- बच्चों! मैं तुम्हें गणित का एक सवाल करता हूँ।
एक बाडा है। बाडे में पचास भेडें हैं। उनमें से एक भेड ने बाड कूदकर छलांग लगाली, तो बताओ बच्चों! उस बाडे में पीछे कितनी भेडें बची।
जटाशंकर ने हाथ उँचा किया। अध्यापक ने प्रेम से कहा- बताओ! कितनी भेडें बची।
जटाशंकर ने कहा- सर! एक भी नहीं!
अध्यापक ने लाल पीले होते हुए कहा- इतनी सी भी गणित नहीं आती। पचास में से एक भेड कम हुई तो पीछे उनपचास बचेगी न!
जटाशंकर ने कहा- यह आपकी गणित है। पर मैं गडरिया हूँ! भेडों को चराता हूँ! और भेडों की गणित मैं जानता हूँ! एक भेड ने छलांग लगायेगी और सारी भेडें उसके पीछे कूद पडेगी। वह न आगे देखेगी न पीछे! सर! उन्हें आपकी गणित से कोई लेना देना नहीं।
भेडों की अपनी गणित होती है। इसी कारण बिना सोचे अनुकरण की प्रवृत्ति को भेड चाल कहा जाता है। वहाँ अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं होता। अपनी सोच के आधार पर गुण दोष विचार कर जो निर्णय करता है, वही व्यक्ति अपने जीवन को सफल करता है।

Sep 6, 2012

47. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा


जटाशंकर दौडता दौडता अपने घर पहुँचा। घर वाले बडी देर से चिन्ता कर रहे थे। रोजाना शाम ठीक छह बजे घर आ जाने वाला जटाशंकर आज सात बजे तक भी नहीं पहुँचा था। वे बार बार बाहर आकर गली की ओर नजर टिकाये थे।
जब जटाशंकर को घर में हाँफते हुए प्रवेश करते देखा तो सभी ने एक साथ सवाल करने शुरू कर दिये। उसकी पत्नी तो बहुत नाराज हो रही थी।
उसने पूछा- कहाँ लगाई इतनी देर!
जटाशंकर ने कहा- भाग्यवती! थोडी धीरज धार! थोडी सांस लेने दे! फिर बताता हूँ कि क्या हुआ! तुम सुनोगी तो आनंद से उछल पडोगी! मुझ पर धन्यवाद की बारिश करोगी!
कुछ देर में पूर्ण स्वस्थता का अनुभव करने के बाद जटाशंकर ने कहा- आज तो मैंने पूरे पाँच रूपये बचाये है!
रूपये बचाने की बात सुनी तो जटाशंकर की कंजूस पत्नी के चेहरे पर आनंद तैरने लगा।
उसने कहा- जल्दी बताओ! कैसे बचाये!
जटाशंकर ने कहा- आज मैं आँफिस से जब निकला तो तय कर लिया कि आज रूपये बचाने हैं। इसलिये बस में नहीं बैठा! बस के पीछे दौडता हुआ आया हूँ। यदि बस में बैठता तो पाँच रूपये का टिकट लगता! टिकट लेने के बजाय मैं उसके पीछे दौडता रहा, हाँफता रहा और इस प्रकार पाँच रूपये बचा लिये। बोलो धन्यवाद दोगी कि नहीं!
जटाशंकर की पत्नी का मुखकमल खिल उठा! परन्तु पल भर के बाद नाराज होकर बोली- अजी! आप तो मूरख के मूरख ही रहे!
अरे! जब दौडना ही तो बस के पीछे क्यों दौडे! सिर्फ पाँच रूपये बचे! यदि टेक्सी के पीछे दौडते तो पचास रूपये बच जाते! जटाशंकर ने अपना माथा पीट लिया।
पाँच बचे, इसका सुख नहीं। पचास नहीं बचे, इसका दु:ख है। जबकि पाँच रूपये बचे, यह यथार्थ है.... पचास रूपये बचने की बात कल्पना है। यथार्थ को अस्वीकार कर काल्पनिक दु:ख के लिये जो रोते हैं, वे अपनी जिन्दगी व्यर्थ खोते हैं।

46. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा

जटाशंकर चाय पीने के लिये घटाशंकर की होटल पर पहुँचा था। थोडा आदत से लाचार था। हर काम में कमी निकालने का उसका स्वभाव था। उसके इस स्वभाव से सभी परेशान थे।
जहाँ खाना खाने जाता, वहाँ कम नमक या कम मिर्च की शिकायत करके पैसे कम देने का प्रयास करता!
घटाशंकर ने उसे चाय का कप प्रस्तुत किया। धीरे धीरे वह चाय पीता जा रहा था। और मानस में कोई नया बहाना खोजता जा रहा था।
पूरी चाय पीने के बाद वह क्रोध में फुंफकारते हुए

मुंबई में तपश्चर्या का कीर्तिमान

परम पूज्य गुरूदेव प्रज्ञापुरूष आचार्य देव श्री जिनकान्तिसागरसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य पूज्य गुरूदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा., पूज्य मुनि श्री मुक्तिप्रभसागरजी म. पूज्य मुनि श्री मनीषप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मयंकप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मनितप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मेहुलप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मैत्रीप्रभसागरजी म. ठाणा 7 एवं पूजनीया प्रखर व्याख्यात्री साध्वी श्री हेमप्रभाश्रीजी म.सा. की शिष्या पू. साध्वी श्री श्रद्धांजनाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री दीपमालाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री कल्याणमालाश्रीजी म. ठाणा 3 की पावन निश्रा में मुंबई महानगर में तपस्या का बहुत ही अनूठा वातावरण निर्मित हुआ है।

पूज्य महातपस्वी मुनि श्री मैत्रीप्रभसागरजी म. ने 35 उपवास का महान् तप किया। पूजनीया साध्वी श्री कल्याणमालाश्रीजी म. ने सिद्धि तप की तपस्या की। 


Sep 1, 2012

KUMARPAL BHAI V. SHAH

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50. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा


45. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा


जटाशंकर सिगरेट बहुत पीता था। उसकी पत्नी उसे बहुत समझाती थी। सिगरेट पीने से केंसर जैसी बीमारी हो जाती है! फेफडे गल जाते हैं! घर में थोडा धूआँ फैल जाय तो दीवार कितनी काली हो जाती है! फिर सिगरेट का धुआँ अपने पेट में डालने पर हमारा आन्तरिक शरीर कितना काला हो जाता होगा! धूऐं की वह जमी हुई परत मौत का कारण हो सकती है। इसलिये आपको सिगरेट बिल्कुल नहीं पीनी चाहिये।
एक दिन जटाशंकर की पत्नी अखबार पढ रही थी। उसमें सिगरेट से होने वाले नुकसानों की विस्तार से व्याख्या की गई थी। वह दौडी दौडी अपने पति के पास गई और हर्षित होती हुई कहने लगी- देखो! अखबार में क्या लिखा है? सिगरेट पीने से कितना नुकसान होता है?
जटाशंकर ने अखबार हाथ में लेते हुए कहा- कहाँ लिखा है! जरा देखूं तो सही!
उसने अखबार पढा! पत्नी सामने खडी उसके चेहरे के उतार चढाव देखती रही!
कुछ ही पलों के बाद जटाशंकर जोर से चिल्लाया- आज से बिल्कुल बंद! कल से बिल्कुल नहीं!
पत्नी अत्यन्त हर्षित होती हुई बोली- क्या कहा! कल से सिगरेट पीना बिल्कुल बंद! अरे वाह! मजा आ गया।
जटाशंकर चिल्लाते हुए बोला- अरी बेवकूफ! सिगरेट बंद का किसने कहा! मैं अखबार बंद करने का कह रहा हूँ!
सिगरेट के विरोध में ऐसा छापते हैं! ऐसे अखबार को हरगिज नहीं मंगाना है। न तुम पढोगी, न तुम मुझे बंद करने के लिये कहोगी!
अखबार बंद करने से सिगरेट की खराबी छिप नहीं जाती। विकारों को ही देशनिकाला देना होता है। यही जिन्दगी का सम्यक् परिवर्तन है।

39. नवप्रभात -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

आवेश में आना बहुत आसान है। आवेश में निर्णय करना भी बहुत आसान है। और आवेश में किये गये निर्णय को क्रियान्वित करने के लिये और ज्यादा आवेश में आना भी बहुत आसान है। किन्तु यह स्थिति आदमी को बहुत नुकसान पहुँचाती है।
क्योंकि आवेश का अर्थ होता है- किसी एक तरफ दिमाग का जड हो जाना! वह वही देखता है.. उसे उन क्षणों में और कुछ नजर नहीं आता। उसका दिमाग... उसके विचार.. बस! एक ही दिशा में दौडते हैं। दांये बांये, आगे पीछे की दृष्टि को जैसे ताला लग गया हो!
वह एकांगी हो जाता है। और इस कारण उसका निर्णय सर्वांगीण नहीं हो पाता। उसका निर्णय मात्र उस समय की घटना या परिस्थिति पर ही आधारित होता है। वह उसके परिणाम के बारे में विचार नहीं करता। उसका निर्णय परिणामलक्षी नहीं होता।
मुश्किल यह है कि निर्णय तो तत्काल के आधार पर लेता है, पर उसका निर्णय उसके पूरे जीवन को प्रभावित करता है। एक बार निर्णय होने के बाद उससे पीछा छुडाना आसान नहीं होता।
इसलिये शान्ति और आनंद का पहला सूत्र है- आवेश में मत आओ! लेकिन बहुत मुश्किल है इस सूत्र के आधार पर चलना। क्योंकि जीवन विभिन्न राहों से गुजरता है। बहुत मोड हैं इसमें! तब अपने आपको संभालना मुश्किल हो जाता है।
तब दूसरे सूत्र का उपयोग करो- आवेश में आना पडे तो आओ, मगर उन क्षणों में कोई निर्णय मत लो! उन क्षणों का निर्णय निश्चित ही तुम्हारे जीवन रस धार में जहर भरने का काम करेगा। वह जिंदगी भर की कमाई को पल भर में साफ कर देगा। इसलिये यदि शांति चाहते हो तो आवेश के क्षणों में निर्णय लेना टालो। लेकिन मन को समझाना बहुत मुश्किल है। शांति की स्थिति में निर्णय लेने में अत्यंत आलसी होता है। परन्तु आवेश के क्षणों में जल्दबाजी करता है।
तब तीसरे सूत्र का उपयोग करो- आवेश में लिये गये निर्णय को कभी भी क्रियान्वित मत करो! उसे रोक दो। मन को थोडा सोचने का मौका दो! थोडा उसे धीरज मिलने दो! तब निर्णय पर मन अपने आप पुनर्विचार करेगा और तब पायेगा कि अच्छा हुआ जो निर्णय को स्वर नहीं दिया अन्यथा बहुत अनर्थ हो जाता।
हालांकि मन आवेश के क्षणों में लिये गये निर्णय को क्रियान्वित करने के लिये बहुत उतावला हो जाता है। वह एक क्षण भी रूकना नहीं चाहता। वह न पीछे मुडकर देखना चाहता है... न आगे की रोशनी उसे नजर आती है।
उन क्षणों में अपने चित्त को समझाना है। जो व्यक्ति आवेश के क्षणों में कुछ पलों के लिये भी संभल जाता है, वह अपने जीवन की तस्वीर में मोहक रंग भर लेता है।

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Aug 30, 2012

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Thought

Thought
रात के अंधेरे से वही घबरातें हैं
जिनके दिन पाप के साथ कट जाते हैं
जो जीते हैं अपने विश्वासों के साथ
उनके चेहरे अंधेरे में भी चमकते
नजर आते हैं।

जिंदगी को मुश्किल बनाने वाले 7 अचेतन विचार

हम लोगों में से बहुत से जन अपने मन में चल रहे फ़ालतू के या अतार्किक विचारों से परेशान रहते हैं जिसका हमारे दैनिक जीवन और कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ये विचार सफल व्यक्ति को असफल व्यक्ति से अलग करते हैं। ये प्रेम को नफरत से और खुद को शांति से पृथक करते हैं। ये विचार सभी क्लेशों और दुखों की जड़ हैं क्योंकि अचेतन एवं अतार्किक विचारधारा ही सभी दुखों को जन्म देती है।

मैं ऐसे 7 अतार्किक व अचेतन विचारों पर कुछ दृष्टि डालूँगा और आशा करता हूँ कि आपको इस विवेचन से लाभ होगा।

1. यदि कोई मेरी आलोचना कर रहा है तो मुझमें अवश्य कोई दोष होगा।
    लोग एक-दूसरे की अनेक कारणों से आलोचना करते हैं। यदि कोई आपकी आलोचना कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि आपमें वाकई कोई दोष या कमी है। आलोचना का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि आपके आलोचक आपसे कुछ भिन्न विचार रखते हों। यदि ऐसा है तो यह भी संभव है कि उनके विचार वाकई बेहतर और शानदार हों। यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि बिना किसी मत-वैभिन्य के यह दुनिया बड़ी अजीब जगह बन जायेगी।
2. मुझे अपनी खुशी के लिए अपने शुभचिंतकों की सुझाई राह पर चलना चाहिए।
    बहुत से लोगों को जीवन में कभी-न-कभी ऐसा विचार आता है हांलांकि यह विचार तब घातक बन जाता है जब यह मन के सुप्त कोनों में जाकर अटक जाता है और विचलित करता रहता है। यह तय है कि आप हर किसी को हर समय खुश नहीं कर सकते। इसलिए ऐसा करने का प्रयास करने में कोई सार नहीं है। यदि आप खुश रहते हों या खुश रहना चाहते हों तो अपने ही दिल की सुनें। दूसरों के हिसाब से जिंदगी जीने में कोई तुक नहीं है पर आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आपके क्रियाकलापों से किसी को कष्ट न हो। दूसरों की बातों पर ध्यान देना अच्छी बात है पर उन्हें खुश और संतुष्ट करने के लिए यदि आप हद से ज्यादा प्रयास करेंगे तो आपको ही तकलीफ़ होगी।
3. यदि मुझे किसी काम को कर लेने में यकीन नहीं होगा तो मैं उसे शुरू ही नहीं करूंगा।
    इस विचार से भी बहुत से लोग ग्रस्त दिखते हैं। जीवन में नई चीजें करते रहना- बढ़ने और विकसित होने का सबसे आजमाया हुआ तरीका है। इससे व्यक्ति को न केवल दूसरों के बारे में बल्कि स्वयं को भी जानने का अवसर मिलता है। हर आदमी हर काम में माहिर नहीं हो सकता पर इसका मतलब यह नहीं है कि आपको केवल वही काम हाथ में लेने चाहिए जो आप पहले कभी कर चुके हैं। वैसे भी, आपने हर काम कभी-न-कभी तो पहली बार किया ही था।
4. यदि मेरी जिंदगी मेरे मुताबिक नहीं चली तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है।
    मैं कुछ कहूं? सारी गलती आपकी है। इससे आप बुरे शख्स नहीं बन जाते और इससे यह भी साबित नहीं होता कि आप असफल व्यक्ति  हैं। आपका अपने विचारों पर नियंत्रण है इसलिए अपने कर्मों के लिए भी आप ही जवाबदेह हैं। आपके विचार और कर्म ही आपके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। यदि आप अपने जीवन में चल रही गड़बड़ियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराएंगे तो मैं यह समझूंगा कि आपका जीवन वाकई दूसरों के हाथों में ही था। उनके हाथों से अपना जीवन वापस ले लें और अपने विचारों एवं कर्मों के प्रति जवाबदेह बनें।
5. मैं सभी लोगों से कमतर हूँ।
    ऐसा आपको लगता है पर यह सच नहीं है। आपमें वे काबिलियत हैं जिन्हें कोई छू भी नहीं सकता और दूसरों में वे योग्यताएं हैं जिन्हें आप पा नहीं सकते। ये दोनों ही बातें सच हैं। अपनी शत्तिफयों और योग्यताओं को पहचानने से आपमें आत्मविश्वास आएगा और दूसरों की सामर्थ्य और कुशलताओं को पहचानने से उनके भीतर आत्मविश्वास जगेगा। आप किसी से भी कमतर नहीं हैं पर ऐसे बहुत से काम हो सकते हैं जिन्हें दूसरे लोग वाकई कई कारणों से आपसे बेहतर कर सकते हों इसलिए अपने दिल को छोटा न करें और स्वयं को विकसित करने के लिए सदैव प्रयासरत रहें।
6. मुझमें जरूर कोई कमी होगी तभी मुझे ठुकरा दिया गया।
    यह किसी बात का हद से ज्यादा सामान्यीकरण कर देने जैसा है और ऐसा उन लोगों के साथ अक्सर होता है जो किसी के साथ संबंध बनाना चाहते हैं। एक या दो बार ऐसा हो जाता है तो उन्हें लगने लगता है कि ऐसा हमेशा होता रहेगा और उन्हें कभी सच्चा प्यार नहीं मिल पायेगा। प्यार के मसले में लोग सामने वाले को कई कारणों से ठुकरा देते हैं और ऐसा हर कोई करता है। इससे यह साबित नहीं होता कि आप प्यार के लायक नहीं हैं बल्कि यह कि आपका उस व्यक्ति के विचारों या उम्मीदों से मेल नहीं बैठता। बस इतना ही।
7. यदि मैं खुश रहूँगा तो मेरी ख़ुशियों को नजर लग जायेगी।
    यह बहुत ही बेवकूफी भरी बात है। आपकी जिंदगी को भी ख़ुशियों की दरकार है। आपका अतीत बीत चुका है। यदि आपके अतीत के काले साए अभी भी आपकी ख़ुशियों के आड़े आ रहे हों तो आपको इस बारे में किसी अनुभवी और ज्ञानी व्यत्तिफ से खुलकर बात करनी चाहिए। अपने वर्तमान और भविष्य को अतीत की कालिख से दूर रखें अन्यथा आपका भावी जीवन उनसे दूषित हो जाएगा और आप कभी भी खुश नहीं रह पायेंगे। कोई भी व्यक्ति किसी की ख़ुशियों को नजर नहीं लगा सकता।
इन अचेतन विचारों से कैसे उबरें?
    यह बहुत आसान है। जब भी आपके मन में कोई अचेतन या अतार्किक विचार आये तो आप उसे लपक लें और अपनी विचार प्रक्रिया का अन्वेषण करते हुए उसमें कुछ मामूली फेरबदल कर दें। कुछ इस तरह- सोचिये कि आप किसी शानदार दिन अपनी प्रिय शर्ट पहनकर जा रहे हैं और एक चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। ऐसे में आप सोचेंगे:
    ये हमेशा मेरे साथ ही क्यों होता है?
इसकी जगह आप यह कहें-
    अरे यार अब तो इस शर्ट को धोना पड़ेगा।
    अपनी बातों में हमेशा को खोजें, जो कि अमूमन सही जगह प्रयुक्त नहीं होता। यदि वाकई आपके ऊपर चिड़ियाँ हमेशा बीट करती रहती तो कल्पना कीजिये आप कैसे दिखते। अब से आप इस तरह की बातें करने से परहेज करें। और उदाहरण:
    मैं हमेशा ही बारिश में फंस जाता हूँ। यदि यह सच होता तो आप इंसान नहीं बल्कि मछली होते।
    $ मुझे पार्किंग की जगह कभी नहीं मिलती।य् ;यदि यह सच होता तो आप अपनी गाड़ी के भीतर ही कैद सुबह से शाम तक घूमते रहते।
    $ मैं नहीं कर सकता उदाहरण: मैं दो मील भी पैदल नहीं चल सकता। कभी कोशिश की?

    $ मुझसे करते नहीं बनता उदाहरण: मुझसे कई लोगों के सामने बोलते नहीं बनता। ऐसे में आप अपने परिजनों, दोस्तों याने कुछ लोगों के सामने ही बोलते हैं।
    $ कितनी बुरी बात है कि’’ उदाहरण: कितनी बुरी बात है कि सुबह से बारिश हो रही हैं ;छोड़िये भी, इतनी भी बुरी बात नहीं है।
    इसी तरह के और भी अचेतन व अतार्किक विचार हो सकते हैं जिनकी हमें पहचान करनी हैं और समय रहते ही उन्हें सकारात्मक विचार से बदल देना हैं। मुझे आशा है कि इस लेख से आपको अपने जीवन में बदलाव, रूपांतरण लाने के कुछ सूत्र अवश्य मिले होंगे। कोई भी बदलाव सहज नहीं होता बल्कि उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है। यदि लेख में लिखी बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद आप उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे तो आपको सफलता जरूर मिलेगी।

Aug 28, 2012

44 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

जटाशंकर के घर कुछ काम था। एक बडा गड्ढा खुदवाना था। उसने मजदूर रख लिया और काम सौंप कर अपने काम पर चला गया। उसने सोचा था कि जब मैं शाम घर पर जाउँगा, तब तक काम पूरा हो ही जायेगा। शाम जब घर पर लौटा तो उसने देखा कि मजदूर ने गड्ढा तो बिल्कुल ही नहीं खोदा है।
उसने डाँटते हुए कहा- पूरा दिन बेकार कर दिया... तुमने कोई काम ही नहीं किया! क्या करते रहे दिन भर!
मजदूर ने जवाब दिया- हुजूर! गड्ढा खोदने का काम मैं शुरू करने ही वाला था कि अचानक एक प्रश्न दिमाग में उपस्थित हो गया। आपने गड्ढा खोदने का तो आदेश दे दिया पर जाते जाते यह तो बताया ही नहीं कि गड्ढे में से निकलने वाली मिट्टी कहाँ डालनी है? इसलिये मैं काम शुरू नहीं कर पाया और आपका इन्तजार करता रहा।
जटाशंकर ने कहा- इसमें सोचने की क्या बात थी? अरे इसके पास में एक और गड्ढा खोद कर उसमें मिट्टी डाल देता!
उधर से गुजरने वाले लोग जटाशंकर की इस बात पर मुस्कुरा उठे।
हमारा जीवन भी ऐसा ही है। एक गड्ढे को खोदने के लिये दूसरा गड्ढा खोदते हैं फिर उसकी मिट्टी डालने के लिये तीसरा गड्ढा खोदते हैं। यह काम कभी समाप्त ही नहीं होता।
संसार की हमारी क्रियाऐं ऐसी ही है। हर जीवन नये जीवन का कारण बनता है। साध्ाक तो वह है जो जीवन अर्थात् जन्म मरण की इतिश्री करता है।

38. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

काला, घना काजल से भी गहरा अंधेरा है! दांये हाथ को बांये हाथ का पता नहीं चल पा रहा है, इतना अंधेरा है। और मुश्किल यह है कि यह द्रव्य अंधेरा नहीं है। द्रव्य के अंधेरे को मिटाने के लिये एक दीया काफी है। एक दीपक की रोशनी हमारे कक्ष में उजाला भर सकती है।
यह अंतर का अंधेरा है। आँखों में रोशनी होने पर भी अंधेरा है। सूरज के प्रकाश में भी अंधेरा है। किधर चलें, कहाँ चलें, किधर जायें, क्या करें..... आदि आदि प्रश्न तो बहुतेरे हैं, पर समाधान नहीं है। अंतर के अंधेरे से जूझना भी कोई आसान काम नहीं है। जितना जितना उस बारे में सोचता हूँ, उतना ही ज्यादा मैं उसमें उलझता जाता हूँ।
बैठा रहता हूँ माथे पर चिंता की लकीरें लिये! पडा रहता हूँ शून्य चेहरे के साथ! उदास होकर बैठ जाता हूँ हाथ पर हाथ धर कर! रोता रहता हूँ अपने को, अपनी तकदीर को!
लेकिन मेरे भैया! यों हाथ पर हाथ धरके बैठने से क्या होगा? रोने से रोशनी तो नहीं मिलेगी न!
इसलिये उठो! जागो! पुरूषार्थ करो!
रोओ मत! थोडा हँसो! अपने भाग्य पर हँसो! और अपनी हँसी से यह दिखाओ कि मैं तुमसे हार मानने वाला नहीं है। अपनी हँसी से पुरूषार्थ का भी स्वागत करो।
अपने बिगडे भाग्य पर रोने के बजाय पुरूषार्थ में प्रचंडता लाओ! और पुरूषार्थ के बल पर भाग्य को अंगूठा दिखाने का प्रयास करो। पुरूषार्थ से भाग्य की दिशा बदल दो। तुम्हारे जीवन में हजारों सूर्यों की रोशनी उतर आयेगी।
तुम जड नहीं हो, जो पडे रहो।
तुम चैतन्य हो, जो अनंत शक्ति का स्रोत है। बस! उस शक्ति का परिचय करना है, उसे प्रकट करने का साहस करना है।
बांसुरी भी पडे पडे नहीं बजा करती! वीणा के तार भी अपने आप नहीं झनझनाते! मृदंग में से माधुर्य-रसगंगा भी थाप खाकर ही बहने लगती है।
तुममें शक्ति है, उसे अभिव्यक्ति देनी है। बीज को जलवायु देनी है ताकि वह विराट् वृक्ष का रूप पा सके।

Aug 24, 2012

37. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

अपने घर की खोज हम लम्बे समय से कर रहे हैं। पर मिला नहीं है। इसलिये नहीं कि दूरी बहुत है। दूरी तो जरा भी नहीं है। दूरी तो मात्र इतनी है कि देखा कि पाया!
एक कदम आगे बढाया कि मंज़िल मिली!
हाथ लंबा किया कि द्वार पाया!
दूरी अधिक नहीं है, फिर भी अभी तक अपना घर मिला नहीं है। इसलिये भी नहीं कि हम चले नहीं है। हम बहुत चले हैं। और इतना चले हैं कि थक कर चूर हो गये हैं। गोल गोल चक्कर न मालूम कितने काटे हैं। यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ भागने, दौडने में जिन्दगियाँ पूरी हो गई है। जिसे खोजने चले हैं, उसे पाने के लिये तो एक जिंदगी ही पर्याप्त है। यह विडम्बना ही है कि जिसे एक ही जिंदगी में, एक ही जिंदगी से पाया जा सकता है, उसे बहुत सारी जिन्दगियाँ खोने पर भी नहीं पा सके हैं।
चले बहुत हैं, फिर भी नहीं पाया है तो इसका अर्थ है कि कहीं कोई समस्या है! कहीं कोई गलती हो रही है।
दिशा भी सही है। चले भी हम सही दिशा में है। किन्तु बीच में अटक गये हैं। थोडा भटक गये हैं। क्योंकि बीच में बहकाने वाले बहुत दृश्य है। सुन्दर बगीचे हैं। कलकल बहते झरणे हैं।
आँखों को सुकून दें, ऐसे दृश्य हैं।
कानों में रस घोल दे, ऐसा संगीत है।
जीभ को स्वाद दें, ऐसे पदार्थ हैं।
पाँव वहीं टिक जाय, ऐसे महंगे कालीन है।
तिजोरी में सजाने का मन हो जाय, ऐसे रत्न है।
और बस! आँख टिकी कि मन भटका! और मन भटका कि मंज़िल दूर हुई। सारा पुरूषार्थ व्यर्थ हुआ। किनारे पहुँची नैया फिर मंझधार में झकोले खाने लगी। अपना घर फिर अपने से दूर हुआ।
बहुत भटके हो, अब अपने घर को याद करो। याद किया नहीं कि घर हाजिर हुआ नहीं। बस थोडा मन लगाकर याद करने की जरूरत है। थोडी देर अपने मन को उस याद में डूबोने की जरूरत है।

43. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

जटाशंकर नौकरी की तलाश में घूम रहा था। वह समझ रहा था कि यदि मुझे शीघ्र ही नौकरी नहीं मिली तो घर का चूल्हा जलना बंद हो जायेगा।
चलते चलते वह एक सर्कस वाले के पास पहुँचा। सर्कस के मैनेजर ने कहा- मैं तुम्हें एक काम दे सकता हूँ। रूपये तुम्हें पूरे मिलेंगे।
जटाशंकर ने कहा- हुजूर! आप जो भी काम सौंपेंगे, मैं करने के लिये तैयार हूँ। बताइये मुझे क्या काम करना होगा?
मैनेजर ने कहा- एक शेर की हमारे पास कमी हो गई है। तुम्हें शेर की खाल पहन कर शेर का अभिनय करना है। बस! थोड़ी देर का काम है। थोडा चीखना है! दहाड लगानी है! आधे घंटे का काम है। पिंजरे में घूमना है। दर्शकों का मनोरंजन हो जायेगा। और तुम्हें पैसे मिल जायेंगे। महीने भर तो यह काम करो, फिर बाद में देखेंगे।
जटाशंकर थोड़ा हैरान हुआ कि शेर का काम मुझे करना पडेगा! पर सोचा कि पैसे तो मिल ही रहे हैं न! फिर क्या चिंता!
दूसरे दिन से समय पर उसने पिंजरे में बैठकर शेर की खाल पहन ली। दर्शकों का जोरदार मनोरंजन किया। नकली शेर तो ज्यादा ही दहाडता है। उसने जो दहाड लगाई, जो उछला, कूदा, लोग आनंदित हो गये।
मैनेजर ने प्रसन्न होकर उसे पुरस्कृत भी किया।
यह क्रम लगातार चलता ही रहा।
एक दिन वह दर्शकों के बीच जालियों से बने पिंजरे में दहाड लगा रहा था कि तभी उस पिंजरे में दूसरे शेर ने प्रवेश किया। असल में उस दिन दो शेरों के प्रदर्शन का कार्यक्रम था।
दूसरा शेर दांत निकाल कर, आँखें तरेर कर जोरदार दहाड रहा था।
दूसरे असली शेर को देखकर नकली शेर मिस्टर जटाशंकर डर गया। उसने विचार किया- लोग मुझे असली शेर समझ सकते हैं पर यह असली शेर तो मुझे सूंघते ही समझ जायेगा कि मैं शेर नहीं बल्कि आदमी हूँ।
उसकी तो मारे डर के घिग्घी बंध गई। उसने तो तुरंत आव देखा न ताव, छलांग लगाई और शेर की खाल उतार कर चारों ओर लगी जालियों पर तेजी से चढ़ गया। लोग चक्कर में पडे कि यह शेर आदमी कैसे हो गया!
जटाशंकर तो जाली पर चढकर जोर जोर से ‘बचाओ बचाओ चीखने लगा।
इतने में दूसरे शेर ने शेर की खाल थोडी सी उतारते हुए कहा- भैया! डर मत! मैं शेर नहीं हूँ।
लोग यह तमाशा देखकर दोहरे हो गये कि यहाँ तो दोनों ही शेर नकली है।
असली असली ही होता है... और नकली नकली! नकली ज्यादा टिकाउ नहीं हो सकता। उसकी तो पोल खुल ही जाती है। हमें अपना जीवन असलियत के आधार पर जीना है। नकली जीवन मात्र कर्मबंधन का ही कारण है।

Aug 17, 2012

36. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


अपने अतीत का जो व्यक्ति अनुभव कर लेता है, वह वर्तमान में जीना सीख लेता है। वर्तमान कुछ अलग नहीं है। वर्तमान की हर प्रक्रिया मेरे अतीत का हिस्सा बन चुकी है। और एक बार नहीं, बार बार मैं उसे जी चुका हूँ।
मुश्किल यह है कि मुझे उसका स्मरण नहीं है। मैं उस अतीत की यथार्थ कल्पना तो कर सकता हूँ। पर उसे पूर्ण रूप से स्मरण नहीं कर पाता। इस कारण मैं अपने आपको बहुत छोटा बनाता हूँ। मैंने अपने जीवन को कुऐं की भांति संकुचित कर लिया है। वही अपना प्रतीत होता है। उस कुऐं से बाहर के हिस्से को मैं अपना नहीं मानता। क्योंकि यह मुझे ख्याल ही नहीं है कि वह बाहर का हिस्सा भी कभी मेरा रह चुका है।
अतीत में छलांग लगाना अध्यात्म की पहली शुरूआत है। अतीत को जाने बिना मैं वर्तमान को समग्रता से समझ नहीं पाता। और वर्तमान को जाने बिना कोई भविष्य नहीं है। सच तो यह है कि भविष्य कुछ अलग है भी नहीं, वर्तमान ही मेरा भविष्य है।
अपने अतीत को जानने का अर्थ है- अतीत में मैं कहाँ था, मैं क्या था, इसे जान लेना। वह अतीत किसी और का नहीं है, मेरा अपना है। और अतीत होने से वह पराया नहीं हो जाता। उसका अपनत्व मिटा नहीं है। मात्र अतीत हुआ है।
यदि अतीत होने से उसे अपना मानना छोड देंगे तो कुछ जी ही नहीं पायेंगे। क्योंकि अतीत होने की प्रक्रिया प्रतिक्षण चल रही है। फिर तो अपना कुछ रहेगा ही नहीं। इस जन्म के अतीत को ही अपना नहीं मानना है, अपितु पूर्वजन्मों के संपूर्ण अतीत को अपना अतीत मानना है।
यह भाव प्रकृति के हर अंश से जोड देगा, क्योंकि इस पृथ्वी पर कोई ऐसा पदार्थ नहीं है, कोई ऐसा आकार नहीं है, कोई ऐसी स्थिति नहीं है, जो कभी न कभी अतीत न रहा हो। मेरी चेतना इस धरती के हर अंश से गुजर चुकी है। तो फिर पूरी पृथ्वी अपनी है। और अपनत्व को थोडा और विस्तार देकर एकाकार हो जाना है।
हर पदार्थ मेरा है और हर पदार्थ मैं हूँ।
पेड पौधे, जीव जन्तु सब में मैं हूँ।
यह अनुभव हमें वर्तमान में जीना सिखाता है। जब सब में मैं ही हूँ, तो उसके प्रति मेरा व्यवहार वैसा ही होना चाहिये, जैसा मैं अपने साथ करता हूँ।
फिर कोई पराया नहीं रहता, फिर कोई शत्रु नहीं रहता।

42. जटाशंकर

जटाशंकर परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था। अपना कार्ड लेकर मुँह लटका कर रोता हुआ जब घर पहुँचा तो पिताजी ने रोने का कारण पूछा- हाथ में रखा प्रगति पत्र आगे करते हुए कहा- मैं फेल हो गया हूँ। इसलिये रो रहा हूँ।
पिताजी को भी क्रोध तो बहुत आया। साल भर गँवा दिया। यदि मेहनत करता तो निश्चित ही पास हो जाता। इधर उधर घूमता रहा। पढाई की नहीं, तो फेल तो होओगे।
पर सोचा- मेरा लडका वैसे ही उदास है। रो रहा है। यदि मैंने भी क्रोध में इसे डाँटना प्रारंभ कर दिया तो पता नहीं यह क्या कर बैठेगा? कहीं उल्टी सीधी हरकत कर दी तो मैं अपने बेटे से हाथ खो बैठूंगा।
इसलिये सांत्वना देते हुए पिताजी ने कहा- बेटा जटाशंकर! रो मत! तुम्हारे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। इसलिये धीरज धर।
सुनते ही जटाशंकर ने अपना रोना बंद कर दिया और मुस्कुराते हुए कहा- पिताजी! मैं इस बात पर बहुत प्रसन्न हूँ कि मेरे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। अच्छा हुआ जो मैंने मेहनत पूर्वक पढाई नहीं की। यदि करता तो भी फेल हो जाता और इस प्रकार मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाती, मिट्टी में मिल जाती।
मेहनत न करने का दोष भाग्य पर नहीं ढाला जा सकता। भाग्य तो पुरूषार्थ का ही परिणाम है। मेहनत से जी चुराने वाला सदा अनुत्तीर्ण होता है। और दोष अपने आलस्य को नहीं, बल्कि भाग्य को देकर राजी होता है।

Aug 16, 2012

35. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


जीवन सीधी लकीर नहीं है। इसकी पटरी में न जाने कितने ही उल्टे सीधे, दांये बांये मोड बिछे है। मोड मिलने के बाद ही हमें उसका पता चलता है! पहले खबर हो जाय, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
बहुत बार तो ऐसा होता है कि मोड गुजर जाने के बाद ही हमें पता चलता है कि हम किसी मोड से गुजरे हैं। और बहुत बार ऐसा भी होता है कि मोड गुजर जाने के बाद भी हमें पता नहीं चलता कि हम किसी मोड से गुजरे हैं।
भले हमें विभिन्न मोडों से गुजरना पडे पर सर्चलाइट तो एक ही पर्याप्त होती है। ऐसा तो होता नहीं कि दांये जाने के लिये टोर्च  अलग चाहिये और बांये जाना हो तो टाँर्च अलग किस्म की चाहिये। क्योंकि अंतर मात्र दिशा का है। न मुझमें अंतर हुआ है, न राह पर रोशनी डालने वाले में!
इस कारण जीवन एक निर्णय से नहीं चलता। विभिन्न परिस्थितियों में परस्पर विरोधी निर्णय भी लेने होते हैं। कभी प्यार से पुचकारना होता है तो कभी लाल आँखें करते हुए डांटना भी होता है। कभी लेने में आनंद होता है तो कभी देने में भी आनंद का अनुभव होता है। दिखने में भले निर्णय अलग अलग प्रतीत होते हों, पर अन्तर में उनका यथार्थ, निहितार्थ, फलितार्थ एक ही होता है। पुचकारना भी उसी लिये था जिसके लिये डांटना था।
हमें परिस्थितियाँ देख कर निर्णय करना होता है तो परिस्थितियों के आधार पर निर्णय बदलना भी होता है। कभी कभी एक जैसी स्थितियों में भी भिन्न निर्णय करने होते हैं। क्योंकि मुख्यता स्थितियों या परिस्थितियों की नहीं है। मुख्यता है निर्णय की! निर्णय के आधार की! निर्णय के परिणाम की!
परिस्थिति केवल वर्तमान का बोध कराती है। जबकि निर्णय करते वक्त हमें केवल वर्तमान ही देखना नहीं होता। अपनी चकोर आँखों को अतीत में भी भेजना होता है तो आँखें बंद करके भविष्य के परिणाम की भी कल्पना करनी होती है।
निर्णय हमेशा वर्तमान में, वर्तमान के लिये होता है। पर जो तीनों कालों को टटोल कर, तीनों कालों में उसके परिणाम के सुखद किंवा दुखद स्पर्श का अनुभव कर निर्णय करता है, वह जीतता है। विजय की यही परिभाषा है।

Aug 10, 2012

41. जटाशंकर

जटाशंकर परमात्मा के मंदिर में पहुँचा था। चावल के स्वस्तिक की रचना करने के बाद उसने अपनी जेब में से एक अठन्नी निकाली और अच्छी तरह निरख कर भंडार में डाल दी। एक लडका उसे देख रहा था।
उसने जटाशंकर से कहा- सेठजी! यह तो खोटी अठन्नी है। भगवान के पास भी ऐसा छल कपट करते हो! मंदिर में खोटी अठन्नी चढाते हो!
जटाशंकर ने कहा- अरे! तुम्हें पता नहीं है। चिलातीपुत्र, इलायचीकुमार, दृढ़प्रहारी जैसे खोटे लोग भी परमात्मा की शरण को प्राप्त कर सच्चे हो गये थे... तिर गये थे.... तो क्या मेरी खोटी अठन्नी परमात्मा की शरण को पाकर सच्ची नहीं बन जायेगी!
वह लडका तो देखता ही रह गया।
अपने तर्क के आधार पर परमात्मा के मंदिर को भी अपने छल कपट का हिस्सा बनाते हैं। और अपनी बुद्धि पर इतराते हैं। यह स्वस्थ मानसिकता नहीं है।

34. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

34.  नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.
जीवन को हमने दु:खमय बना दिया है। दु:खमय है नहीं, पर सुख की अजीब व्याख्याओं के कारण वैसा हो गया है। हम अपनी ही व्याख्याओं के जाल में फँस गये हैं। जिस जाल में फँसे हैं, उस जाल को हमने ही अपने विचारों और व्याख्याओं से बुना है। इस कारण किसी और को दोष दिया भी नहीं जा सकता। और इस कारण हम अपने ही अन्तर में कुलबुलाते हैं।
हमने अपने जीवन के बारे में एक मानचित्र अपने मानस में स्थिर कर लिया है। और उस मानचित्र में उन्हें बिठा दिया है हमने उन पदार्थों को, परिस्थितियों को, जिनका मेरे साथ कोई वास्ता नहीं है।
जिंदगी भर उस मानचित्र को देखते रहें, उस पर लकीरें खींचते रहें, बनाते रहें, बिगाडते रहें, बदलते रहें, परिवर्तन कुछ नहीं होना। परिवर्तन की आशा और आकांक्षा में जिंदगी पूरी हो जाती है, मानचित्र वैसा ही मुस्कुराता रहता है। फिर वही मानचित्र अगली पीढी के हाथ आ जाता है, वह भी उस धोखे में उलझ कर अपनी जिंदगी गँवा देता है।
हमने अपने मानचित्र में लकीर खींच दी है कि धन आयेगा तो सुख होगा! कुछ समय बाद लकीर बदलते हैं कि इतना धन आयेगा तो सुख होगा।
बदलते समय के साथ यह लकीर बदलती जाती है। इसकी सीमाऐं विस्तृत होती जाती है। आकांक्षा की उस लकीर तक कोई पहुँच ही नहीं पाता। और इस कारण उसे सुख मिल नहीं पाता। एक जिंदगी तो क्या सैंकडों हजारों जिन्दगियाँ क़ुर्बान कर दे, तो भी उस लकीर तक पहुँच नहीं पाता। क्योंकि लकीर स्थिर नहीं है।
अपने मानचित्र में दूसरी लकीर खींचता है- अभी शादी नहीं हुई, इसलिये सुख नहीं है। जब शादी होने के बाद भी सुख नहीं मिलता तो सुख का आधार पुत्र को बनाता है। आधार बदलते जाते हैं। क्योंकि आधार उन्हें बनाता है, जो नहीं है। और इस जगत में ‘है से ‘नहीं है सदैव ज्यादा होता है। वह अधिक है जो नहीं है। तो जो नहीं है, वह कभी भी पूर्ण रूप से है हो नहीं सकता। और इस प्रकार सुख मिल नहीं सकता। सुखी हो नहीं सकता। वह दु:ख में ही अपने जीवन को समाप्त कर डालता है।
सुखी होने का मंत्र एक ही है- सुख का आधार बाहर मत बनाओ। बाहर के द्रव्यों, परिस्थितियों को सुख का कारण मत मानो। अपने मानचित्र में बाहर की लकीरें मत खींचो। जीवन परम आनन्दमय हो जायेगा।

Aug 8, 2012

33. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


एक लघु कथा पढी थी।
एक आदमी सुबह ही सुबह एक लोटे में छास भर कर अपने घर की ओर आ रहा था। रास्ते में उसका दोस्त मिला। उसके पास एक बडे पात्र में दूध था।
उसने कहा- मेरे पास दूध ज्यादा है, थोडा तुम ले लो!
उसने कहा- मुझे भी दूध चाहिये। लाओ, मेरे इस लोटे में डाल दो।
वह दूध उसके लोटे में डाल ही रहा था कि उसकी निगाहें लोटे के भीतर पडी। देखा तो कहा- भैया! इसमें तो छास दिखाई दे रही है। पहले लोटे को खाली करके धो डालो, बाद में दूध डालूंगा।
उसने कहा- नहीं! मुझे छास बहुत प्रिय है। मैं इसका त्याग नहीं कर सकता। मुझे छास भी चाहिये और दूध भी चाहिये। तुम इसी में डाल दो। लोटा आधा खाली है। इतना दूध डाल दो।
उसने कहा- यह मूर्खता की बात है। यदि छास में दूध डाल दिया गया तो दूध भी बेकार हो जायेगा।
उसने कहा- जो होना हो, पर दूध तो इसी में डालना पडेगा। मैं खाली नहीं करूँगा।
वह अपना दूध लेकर रवाना हो गया।
यह कहानी व्यावहारिक जगत में घटी या नहीं, पता नहीं। परन्तु आध्यात्मिक जगत के लिये पूर्णत: सार्थक है।
पीना है दूध तो छास का त्याग करना ही पडेगा! हमें दूध पसंद है। उसे पाना भी चाहते हैं। पाने के बाद पीना भी चाहते हैं। परन्तु उसके अद्भुत स्वाद का हमें पूर्ण अनुभव नहीं है। सुना है बहुत उसके स्वाद के बारे में! पर निज-अनुभव के अभाव में निर्णय नहीं हो पा रहा है।
छास तो सदैव मिली है। इस कारण छास के स्वाद का पता है। अनादि काल से मिलने के कारण उससे दोस्ती भी हो गई है। छास की खटास में भी मिठास के अनुभव की आदत पड गई है। इस कारण वही अच्छी लगती है।
यह छास है- संसार! और दूध है- मुक्ति!
यह तय है कि दूध अच्छा लगना ही पर्याप्त नहीं है। दूध की मिठास प्रिय लगने के साथ साथ छास की खटास हमें अप्रिय लगनी चाहिये।
छोड़नी है संसार की छास! और पाना है मुक्ति का दूध!

40. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.


जटाशंकर को बैंक में पहरेदारी की नौकरी मिली थी। होशियार था तो कम, पर अपने आप को समझता ज्यादा था।
शाम के समय में बैंक मैनेजर ने अपने सामने ताला लगवाया। उस पर सील लगवाई और चौकीदार जटाशंकर से कहा- ध्यान रखना! सील कोई तोड न दें। पूरी रात चौकीदारी करना।
जटाशंकर ने अपनी मूंछों पर अकडाई के साथ हाथ फेरते हुए कहा- आप जरा भी चिंता न करें। इस सील का बाल भी बांका नहीं होने दूंगा।
दूसरे दिन सुबह बैंक मैनेजर ने आकर देखा तो पता लगा कि रात लुटेरों ने बैंक को लूंट लिया है। क्रोध में उसने जटाशंकर को बुलाया और कहा- क्या करते रहे तुम रात भर! यहाँ पूरी बैंक ही लुट गई।
जटाशंकर ने कहा- हजूर! आपने मुझे सील की सुरक्षा का कार्य सौंपा था। मैंने उसे पूरी तरह सुरक्षित रखा है। आप देख लें।
पर चोर तो दीवार में सेंध मार कर भीतर घुसे हैं।
- हुजूर! यह तो मैं देख रहा था। दीवार को तोडते भी देखा, अंदर जाते भी देखा, सामान लूटते भी देखा, सामान ले जाते भी देखा।
- तो फिर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, उन्हें रोकना नहीं था!
- हुजूर! आपने मुझे सील की सुरक्षा की जिम्मेवारी सौंपी थी। मैं इधर उधर कैसे जा सकता था!
मैनेजर ने अपना माथा पीट लिया।

Aug 5, 2012

32. नवप्रभात --उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.


हमें मन के अनुसार जीवन का निर्माण नहीं करना है। बल्कि जीवन के लक्ष्य के अनुसार अपने मन का निर्माण करना है।
यह तो तय है कि मन की दिशा के अनुसार ही हमारा आचरण होता है। मन मुख्य है। मन यदि सम्यक् है तो जीवन सम्यक् है! मन यदि विकृत है तो जीवन विकृत है।
मन के अधीन जो जीता है, वह हार जाता है। जो मन को अपने अधीन बनाता है, वह जीत जाता है। मन को अपना मालिक मत बनने दो! वह तो मालिक होने के लिये कमर कस कर तैयार है। वह छिद्र खोजता है। छोटा-सा भी छिद्र मिला नहीं कि उसने प्रवेश किया नहीं! प्रवेश होने के बाद वह राजा भोज बन जाता है।
फिर हमें नचाता है! उलटे सीधे सब काम करवाता है। क्योंकि उसे किसकी परवाह है। वह किसी के प्रति जवाबदेह भी नहीं है। उसे परिणाम भोगने की चिंता भी नहीं है।
वह तो थप्पड मार कर अलग हो जाता है। दूर खडा परिणाम को और परिणाम भोगते तन या चेतन को देखता रहता है। उसे किसी से लगाव भी तो नहीं है। तन का क्या होगा, उसे चिंता नहीं है। चेतना का क्या होगा, उसे कोई परवाह नहीं है। उसे तो केवल अपना मजा लेना है। और सच यह भी है कि हाथ उसके भी कुछ नहीं आता! न पाता है, न खोता है, न रोता है, न सोता है! जैसा था, वैसा ही रहता है।
सुप्रसिद्ध योगीराज श्री आनंदघनजी महाराज कुंथुनाथ परमात्मा की स्तुति करते हुए अपने हृदय को खोलते हैं! मन को समझाते हैं! मन की सही व्याख्या करते हैं! और मन से ऊपर उठकर चेतना के साथ जीने का पुरूषार्थ भी करते हैं, प्रेरणा भी देते हैं!
उन्होंने मन के लिये सांप का उदाहरण दिया है-
सांप खाय ने मुखडुं थोथुं, एह उखाणो न्याय!
सांप किसी को खाता है, तो उसके मुँह में क्या आता है? मुख तो खाली का खाली रहता है। इसी प्रकार का मन है। उसे मिलता कुछ नहीं है। पर दूसरों का बहुत कुछ छीन लेता है। वह रोता नहीं है, परन्तु रूलाने में माहिर है।
जीना है पर मन के अनुसार नहीं! मन को मनाना है, इन्द्रियों के अनुसार नहीं! अपने लक्ष्य के आधार पर! अपनी चेतना के आधार पर!

39. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

39. जटाशंकर     -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी . सा.
जटाशंकर परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था। अपना कार्ड लेकर मुँह लटका कर रोता हुआ जब घर पहुँचा तो पिताजी ने रोने का कारण पूछा- हाथ में रखा प्रगति पत्र आगे करते हुए कहा- मैं फेल हो गया हूँ। इसलिये रो रहा हूँ।
पिताजी को भी क्रोध तो बहुत आया। साल भर गँवा दिया। यदि मेहनत करता तो निश्चित ही पास हो जाता। इधर उधर घूमता रहा। पढाई की नहीं, तो फेल तो होओगे।
पर सोचा- मेरा लडका वैसे ही उदास है। रो रहा है। यदि मैंने भी क्रोध में इसे डाँटना प्रारंभ कर दिया तो पता नहीं यह क्या कर बैठेगा? कहीं उल्टी सीधी हरकत कर दी तो मैं अपने बेटे से हाथ खो बैठूंगा।
इसलिये सांत्वना देते हुए पिताजी ने कहा- बेटा जटाशंकर! रो मत! तुम्हारे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। इसलिये धीरज धर।
सुनते ही जटाशंकर ने अपना रोना बंद कर दिया और मुस्कुराते हुए कहा- पिताजी! मैं इस बात पर बहुत प्रसन्न हूँ कि मेरे भाग्य में फेल होना ही लिखा था। अच्छा हुआ जो मैंने मेहनत पूर्वक पढाई नहीं की। यदि करता तो भी फेल हो जाता और इस प्रकार मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाती, मिट्टी में मिल जाती।
मेहनत न करने का दोष भाग्य पर नहीं ढाला जा सकता। भाग्य तो पुरूषार्थ का ही परिणाम है। मेहनत से जी चुराने वाला सदा अनुत्तीर्ण होता है। और दोष अपने आलस्य को नहीं, बल्कि भाग्य को देकर राजी होता है।

Aug 4, 2012

जिज्ञासाओं का समाधान


जिज्ञासाओं का समाधान

आज कान्ति मणि नगर, कपोलवाडी में खचाखच भरे विशाल हाँल में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्य उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने प्रश्नों के उत्तर देते हुए कहा- इस वर्ष जैन संघ में छह बार संवत्सरी मनाई जायेगी। खरतरगच्छ, अंचलगच्छ, स्थानकवासी संघ {ज्ञानगच्छ को छोडकर}, तेरापंथ संघ व दिगम्बर समाज का अधिकांश भाग अगस्त महिने में संवत्सरी महापर्व की आराधना करेगा। जबकि तपागच्छ, तीन थुई, ज्ञानगच्छ अगले महिने सितम्बर में संवत्सरी मनायेगा। इस विषय पर अपनी वेदना व्यक्त करते हुए उपाध्यायश्री ने कहा- जैन संघ के तीर्थंकर एक, नवकार एक, आराधना का लक्ष्य एक होने पर भी संवत्सरी का यह भेद समाज को छिन्न भिन्न कर रहा है। हर वर्ष पर्युषण महापर्व के दिनों में कत्लखाने बंद रहते हैं, पर इस वर्ष अलग अलग होने के कारण सरकार ने ऐसा आदेश निकालने से मना कर दिया है। अर्थात् किसी भी पर्युषण में कत्लखाने बंद नहीं रहेंगे। यह हमारे लिये कितने दर्द की बात है।

उन्होंने कहा- यदि संपूर्ण जैन समाज संवत्सरी एक मनाने के लिये तत्पर है तो खरतरगच्छ समुदाय अपनी परम्परा का त्याग करने के लिये तत्पर है। पर शर्त एक ही है कि सारा श्वेताम्बर समाज एक हो। उन्होंने एक व्यक्ति के दर्द को प्रकट करते हुए कहा- एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा- खरतरगच्छ, अचलगच्छ वाले 21 अगस्त को संवत्सरी करेंगे। स्थानकवासी तेरापंथी भी अगस्त में करेंगे। तपागच्छ व तीन थुई वाले सितम्बर में करेंगे।

हे गुरूदेव! मुझे बताओ कि मैं संवत्सरी कब करूँ! क्योंकि मैं न तो खरतरगच्छ का हूँ, न तपागच्छ का हूँ, न तीन थुई का हूँ, न स्थानकवासी हूँ, न तेरापंथी हूँ! मैं तो शुद्ध जैन हूँ! हे गुरूदेव! मुझे बताओ कि मेरी संवत्सरी कब है!

इस प्रश्न का हमारे पास कोई जवाब नहीं है। हम छोटी छोटी बातों के लिये लडते रहते हैं, और इस प्रकार अपने समाज में गच्छवाद, तिथि वाद आदि के नाम पर विभाजन करते रहते हैं।

उन्होंने कहा- जैन समाज की उन्नति उसकी एकता में है।

संयोजक पुखराज छाजेड ने बताया कि पूज्य गुरूदेवश्री की पावन निश्रा में 20 मासक्षमण हो चुके हैं और अभी आगे कईयों के मासक्षमण की तपस्या चल रही है। साथ ही सिद्धि तप, कषाय जय तप आदि विभिन्न तप जारी है। पूज्य मुनि श्री मैत्रीप्रभसागरजी म. के आज 18वां उपवास है। मासक्षमण की भावना है। साध्वी श्री कल्याणमालाश्रीजी म. के सिद्धि तप की तपस्या चल रही है।

उन्होंने बताया कि हर शनिवार को दोपहर ढाई से चार बजे तक पू. मेहुलप्रभसागरजी म. द्वारा बच्चों का शिविर लिया जाता है। और रविवार को पू. मनितप्रभसागरजी म. द्वारा दोपहर ढाई से चार बजे तक जनरल शिविर लिया जाता है।

पूज्यश्री के प्रभावी प्रवचनों को श्रवण करने के लिये भारी भीड उपस्थित होती है। कल रविवार को पूज्यश्री का समाज के प्रति उत्तरदायित्व विषय पर प्रवचन होगा।